सोमवार, 2 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 68॥ -----

अंतह करन पयस मान, देही नग नग तूल । 
जे गतागत गगन सरन, जे धरनी थिर थूल । ६८१। 
भावार्थ : -- अंतः करण जल के सदृश्य है । देह अविचल स्थूल पर्वत के समान है । अंत: करण, गगन मार्ग में आवागमन करते हुवे गतिशील है । और देह धरती पर ही स्थित रहती है ।।  

मानख काया कृतावधि, कल्प कलेवर कार । 
सीस मति एक अंतरतम, सह  अंग नउ द्वार ।६८२। 
भावार्थ : --रचनाकार ने मानव शरीर को निश्चित अवधि हेतु इस प्रकार की आकृति देकर रचा है कि शीश के अंतर में एक मस्तिष्क है, एक अंतरात्मा है, साथ में नौ अंग द्वारहैं ॥ मुख, दो कान नासिका के दो छिद्र, दो नेत्र, गुदा एवं उपस्थ । किन्तु कबीर ने दस द्वार माने हैं जिसमें एक ब्रह्माण्ड है । आधुनिक शरीर विज्ञान को आधारित करें तो मानव शरीर में ये छिद्र द्वार हैं : -- मुख, नेत्र, नासिका, कर्ण, स्तन, नाभि,योनि, गुदा इति ( चूँकि दो नेत्र नासिका के दो छिद्र, एवं दो कर्ण के एक ही कार्य है)  । नवम द्वार अन्वेषण के अधीन है मृत्यु के समय कदाचित यह आत्मा  के निकलने का मार्ग है और कबीर अनुसार यही ब्रह्मांड है ॥ 

टीका : -- अंग द्वार वह छिद्र हैं जो शरीर में ग्रहण एवं उत्सर्जन की क्रिया करते हैं ॥

देहाकृति अम्बरकार, अंतरतम खद्योत। 
नउ गृह नउ अंग द्वार, मति सीर्ष खग जोत।६८३। 
भावार्थ : -- देह को अम्बर की आकृति में आकारित करते हुवे यह ह्रदय सूर्य किया  । नव गृह नव अंग द्वार किये  । और यह शीश में मति चंद्रमा के सदृश किया ॥

नारी धरा नर खगोल, तेहि ह्रदय  खद्योत । 
भँवरत जाके भँवर पथ, जरी गृहस की जोत ।६८४।  
भावार्थ : --यदि नारी धरणी स्वरूप है, तो नर खगोल का रूप है, और उसका ह्रदय सूर्य है, जिसके भ्रमण पथ की परिक्रमा करते हुवे ही गृहस्थी की ज्योति प्रज्वलित रहती है ।।

नर नभ निलय नभ केतन, नारी रूप समूँद ।
कर्ष किरन काम सरूप, बरखे बादर बूँद ।६८५।  
भावार्थ : -- आकाश सदृश्य नर का सूर्य सदृश्य ह्रदय है । और नारी का रूप सागर स्वरूप है । चाह स्वरूपी किरणे रूप के सागर को कर्षित कर फिर स्नेह रूपी बादल से बूंदों की वर्षा करता है ॥

नारी भइ गर्भाधान क्षीर सिन्धु कृत कार । 
धरा धारी नाभि नाल, केसव नर श्री नार।६८६ । 
भावार्थ: - नारी गर्ववती हुई और गर्भ को क्षीर सागर के सदृश्य आकार दिया । नाभि नाल को शेषनाग की आकृति दी । गर्भस्थ शिशु यदि नर है तो विष्णु स्वरूप है और नारी है तो लक्ष्मी का रूप है ॥
 

दरसत जग दृग दिरिस दौ, अरोचित कोउ रोच । 
सर्जन सरजत लखन दो, को पवित कोउ पोच ।६८७ । 
भावार्थ : -- संसार में दो ही दृश्य दर्शित होते हैं । कोई शोभनीय कोई अशोभनीय । सृष्टि ने दो लक्षणों को रचा है, अच्छे लक्षण और बुरे लक्षण । जैसे प्रकाश के सह अन्धकार, सुख के सह दुःख, रूप के सह कुरूप,सद्गुण-दुर्गुण आदि ॥  

रहे ज्ञान अवशेष जब, वरधे भेस प्रताप । 
जे उपजै आप जाके, अंत आप ही आप ।६८८ ।   
भावार्थ : -- जब वेष के प्रताप में वृद्धि होती है तब ज्ञान का लगभग अवसान हो जाता है । यह अज्ञानता स्वयं ही उत्पन्न होती है जिसका अंत भी स्वयं से ही होना है ।

अर्थात : -- जीव के  स्वरूप का प्रताप स्थायी नहीं रहता, अंतरात्म का तपन ही चिर काल तक प्रकाशित रहता है, कारण कि जीव नश्वर है किन्तु उसका आत्म तत्त्व अनश्वर है ॥

नियम नियन्त तेइ बरित, जेइ बर पंचभूत । 
भव भाव भूषन सरूप, बरधे भू श्री यूत । ६८९।   
भावार्थ : -- वे ही नियम-नियामक वरणीय हैं, जो पंचभूत ( धरणी, अग्नि , वायु, जल आकाश ) एवं उसके यौगिक हेतु श्रेष्ठ हों । जो भौतिक संसार के अस्तित्व से स्नेह रखते हुवे उसके  आभूषण स्वरूप होते हुवे इस पृथ्वी की शोभा,संपत्ति,साधन आदि श्री समूहो का वर्द्धन करें ॥

पहिलै बाँधे डिम्ब रज, दूजन नाभिहि नाल ॥
बहुरि बाँधे भव बंधन, अस मानख की खाल ।६९०।
भावार्थ : -- विधाता ने मनुष्य को सर्व प्रथम रज और डिम्ब से बांधा, फिर नाभि नाल से बाँधा। तत्पश्चात उसे जन्म और मरण के चक्रव्यूह में कसा, मनुष्य की ऐसी ही प्रकृति है कि उसे नियमों में बांधना आवश्यक है ॥  













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