सोमवार, 2 सितंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 103 -----

" राजू! कल मुझे एक ठो  महापुरुख मिल गए थे"

राजू: -- हाँ तो मास्टर जी !

 " थे वर्ण क्रम चित्र के विचित्र  से वित्त चित्र, कहने लगे हम तो जात-पात को नहीं मानते"

राजू : -- हाँ तो उनके मानने न मानने से का होगा, लोग तो उन्हें पुरुख जात मानते हैं, हैं ना मास्टर जी! अब वो इ बोलें कि हम दुर्गन्ध मारते हुवे सड़े हुवे सांसद-विधायकों के बनाए बिल को नहीं मानते, तो फिर कौनो बात है.…. काहे की जब दुनिया  ने बड़े बड़े महर्षियों के लिखे वेद-पुराणों को नहीं माना, लोगों ने धर्म ग्रंथों में लिखी बातों को नहीं माना, लब्ध प्रतिष्ठित भारतीयों ने अम्बेडकर के लिखे तुच्छ से संविधान को नहीं माना.....तो इन सड़े हुवे सांसदों-विधायकों के विधेयकों को कौन मानेगा.....इसीलिए
                                      नियम नियन्त तेइ बरित, जेइ बर पंचभूत । 
                                       भव भाव भूषन सरूप, बरधे भू श्री यूत ॥ 
अर्थात : -- वे ही नियम-नियामक वरन करने योग्य हैं, जो पंचभूत ( धरणी, अग्नि , वायु, जल आकाश ) एवं उसके यौगिक हेतु श्रेष्ठ हों । जो भौतिक संसार के अस्तित्व से स्नेह रखते हुवे उसके  आभूषण स्वरूप होते हुवे इस पृथ्वी की शोभा,संपत्ति,साधन आदि श्री समूहो का वर्द्धन करें 

मास्टर जी! शेष सभी नियम न होकर केवल गुंडागर्दी है.....

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...