घनाकर हिमबर बरसे उरबर देत किसान ।
दिन मनि कर धरनि हरसे धरे हरियारि धान |691|
भावार्थ : - वर्षा ऋतु में मोती बरस रहे हैं, किसान खेतों में उर्वरक दे रहे हैं ॥ सूर्य की किरणें प्रापी कर्ण धरती प्रसन्ना चित हो गई ॥ और धान, हरियाली से आच्छादित हो गए ॥
दै धान लै मूल थोर रहे रेवरी बाँट ।
तहँ मति राउ मद्य बोर,श्रमिक धन किये गाँठ । ६९२।
भावार्थ : -- एक राज्य की लघु कथा है कि पहले तो उस राज्य के शासक ने, श्रमिकों को थोड़े मुल्य में अनाज देकर ललचाया । फिर उन श्रमिकों को मदिरा की लत लगाकर उनका सारा श्रम धन हड़प लिया ॥
सबहि बैठे चाक धरे माटी मोल बढ़ाएँ ।
मनहु पीछे पवन पड़े गगन धर सिर चढ़ाए |693|
भावार्थ : -- चाक धरके सभी कुम्भकार बने बैठे हैं और मिटटी का मोल बड़ा रहे हैं । मानो हवा, धूल को गगन पर चढाने हेतु उसके पीछे ही पड़ गई है ॥
फरे तरु पाथर मारे उलटे मुँह पर आए ।
कर जोर जोर हिरकारे झर बेरी बरसाए । ६९४।
भावार्थ : -- फलदार वृक्ष में पत्थर मारने से वह उल्टे मुख पर आता है । यदि हाथ जोड़ कर याचना करते हुवे हिलाया जाए तो फिर फिर झड़ते हुवे बेरी बरसाता है ॥
सौच मति मुख मृदुल भाख, अंतस सद अचार ।
कलंक हीन चारित ही, मानख सत ओहार ।६९५।
भावार्थ : --" शुद्ध बुद्धि, मृदु भाषा, सदाचरण, निष्कलंक चरित्र ही मनुष्यके वास्तविक वस्त्र हैं..,"
कुम्भ कार कर कारु कर मटके चाक बनाए ।
राखे ते जल बहोरे पटके ते बिसराए । ६९६ ।
भावार्थ : -- कुम्भ कार के हाथ की कलाकारी है और घड़े चाक बना रहा है । इन घड़ों को यदि सम्भाल के रखा जाए तो यह जल संगृहीत करते हैं, क्रोधवश पटक देने से यह टूट जाते हैं ॥
कर पसार दल बहु खड़े सबहिं दल एक समान ।
'मत' लै करिया धन भरें दै मति दै मत दान । ६९७।
भावार्थ : -- हाथ पसारे चुनावी दल तो बहुंत से हैं । किन्तु हैं सभी एक स्वरूप के.…. 'भ्रष्टाचारी.....ये "मत" दान में लेकर फिर धरती और धरती वासियों की छांती में मुंग दल के काला धन संगृहित करते हैं.....अत: इन्हें बुद्धि दान में देनी चाहिए अपना मत नहीं.....
दर्सक बिन दर्पन हीन बिन सँवरे सिंगार ।
दोउ दीन दरस अधीन दोउ दरप आधार ।६९८।
भावार्थ : -- दर्शक के बिना दर्पण दर्पण व्यर्थ होता है, प्रियतम के बिना श्रृंगार व्यर्थ होता है । दोनों अर्थात दर्पण और श्रंगार
गुरु सर निर्मल जल करूँ, मैं रूप अकारूँ कीच ।
ज्ञानारविंद कर धरूँ, रहूँ चरन जल नीच। ६९९।
भावार्थ : -- गुरु को सरोवर का निर्मल जल कारित कर, मैं स्वयं को सरोवर का कीच की आकृति करूँ । ज्ञान के कमल को हाथ में लेते हुवे सदा गुरु रूपी निर्मल जल के चरणों के नीचे ही रहूँ ॥
दुचारि चित अरु दुभाखें, नेता बन भुवन भूप ।
दुइ सिरु बरन रुधिरु रखें दुइ रसन रेतस रूप ।७००।
भावार्थ : -- ध्यान इधर-उधर , मध्यस्थ माने की दल्लू, ये नेता इस भूमि के राजा बने बैठे हैं । दुरंगी रक्त वाले, सर्प और गधे-खच्चर कहीं के, अपनी मृत्यु को आमंत्रित कर रहे हैं ॥
