पवित भाव मन मात रुप, दरस देइ परदार ।
अपवित निज मात सरूप, दरसत बस एक नार /६६१ /
भावार्थ : -- पवित्र भाव से युक्त चित्त को, पराई स्त्री में भी माता का ही रूप दिखाई देता है । अपवित्र चित्त, स्वयं की माता के स्वरूप में भी एक स्त्री ही देखता है॥
मन मंदिर मति अगारे, अंतरात्म अधान ।
जैसी भावइ आरती , तैसे धारत भान ।६६२।
भावार्थ : -- मस्तिष्क के भित्ति से घिरे मन के मंदिर में अंतर आत्मा स्थापित है । भाव एवं विचारों से उसकी जैसी आरती होती है, वह मूर्ति उसी प्रकार का आलोक धारण करती है ॥
साँस माँस रक्त सक्ती , अंतर आत्म प्रान ।
सकल सार सरीर जौग, पंच भूत आधान । ६६३।
भावार्थ : --देह के समस्त यौगिक तत्त्व, पञ्च भूत पर ही आधारित हैं । वायु से स्वांस, पृथ्वी से मांस(अंग), जल से रुधिर, अग्नि से विश्व पाचक(जीव शक्ति), और आकाश से अदृश्य अंतरात्मा ॥
जे तेरे मन भीत भरे, संका कारि बिचार।
सोच पट दुआरी धरे, करि दे धूँक बहार ।६६४।
भावार्थ : -- तेरे चित्त के अंतर संदेह स्वरूप कलुष विचार वासित हैं । उन्हें बहिष्कृत करते हुवे विचार भवन की द्वार के पट बंद कर दे ॥
फिरत गेह उदयान भित, जदि गंधे संदेह ।
प्रतीति पौध लगाए के, सार सुगंध सनेह ।६६५।
भावार्थ : -- यदि वह संदेह गृह उद्यान में ही भ्रमण कर रहा है एवं गंध दे रहा हो । तो विश्वास के पौधे रोपित करते हुवे स्नेह के सुगन्धित पुष्प से उसे दूर कर ॥
बन राज नयन बन राजि, बिचरत बन संदेह ।
सार गुण गह भोजनै, सारत हिरन सनेह ।६६६।
भावार्थ : -- संदेह सिंह बनकर नयन वन के पलक स्वरूपी वृक्ष समूहों में विचरण कर रहा है । तो वह सनेह रूपी हिरन को विदारित कर, सार गुण ग्रहण करते हुवे उसे अपना भोजन बना लेगा ॥
रच प्रतीत का पिंजरा, रचइत प्रीति सलाएँ ।
धरत सील का पूतरा, केसरी अंतराएँ ।६६७।
भावार्थ : -- (पुन:) प्रीत से रचित शालाकोओं से, विश्वास के पिंजरे की रचना करते हुवे , उसके अंतर सदाचार का पुतले रखते हुवे, फिर वह संदेह स्वरूपी सिंह पिजरे में बंध जाता है ॥
चाहें करन साँच श्रवन, पहलै निज मुख धार ।
चाह नयन दिव्य दर्सन, कर निज कायाकार।६६८।
भावार्थ : -- और यह कर्ण यदि सत्य सुनाने की अबिलाषा करते हैं तो वह सत्य सर्वप्रथम स्वयं के मुख पर स्थापित कर । नेत्र उसकी अलौकिकता के दर्शनाभिलाषी है तो सर्वप्रथम स्वयं की काया को देवोचित स्वरूप दे ॥
मन मत्त मति भरम भरे, जे एहि सम्मति मान ।
देही धरणी संचरै, अंतरात्म अधान ।६६९।
भावार्थ : -- उन्मत्त चित्त, भ्रमयुक्त होकर विपरीत अवधारणा किए हुवे है । इस विचार को मान्यता देते हुवे कि, देह जिसके अंतर में जीवात्म स्थापित है, गतिमान होते हुवे पृथ्वी में भ्रमण शील है ॥
सरल कल तरल धर्म जल, ते तुल तृपल कठोर।
धारा तरंग गति धार, पर्वत एक हीं ठोर । ६७०।
भावार्थ : -- जल तरल,सरल, प्रकृति का हिते हुवे ध्वनीकार है, पाषाण की प्रकृति जल की तुलना में कठोर है ।नदी-धारा एवं सागर-तरंग गति शील हैं किन्तु पर्वत एक ही स्थान पर स्थित है॥
मन मंदिर मति अगारे, अंतरात्म अधान ।
जैसी भावइ आरती , तैसे धारत भान ।६६२।
भावार्थ : -- मस्तिष्क के भित्ति से घिरे मन के मंदिर में अंतर आत्मा स्थापित है । भाव एवं विचारों से उसकी जैसी आरती होती है, वह मूर्ति उसी प्रकार का आलोक धारण करती है ॥
साँस माँस रक्त सक्ती , अंतर आत्म प्रान ।
सकल सार सरीर जौग, पंच भूत आधान । ६६३।
भावार्थ : --देह के समस्त यौगिक तत्त्व, पञ्च भूत पर ही आधारित हैं । वायु से स्वांस, पृथ्वी से मांस(अंग), जल से रुधिर, अग्नि से विश्व पाचक(जीव शक्ति), और आकाश से अदृश्य अंतरात्मा ॥
जे तेरे मन भीत भरे, संका कारि बिचार।
सोच पट दुआरी धरे, करि दे धूँक बहार ।६६४।
भावार्थ : -- तेरे चित्त के अंतर संदेह स्वरूप कलुष विचार वासित हैं । उन्हें बहिष्कृत करते हुवे विचार भवन की द्वार के पट बंद कर दे ॥
फिरत गेह उदयान भित, जदि गंधे संदेह ।
प्रतीति पौध लगाए के, सार सुगंध सनेह ।६६५।
भावार्थ : -- यदि वह संदेह गृह उद्यान में ही भ्रमण कर रहा है एवं गंध दे रहा हो । तो विश्वास के पौधे रोपित करते हुवे स्नेह के सुगन्धित पुष्प से उसे दूर कर ॥
बन राज नयन बन राजि, बिचरत बन संदेह ।
सार गुण गह भोजनै, सारत हिरन सनेह ।६६६।
भावार्थ : -- संदेह सिंह बनकर नयन वन के पलक स्वरूपी वृक्ष समूहों में विचरण कर रहा है । तो वह सनेह रूपी हिरन को विदारित कर, सार गुण ग्रहण करते हुवे उसे अपना भोजन बना लेगा ॥
रच प्रतीत का पिंजरा, रचइत प्रीति सलाएँ ।
धरत सील का पूतरा, केसरी अंतराएँ ।६६७।
भावार्थ : -- (पुन:) प्रीत से रचित शालाकोओं से, विश्वास के पिंजरे की रचना करते हुवे , उसके अंतर सदाचार का पुतले रखते हुवे, फिर वह संदेह स्वरूपी सिंह पिजरे में बंध जाता है ॥
चाहें करन साँच श्रवन, पहलै निज मुख धार ।
चाह नयन दिव्य दर्सन, कर निज कायाकार।६६८।
भावार्थ : -- और यह कर्ण यदि सत्य सुनाने की अबिलाषा करते हैं तो वह सत्य सर्वप्रथम स्वयं के मुख पर स्थापित कर । नेत्र उसकी अलौकिकता के दर्शनाभिलाषी है तो सर्वप्रथम स्वयं की काया को देवोचित स्वरूप दे ॥
मन मत्त मति भरम भरे, जे एहि सम्मति मान ।
देही धरणी संचरै, अंतरात्म अधान ।६६९।
भावार्थ : -- उन्मत्त चित्त, भ्रमयुक्त होकर विपरीत अवधारणा किए हुवे है । इस विचार को मान्यता देते हुवे कि, देह जिसके अंतर में जीवात्म स्थापित है, गतिमान होते हुवे पृथ्वी में भ्रमण शील है ॥
सरल कल तरल धर्म जल, ते तुल तृपल कठोर।
धारा तरंग गति धार, पर्वत एक हीं ठोर । ६७०।
भावार्थ : -- जल तरल,सरल, प्रकृति का हिते हुवे ध्वनीकार है, पाषाण की प्रकृति जल की तुलना में कठोर है ।नदी-धारा एवं सागर-तरंग गति शील हैं किन्तु पर्वत एक ही स्थान पर स्थित है॥
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