दिन मनि कर धरनि हरसे धरे हरियारि धान |691|
भावार्थ : - वर्षा ऋतु में मोती बरस रहे हैं, किसान खेतों में उर्वरक दे रहे हैं ॥ सूर्य की किरणें प्रापी कर्ण धरती प्रसन्ना चित हो गई ॥ और धान, हरियाली से आच्छादित हो गए ॥
दै धान लै मूल थोर रहे रेवरी बाँट ।
तहँ मति राउ मद्य बोर,श्रमिक धन किये गाँठ । ६९२।
भावार्थ : -- एक राज्य की लघु कथा है कि पहले तो उस राज्य के शासक ने, श्रमिकों को थोड़े मुल्य में अनाज देकर ललचाया । फिर उन श्रमिकों को मदिरा की लत लगाकर उनका सारा श्रम धन हड़प लिया ॥
सबहि बैठे चाक धरे माटी मोल बढ़ाएँ ।
मनहु पीछे पवन पड़े गगन धर सिर चढ़ाए |693|
भावार्थ : -- चाक धरके सभी कुम्भकार बने बैठे हैं और मिटटी का मोल बड़ा रहे हैं । मानो हवा, धूल को गगन पर चढाने हेतु उसके पीछे ही पड़ गई है ॥
फरे तरु पाथर मारे उलटे मुँह पर आए ।
कर जोर जोर हिरकारे झर बेरी बरसाए । ६९४।
भावार्थ : -- फलदार वृक्ष में पत्थर मारने से वह उल्टे मुख पर आता है । यदि हाथ जोड़ कर याचना करते हुवे हिलाया जाए तो फिर फिर झड़ते हुवे बेरी बरसाता है ॥
सौच मति मुख मृदुल भाख, अंतस सद अचार ।
कलंक हीन चारित ही, मानख सत ओहार ।६९५।
भावार्थ : --" शुद्ध बुद्धि, मृदु भाषा, सदाचरण, निष्कलंक चरित्र ही मनुष्यके वास्तविक वस्त्र हैं..,"
कुम्भ कार कर कारु कर मटके चाक बनाए ।
राखे ते जल बहोरे पटके ते बिसराए । ६९६ ।
भावार्थ : -- कुम्भ कार के हाथ की कलाकारी है और घड़े चाक बना रहा है । इन घड़ों को यदि सम्भाल के रखा जाए तो यह जल संगृहीत करते हैं, क्रोधवश पटक देने से यह टूट जाते हैं ॥
कर पसार दल बहु खड़े सबहिं दल एक समान ।
'मत' लै करिया धन भरें दै मति दै मत दान । ६९७।
भावार्थ : -- हाथ पसारे चुनावी दल तो बहुंत से हैं । किन्तु हैं सभी एक स्वरूप के.…. 'भ्रष्टाचारी.....ये "मत" दान में लेकर फिर धरती और धरती वासियों की छांती में मुंग दल के काला धन संगृहित करते हैं.....अत: इन्हें बुद्धि दान में देनी चाहिए अपना मत नहीं.....
दर्सक बिन दर्पन हीन बिन सँवरे सिंगार ।
दोउ दीन दरस अधीन दोउ दरप आधार ।६९८।
भावार्थ : -- दर्शक के बिना दर्पण दर्पण व्यर्थ होता है, प्रियतम के बिना श्रृंगार व्यर्थ होता है । दोनों अर्थात दर्पण और श्रंगार
गुरु सर निर्मल जल करूँ, मैं रूप अकारूँ कीच ।
ज्ञानारविंद कर धरूँ, रहूँ चरन जल नीच। ६९९।
भावार्थ : -- गुरु को सरोवर का निर्मल जल कारित कर, मैं स्वयं को सरोवर का कीच की आकृति करूँ । ज्ञान के कमल को हाथ में लेते हुवे सदा गुरु रूपी निर्मल जल के चरणों के नीचे ही रहूँ ॥
दुचारि चित अरु दुभाखें, नेता बन भुवन भूप ।
दुइ सिरु बरन रुधिरु रखें दुइ रसन रेतस रूप ।७००।
भावार्थ : -- ध्यान इधर-उधर , मध्यस्थ माने की दल्लू, ये नेता इस भूमि के राजा बने बैठे हैं । दुरंगी रक्त वाले, सर्प और गधे-खच्चर कहीं के, अपनी मृत्यु को आमंत्रित कर रहे हैं ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें