शनिवार, 28 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 82॥ -----

बार बार अभ्यास कर, मछरी निकसइ चाह । 
पुन उद्धारे अघ धरे, भव सिन्धु छुटे नाह ।८२१। 
भावार्थ : -- यह मछली जल से निकलने हेतु बारम्बार प्रयास करती है । इसके पुण्य जब इसे ऊपर उठाते है, इसके पाप इसे नीचे खिंच लेते हैं, यह संसार रूपी समुद्र इससे छुटता नहीं ॥

जनमन पूरब का भया, मरनी पर का होइ । 
ए जान न समझ आपने , न जान का मनु सोइ ।८२२। 
भावार्थ : -- जन्म से पूर्व क्या था, मृत्यु पश्चात क्या होगा । यह ज्ञात नहीं, और मनुष्य स्वयं को जाने क्या समझता है ।।

जँह जस जिस बयस सरूप, मिले धार कर ज्ञान । 
पार्थ सारथि रनाँगन, दिए ज्ञान आख्यान ।८२३।
भावार्थ : -- ज्ञान जहां भी मिले, जेसे भी मिले, जिस अवस्था मिले, जिस रूप में मिले धारण कर लेना चाहिए । भगवान कृष्ण ने रणांगण में ज्ञान का आख्यान दिया था ।।

खाए पिये अरु पहन लिए, सो तन लागे आप ।
संचारि चर संचय किए, सोइ पराई धाप ।८२४। 
भावार्थ : -- खाया-पिया, पाहन लिया वह तो अपनी देह लगा । घूम घूम कर जो संचय किया, वह दौड धूप दुसरे के लिए की गई ।।

सुबुध बुराई दाहिनी, कुबुध बडाईहु बाएँ  । 
तिनके प्रसंग परिगहत, तिन्ह संग परिहाएँ | 825|  

भावार्थ : -- विद्वानों की निंदा अनुकूल प्रभाव उत्पन्न करती है, मूर्खों की प्रसंशा भी प्रतिकूल होती है । अत: मूर्खों का संग त्याग कर विद्वानों का प्रसंग ग्रहण करना चाहिए ॥ 

जाति-धर्म पोषित करें, करें न तिनके सोष । 
जे कल कूरी कुंजिका, ज्ञानांजन धन कोष ।826|

भावार्थ : -- जाति-धर्म का पोषण करें, शोषण ना करें ।  ब्रम्ह ज्ञान के धन कोष की यही कल कुंजियाँ हैं ॥ 

अन गन कुबुध नख सौं भल, एकै सुबोधित सूर । 
जिनके कासि अज्ञान के, केरि अँधेरी दूर | 827|

भावार्थ : -- अनगिनत मुर्ख स्वरूप तारों से अच्छा एक विद्वान सूर्य है । क्योंकि एक विद्वान सूर्य की ज्ञान रूपी ज्योति अज्ञान के अंधेरों को दूर कर देती है ॥ 

कारन होत जीव हते, सो तो पशुत सुभाइ । 
बिनु कारन जब हत्बते, सोइ कहत जड़ताइ |828|

 भावार्थ : - कारण के होते यदि कोई जीवों को घायल करता है या प्रताड़ित करता है अथवा उनकी ह्त्या करता है तो वह पाश्विक प्रवृत्ति है । किन्तु यदि कोई अकारण ही उक्त कार्य करता है तो वह जड़ता कहलाती है ॥  


जड़ता ते पसुताइ भल, पसुता ते मनुसाइ । 
मनुता ते प्रभुताइ भल, प्रभुत भल सेउकाइ ।८२९। 
न्भावार्थ : -- जड़ता से उत्तम पशुता है, पशुता से उत्तम मानवता है । मानवता से उत्तम प्रभुता है और सेवा, प्रभुता से भी उत्तम है ॥ 

गुड्डा गुरिया रचित कै, रचइत हेले हेल । 
को हिय हेरे हेर दै, को हेरन कर मेल ।८३०। 
भावार्थ : --  नर-नारी स्वरूप गुड्डे गुडिया की रचना कर रचयिता खेल खिलवाड़ कर रहा है। किसी के ह्रदय को पुकार दे कर वापस बुला लेता है, और किसी के ह्रदय में स्वयं हिलमिल जाता है ॥ 




----- मिनिस्टर राजू 105 -----

राजू : -- मास्टर जी! मास्टर जी! सरकार को दिल का दौरा पड़ गया..,]

" हाँ तो " 

राजू :-- हाँ तो क्या मास्टर जी! सरकार को दिल का दौरा पड़ा है, और डाक्टर साहेब अस्पताल छोड़ के अमरीका में उड़ रहे हैं..,

" हाँ तो इ. सी. जी. करके दवादारू कर दी है ना" 

राजू : -- मास्टर जीईईईई ई इ छूता मोटा दौरा नहीं है आर्टरी ब्लाक हो गई है

" हाँ तो अन्जियो पिलास्टी कर के दोई ठो फुग्गा फोड़ दो ब्लाक रुंध जाएगा"

राजू : -- मास्टर जी ! देखो तीन ठो आर्टरी बिलाक है एक ६५%दूसरी ८०% तीसरी ९२% इ फुग्गा वुग्गा का केस नहीं है सीधे ओपन हार्ट सर्जरी का केस है..,

" हाँ तो अब तक तो इस सरकार को ही उड़ जाना चाहिए था, शुगर बी.पी का हाल है "

राजू : -- मास्टर जी! गनीमत है की चापलूसी की दवा के कारण मधुमेह सामान्य है, और कुर्सी का प्रेसर नहीं है..,

" राजू ! एक बात तो बता इस सरकार में बुद्धि वुद्धि तो है नहीं, ये भूखी है की इसका पेट भरा है ? 

राजू : -- मास्टर जी! उ तो डाक्टर साहेब आएँगे, तभी बताएंगे.....

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 81॥ -----

साँस साँस के साथ है, हरिदै के कल अंग । 
हरिदै के कल हाथ है,देह सकल प्रत्यंग । ८११ ॥ 
भावार्थ : -- ह्रदय के यांत्रिक अवयव, सांसों के नियंत्रण में हैं । और देह के प्रत्येक अंगों की नकेल ह्रदय के हाथ में है ॥

जीवन चारन चाहिये, सैन नैन मुख भोग । 
जीउ जगत ते जीव बर, धरे जे जथा जोग ।८१२। 
भावार्थ : -- जीवन को संचालित करने हेतु, निद्रा और भोजन की आवश्यक हैं । प्राणी जगत में वही प्राणि श्रेष्ठ है, जो इनका यथा योग्य उपयोग करे ॥

परिहर पावन आचरन, केरे निर्मल काए । 
भूला जग बाताबरन, बैठा बात बनाए ।८१३। 
भावार्थ : -- चरित्र, व्यवहार, जाति-धर्म और कुल की शुद्धता को त्याग कर सांसारिक जन केवल काया के शुद्धिकरण में अभिरत हैं ।  चारों और की परिस्थतियों को विस्मृत किये हुवे, बैठे बैठे केवल शुद्धता पर भाषण देते हैं करते कुछ नहीं ॥

किए सत कारज करम फल , भयऊ दुःख के नास । 
एक कार के कारत पर, कीजै दूजन आस ।८१४। 
भावार्थ : -- सद्कार्यों के परिणाम स्वरूप ही दुखों का नाश होता है । एक सद कार्य करते ही दुसरा करने के लिए  उत्कंठित रहना चाहिए ॥

सीवाँ संग बँध जैसे, सौहें नदी नदीस । 
मरजाद में बँध तैसे, सौंहें प्रेम पचीस ।८१५।  
भावार्थ : -- जिस प्रकार नदी और समुद्र अपनी सीमाओं में बंधे सुशोभित होते हैं । उसी प्रकार प्रेम की पचीसी भी मर्यादाओं में सिमित हो तो ही सुशोभित होती है, मर्यादा व्यतिक्रम होने से वह अपने पीछे विनाश के चिन्ह छोड़ जाती है ॥

जिउ जनित भर भाव भीत, चितब काम उपजाए । 
काम भाव सन चर अचर, सकल जगत जनमाए ।८१६। 
भावार्थ : -- हृदय में भाव और चित्त में काम उपजाने से जीवों की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार काम एवं भाव के संयोंग से चराचर के सह समस्त संसार उत्पत्ति हुई होगी ।

ले साँस एक जीउ लिये, कारे दूजन आस । 
एक दिन बैठा ओगरे, बरे काल ले फाँस ।८१७। 
भावार्थ : -- एक सांस लेकर जी उठे और दूजी सांस की आस है । एक दिन  बैठा प्रतीक्षा करता रह गया, और मरनी ने आ के तुझे वर लिया ॥

मुल्ला ले किलकारियाँ, पंडित झुल दे झेल । 
पेयुष पिलाए पादरी, बड़ा बिचित्र जे मेल ।८१८। 
भावार्थ : --  मुल्ला किलकारियां ले रहा है और पंडित हिलोरे दे रहा है । पादरी स्नेहरस पिला रहा है, यह मेल तो बड़ा ही विचित्र है ॥

नद नदीस प्रेम पचीस, सोंह मरजाद संग । 
जब मरजादा लाँघ दें, परिहति नास नयंग ।८१९। 
भावार्थ : -- नदी, समुद्र और प्रेम पचीसी,मर्यादा के साथ ही सुशोभित होते हैं । मर्यादा व्यतिक्रम होने से ये अपने पीछे विनाश के चिन्ह छोड जाते हैं ॥

दिनभर मन सौ रुप रचे, बदले सौ सौ रंग । 
सकल सकल कर कलश कर, दरसे रयन  नयंग  ।८२०।
भावार्थ : -- दिन भर में यह चित्त सौ स्थितियों में परिवर्तित होकर सौ रूप रचता है । और समस्त रूपों एवं दशाओं को एकत्र करने से वह रजनी के जैसा दिखाई देने लगता है ॥    

रविवार, 22 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 80॥ -----

राम नाम के नहिं अंत, राम त एक पतंग । 
आपन सूत जोरें जे, दरसत सकल बिहंग ।८०१|
भावार्थ : -- राम के नाम का अंत नहीं है, अर्थात वह तो अनंत स्वरूप में एक पतंग हैं । इस नाम को जिसने अपने सूत्र  में जोड़ लिया, उसने सारे ब्रम्हांड के दर्शन किये ॥  

राम नाम में है राम, भाव भीत भगवान । 
वंदन पाहन पूज है, नहि त खनिज की खान ।802| 
भावार्थ : -- राम नाम में तो केवल राम है (कोई भी राम जैसे : --माया राम, गंगाराम आदि) शब्द के भाव में ही भगवान हैं । भावनापूर्ण वंदना करने से पत्थर भी पूज्यनीय है, नहीं तो वही पत्थर खनिज की खान है ॥

राम नाम एक आखरी, आखरी भित विचार । 
आखर सह उर जोग धर, भव सागर कर पार |803|
भावार्थ : -- राम का नाम एक मार्ग है, और इस मार्ग के अंतर में एक विचार है |  इस विचार को पुर्ण स्वरूप में ह्रदय से योजन करने पर, भव सागर पार करना सरल होता है ॥

राम नाम आँठी किये, गाँठी कस के कास । 
सब धन सुबरन सुन्य है, राम अंक के पास ।८०४। 

भावार्थ : -- भगवान का नाम आँट के अपनी गठरी कास के बाँध ली । क्योंकि समस्त जोड़ जुगाड़ स्वर्ण सम्पति आदि का मान ईश्वर अर्थात शुन्य से गुणित करने पर उसका भाग फल शुन्य ही आएगा ॥

अंक पाश = गणित की एक क्रिया

को बिषय कोउ बस्तु के, कोउ भाउ के भूख । 
जीव जगत अस दरस जस, चातक पयस मयूख ।८०५। 
भावार्थ : -- कोई विषयों का भूखा है, कोई वस्तुओं का भूखा है, कोई श्रद्धा, भक्ति राग, प्रेम, व्युत्पत्ति का भूखा है । संसार और संसार के जीव ऐसे दर्शित हो रहे हैं जैसे चातक और चन्द्रमा दर्शित होते हैं ॥

जग में मानव रुप रचे, पञ्च भूत संजूत । 
मरघटी पर जब बिघटे, बिरचे बहुरे भूत ।८०६।
भावार्थ : -- इस संसार में मानव की रचना पञ्च महा भूत ( धरती,आकाश, जल, वायु, अग्नि)  के संयोग से हुई है । जब यह शमशान में विघटित होता है, तब पुन: पांच भूतों में परिवर्तित हो जाता है, और हमें डराता है ॥

नहाए धोए भेस भरे, करत भूयस बिश्राम । 
आप अचार सौधें नहिं,  हेरैं सुध पर काम |807|  
भावार्थ : -- नहाए धोए उत्तम वेश धारण कर लिया, और अतिशय विराम किया, काम कुछ नहीं किया अर्थात केवल  अपने शरीर को शुद्ध किया । अपने आचरण, चाल-चरित्र, जाति -धर्म को शुद्ध नहीं किया, और बैठे बैठे पराए कामों में शुद्धता टोह रहे हैं ॥

बिसारै अनमोल बचन, बिसराए न मन गार । 
अबके उलट सीध करत, दे मन गार बिसार ।८०८। 
भावार्थ : -- यह मन अनमोल वचनों को तो भूल जाता है, दुर्वादन को नहीं भुलाता । अब की बार उलटे को सीधा करते हुवे दुर्वादन को मन से भुला दे ॥

पहिले बिघटे देस पुनि, बिघटे घर संजूत । 
रहत बिघटन क्रिया सतत, बनहि सकल जन भूत ।८०९। 

भावार्थ : -- पहिले तो यह देश विघटित हवा फिर संयुक्त परिवार विघटित हुवे यदि विघटन की क्रिया ऐसे ही चलती रही तो अंत सारे लोग भूत बन जाएंगे । 

कैसे: -- परिवार का विघटन, संतान का विघटन, दम्पति का विघटन, फिर मनुष्य का जाति-समाज से विघटन, फिर मनुष्य जाति का विघटन, फिर स्तनधारी का विघटन, फिर सरीसर्प में परिवर्तित होना और शनै: शनै: कोशिका स्वरूप होना, और जड़ता प्राप्त करना  अर्थात सकल श्रृष्टि का विघटन ॥ 

मनु जात जुगत कुटुम किए, कुटुम समुह समुदाए । 
समुदाए समाज रुप लिए, समाज धर्म प्रदाए ।८१०। 

भावार्थ : --मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई, नारी-पुरुष के परस्पर सुसंगति से कुटुंब बना, इन कुटुम्बों से समुच्चय बने, समुच्चयों ने फिर समुदाय बनाया । समुदायों ने मिलकर समाज का निर्माण किया,फिर संसार का कल्याण करने के लिए समाज से ही धर्म की व्युत्पत्ति हुई, और  राष्ट्र का निर्माण हुवा ॥ 

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 79॥ -----

कर्मन मसि पथ की बिंदु, राखे दोइ सुभाए ।
उजरे मत  जग उजराए, मलिने मत अँधराए ।७९१। 
भावार्थ : -- कर्म लेखनी की मसि बिंदु दो प्रकृति की होती है ।  यदि वह निर्मल बुद्धि एवं स्वच्छ विचार लिए हुवे है, तो संसार ज्ञान से प्रकाशित हो जाता है, और यदि वह दूषित बुद्धि एवं कुविचारों से युक्त हो तो अज्ञान का अंधकार छा जाता है ॥

अहो रात बहु रंग ले, सुख दुःख दोइ तरंग । 
अहा सात सुर संग ले, नउ दिन नवल नयंग ।७९२।
भावार्थ : -- सुख और दुःख इन दो तरंगों के साथ दिवस और रात बहुंत सी अनुभूतियाँ लिए हुवे हैं । अहा सात स्वरों का प्रसंग किये नया दिन नए भाँति का है ॥

गए सयन भए निद्रा मगन , मूँदे नयनन रात । 
भासे चिद चेत तब जब, दरसे सूर प्रभात ।७९३। 
 भावार्थ : -- निद्रा मग्न हो कर रात जब सोने चले तो आँखें बंद हो गईं ।  प्रभात में जब सूर्य के दर्शन हुवे तभी जीवित होने का आभास हुवा ॥

जल लय लीन धरा तरी, ज्योतिर लय अगास । 
भाव प्रबाह तसहि थरी, आखर ऊपर बास ।७९४। 
भावार्थ : -- जल के लय की लीनता धरातल में हैं ज्योत की लय आकाश की और है । उसी प्रकार से भाव के प्रवाह गति धरातल पर होती है और अक्षर का निवास आकाश की ओर होता है ॥

आखर कापर पोत है, शब्द है क़तर छाँट । 
बाक सलाका सूत है, भाख बसन को साँट ।७९५। 
भावार्थ : -- अक्षर कपडा है । और शब्द की गई काट छाँट है । वाक्य सुई और सूत्र है जो भाषा रूपी वस्त्र को सिलता हैं ॥   

भाखा भनिन बहिर बसन, अर्थ कलेबर कार । 
भाव गति अंग प्रत्यंग, अन्तरात्मन सार ।७९६। 
भावार्थ : -- भाषाएँ,कहे गए कथन या वर्णन के बाहरी वस्त्र है और अर्थ कथन की शरीर आकृति है । भावों की गति अर्थात अनुभूतियाँ विचार आदि कथन के अंग प्रत्यंग हैं और ज्ञान रूपी सार,कथन की अंतरात्मा है ॥

अर्थात : -- "भाषाएँ अभिव्यक्ति का साधन मात्र हैं"

जब नैन पलक भइ नीच, पाए परम पद प्रेम । 
रयनइ जब बिरहन संग, राजत मंदिर हेम ।७९७। 
भावार्थ : -- जब प्रेम लज्जा से आबद्ध होता है, तब वह परम पद को प्राप्त होता है । और जब  वियोग से अनुरक्त होता है, तब वह अश्रुजल के मंदिर में विराजित हो जाता है ॥

बर कुल सील काया जस, बिद्या बित्त सनाथ । 
जे सात गुन परिखन पर, दानै कनिया हाथ ।७९८। 
भावार्थ : -- शास्त्रानुसार, वर का कुल ,सद आचरण, स्वास्थ, यश, विद्या, आर्थिक स्थिति, और घर में बड़ों का सुभाशिर्वाद , इन सात गुणों के परिक्षण पश्चात ही मात-पिता अपनी कन्या को दान देवें ॥

जोइ सँजोइ अग जग लग, को नउ कोउ पुरान । 
तेइ जोइ सर्बतस बर, जे करि जग कल्यान ।799। 
भावार्थ : -- संसार ने जीवन उपयोगार्थ समस्त सामग्रियाँ संग्रह कर रखी हैं, कोई प्राचीन है कोई नवीन है। वह सामग्री सभी प्रकार से श्रेष्ठ है, जो संसार का कल्याण करे ॥

बनिज कुसल के का मान, दाने धन तब मान । 
अघ अर्जन के का दान, करे तजन तब जान ।८००। 
भावार्थ : -- व्यापारी का क्या सम्मान, जब वह धन दान करे तब उसे मान । दोष कर्मों से अर्जित धन का क्या दान, जब दूषित करम त्याग करे तब उसे जान ॥ 





बुधवार, 18 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 78॥ -----

असत से सत जिते सदा, रहि बिनु वाके बास । 
राम रावन प्रान हरे, किए बिनु लंक निबास ।७८१।
भावार्थ : -- असत्य के वास में वासित हुवे बिना उस पर सत्य की सदा ही जीत हुई है । भगवान राम ने बिना लंका में निवास किए रावन के प्राण बिना ही हरे थे ॥

चाहत हो तो ऐसोइ हो, जस चातक की चाह । 
दरसत ससि तरसत सुधा, अधर अँगारन आह ।७८२। 
भावार्थ : -- लगन हो तो ऐसी ही हो जैसी चातक की लगी । शशी को देखते रहना और सुधा की तृष्णा करते हुवे अधरों पर अँगारे और आह लिए रहना ॥

रसै रसै रसना रसे, मधुरइ मुख रस तीत । 
तसहि दुःख दारुन रसनइ, जीवन जस जस बीत ।७८३। 
भावार्थ : -- जैसे जिह्वा को शनै: शनै: तीखी मीर्च, मीठी लगने लगती है । वैसे ही जैसे जैसे जीवन बितता है तीखा दुःख भी मीठा लगने लगता है ॥

अग जग लग परचार किए, ब्रम्ह अंड दिए फोड़ । 
अगजग की जानै नहीं, अगम गगन की होड़ ।७८४। 
भावार्थ : -- सारे संसार में प्रचार करते फिरे हमने ब्रम्ह अंडे को फोड़ दिया । चराचर का ज्ञान नहीं है और अथाह गगन को जानने की होड़ है ॥

लाल ललामिक लाइ की, बड़ी कसूती आँच । 
बैरागी मन राँच के, अनुरागी मन दे काँच ।७८५। 
भावार्थ : -- सौन्दर्यता पूरित लगन की आंच बहुंत ही पीड़ा दायक है । वैराग्य ह्रदय को यह अनुरक्त करते हुवे अनुरागी ह्रदय को पटका देती है ॥

अंग दुआरी जीउ द्रव, रीसत बूँदइ बूँद । 
आई जामिन जामिके ,नयन सोच के मूँद ।७८६। 
भावार्थ : --  अंगों के नौ द्वारों से जीवन रूपी द्रव बूंद बूंद कर रिसता जा रहा है । जब भी रात्रि आए तो इसकी रखवाली करते हुवे आँखों को सोच समझ कर बंद करनी चाहिए, कहीं ये सदैव के लिए ही बंद न हो जाएं ॥

सीपि सिंधु माहि समाए, सिंधु न सीप समाए । 
मानख मन सरूप सीप, ज्ञान सिन्धु तर जाए ।७८७। 
भावार्थ : - सीपी समुद्र में समाती है, समुद्र सीप में नहीं समाता । मनुष्य का मन भी सीप के सदृश्य है, जो ज्ञान रूपी समुद्र में तैरता हुवा चला जाता है ॥

आपन साख आप चरे, जब राखत जग प्रेम । 
कुंभज चाख सीत करे, तब धारत जग हेम ।७८६।  
भावार्थ : -- अपने विचारों पर स्वयं अनुगमन करने से ही, संसार उन विचारों से आकर्षित होता है । जैसे कुम्भ में भरा जल जब कुम्भ द्वारा स्वयं ग्रहण होने पर शीतलता को प्राप्त होता है, तब ही लोगों द्वारा वह ग्रहणीय होता है ॥

गुरु ज्ञान गुन बारि बवन, बनबारी उपजाए । 
को बनाबन को भोजन, को कन बहुरि बियाए ।७८९। 
भावार्थ : -- गुरुवर की ज्ञान वर्षा और उनके गुणों के बोए गए बीज, वन वाटिका में उग गए हैं । अब इनमें से कोई कण खरपतवार स्वरूप  किसी काम के नहीं होंगे, कुछ भोजन बनेंगे, कुछ एक बीज बनेंगे जो पुन:बोने के काम आएँगे ॥

ज्ञान सरूप अगन बसन,भए चित सन संजूत । 
सद गुन धातु सोधन कर, दुरगुन भस्मी भूत ।७९०। 
भावार्थ : -- ज्ञान रूपी अग्नि वस्त्र जब चेतना से संयुक्त होते हैं, तब वह सद्गुण रूपी धातु को शोधित कर दुर्गुणों को जला कर राख कर देते हैं ॥








मंगलवार, 17 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 77॥ -----

विधात धरा सकल जोए, धराऊ रुप सँजोए । 
जीवन दीपक जारनै, संजुत जूत लेँ सोए ।७७३। 
भावार्थ : -- विधाता ने धरती की समस्त वस्तुएँ धरोहर स्वरूप में संचित की हैं । जीवन रूपी दीपक प्रदीप्त रहे, इस हेतु इन वस्तुओं को मिलजुल कर सावधानी पूर्वक ग्रहण करना चाहिए ॥

काल करम कर लेखनी, मस्तक किए पट लेख। 
लखित तस जस कारिते, बढ़ पढ़ आँखिन देख । ७७२। 
भावार्थ : -- समय ने कर्मों को लेखनी करते हुवे मस्तक को लेखन पट बनाया है । जैसे कार्य किये हैं वैसा ही उल्लेख है बढ़ो पढो और अपनी करनी अपनी  आँखों से देखो ॥

सुरता कारत अजहुँते, सुमिरन कारत काल । 
जगत खेत करमन जोत, गुनकन लखन पयाल।७७३। 
भावार्थ : -- वर्तमान का ध्यान कर; भूत,भविष्य,मृत्यु, पातक, दोष जैसे हानि कारकों का स्मरण करते हुवे इस संसार क्षेत्र में अपने कर्मों की जोताई करनी चाहिए क्योंकि मनुष्य के सद्गुण,अवगुण ही अन्न कण होंगे और उसके शुभ-अशुभ लक्षण पयाल(अन्न कण निकालने के पश्चात बची डंठल) होंगे ॥

सँजोउ करम बर रछका ,राखे लाखन लाख। 
करत कारज करम अंत ,राखे लाखन राख ।७७४। 
भावार्थ : -- सावधानी कर्मों की उत्तम प्रहरी है, जो बहुंत सी विशेषताओं से युक्त है ।  यह कार्य के सम्पादन होने तक उसकी अत्यधिक सुरक्षा करती है ॥


प्रानाधारे प्रनिधान, प्रानी करम अधार । 
जगत अधार धरे धरा, धरा सेष सिरु धार ।७७५। 
भावार्थ : -- प्राणी कर्मों पर आधारित है, प्राण कर्मफल के त्याग व्यवहार पर आधारित है । प्राणी जगत को पृथ्वी धारण किए हुवे है और सेष रह गया उस पर पृथ्वी आधारित है ॥

कारना के कारक करि, पातक करम निपात । 
जे धारना धारे ते, पतिते न धर्म जात ।७७६। 
भावार्थ ; -- दोषपूर्ण पाप कर्म, वेदनाकारक होते हुवे विनाश का कारण बनते हैं ।यदि  ऐसी धारणा धारण की जाए तो धर्म-जाति व्युत नहीं होता और विचारों का पतन नहीं होता ॥

करम कार कल्यान कृत, अकरम परिहर कार । 
तेइ कारक  निषेधाधृत,जे करि बिषय बिकार ।७७७। 
भावार्थ : --कल्याण कारित करने वाले कार्य ही कर्म हैं, त्याग कार्य अकर्म है । वे कारक निषिद्ध कर्म को धारण करते हैं जो विषयों में दोष-विकार उत्पन्न करते हैं ॥


रविवार, 15 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 76॥ -----

दुआ गो दरबारे-सर ,झूके सों सरताज । 
माँग रही सरकार पर,सरदर सर अफ़राज ।७६१। 
भावार्थ : -- दुआ माँगने वाले,  खुदा के दरबार में उसके सम्मुख सर झुका के दुआ माँगते है । और उंचे स्थान पर आसीन होकर, घमंड से भरी ये सरकार सामने सर उठाए पता नहीं क्या मांग रही है ॥

दीन दार जो मतलबी, सो तो बेईमान ।
इरादे-रहम पाक वो, सच्चा मूसलमान ।७६२। 
भावार्थ : -- जो अपनी गरज के लिए धर्म में यकीं रखता है, माने कि गरज पूरी हुई धर्म गया भाड़ में वह तो बेईमान है ।  जिसके इरादे नेक हो पाक हो जो मेहरबाँ हो रहमान हो,  वही सच्चा मूसलमान है ॥

सौ नाम धरे सरकार, सौ सौ हाथ जबान । 
तेरी फेरी फेर के, ले जावै मत दान |७६३ |  
सौ नाम होना = अनेक त्रुटियाँ होना 
सौ  हाथ जबाँ होना = चटोर होना, स्वाद लोलुप होना  
भावार्थ : -- सरकार किसी की हो, उसमें अनेक त्रुटियाँ हैं,  स्वाद की लालची भी है अर्थात खाने खिलाने में उस्ताद है । चतुर इतनी है कि जिसको तूने फिरा दिया उसको भी फेर के तेरा वोट निकाल लेगी। अत: अपना वोट रूपी हीरा संभाल के रख ॥ 

क्रोध अजान कटुक बचन, दंभ दर्प अभिमान । 
तिन्ह सों सकल अनाचरन, आसुरि सम्पद मान ।७६४। 
 ----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ॥ -----
भावार्थ : -- क्रोध, अज्ञानता, कड़वे वचन, दम्भ, दर्प एवं घमंड । ऐसी सभी संपत्ति उद्दंड एवं असभ्य व्यक्तियों की संपत्ति के सदृश्य होती है ॥ 

का भगती अरु का भजन, पूजन का उपवास । 
जे कहाबत तिनकी जो  , आप उदर के दास । ७६५। 
भावार्थ : -- क्या सेवा-भक्ति कैसा भजन, क्या पूजा क्या उपवास । यह कहावत उनकी है जो अपने पेट के दास हैं ।। 

अर्थात : -- "जो अपने पेट का दास है, वह जनार्दन की पूजा कभी नहीं कर सकता " 
                    ----- ॥ शेख सादी ॥ -----

जब लग तुम तम आपना, मेट हुँत न संजोए। 
तबलग तुम्हरे उद्धरन, कार सके ना कोए ।७६६। 
 ----- ॥ स्वामी रामतीर्थ ॥ -----
संजोए = तैयार 
भावार्थ : -- "जब तक तुम स्वयं अपने अज्ञान को दूर करने हेतु कटिबद्ध नहीं होते, तबतक तुम्हारा कोई उद्धार नहीं कर सकता "

कृत जग जोग बिग्यान, त्रेता जुग जग्यान । 
द्वापर जुग तपस चरन, कलि कल्यान प्रधान ।७६७। 
 ----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : --सतयुग में योग और विज्ञान  की प्रधानता है, त्रेता युग में यज्ञ की प्रधानता है । द्वापर में तपस्या प्रधानता की है एवं कलयुग में कल्यान की प्रधानता है ॥ 

गड़हा गड़े सिखर चढ़े, प्रभु दरसन ना होए । 
जाके मनो भाव बड़े, दरसन पावै सोइ ।७६८। 
  ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- गड्ढे में गड़ने से, शिखर पर चढाने से महत्तत्त्व स्वरूपी के दर्शन नहीं होते । जिसके मन की भक्ति विस्तृत परिणाम वाली हो उसे ही ईश्वरीय महत्तत्त्व का योग प्राप्त होता है ॥ 

 लोचन कन अहहै कबित  , ह्रदय कबित आधार । 
होई जन कबिताकार, जोई रोवन हार ।७६९। 
 ----- ॥ एंड्री ॥ -----
भावार्थ : -- आँसू  एक  काव्य है, हृदय उस काव्य का आधार है । रोने वाला प्रत्येक व्यक्ति कविताकार है ॥ 

सरीर अमले नीर सों, मन अमले सों साँच । 
अंतस अमले धर्म सों, मति ज्ञान सोंह राँच ।७७० । 
 ----- ॥ मनु स्मृति ॥ -----
भावार्थ : -- शरीर जल से पवित्र होता है, मन सत्य से, आत्मा धर्म से, बुद्धि ज्ञान से पवित्र होती है ॥ 










शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 104 -----

" एतना बड़ा महला.....एतना बड़ा महल्ला.....वो भी बिना महिला.....फिर एतना बड़ा हल्ला.....चमत्कार है"

राजू : -- मास्टर जी! माने की 'बिन महिला का मकान हिला'.....माने की महा चमत्कार,
            और किंचित उ महा नियायाधिस से पूछिए तो, जब दफा उही.....जुरम उही.....तो उ बछवा बेशाख्साँ थे इसलिए गिरफ्तार नहीं हुवे, कि गिरफ्तार नहीं हुवे इसलिए बेशाख्साँ थे.,

मकान हिला = हल्ला मचा
बेशाख्साँ = निर्दोष 

----- ॥ दोहा-दशम 75॥ -----

"अपराधी कौन नहिं" कहत, बाल्मीकि कविराज । 
जे जन करत पश्चाताप, ते जन जोग समाज ।७५१। 
भावार्थ : -- " न कश्चिन्नापराध्यति" ( युद्धकाण्ड ११३/४५) कविराज वाल्मीकि कहते हैं : -- अपराधी कौन नहीं है ?अर्थात सभी अपराधी हैं, जो व्यक्ति पश्चाताप करते हैं, वही व्यक्ति समाज के योग्य हैं ॥

देइ दान भगत समान, लेइ दान भगवान । 
जेइ कार किए आपनै, तेइ धार पद मान ।७५२। 
भावार्त्थ : -- दान दिया सो भक्त हुवे, दान लिया सो भगवान । जैसा आपने कार्य किया वैसा आपका पद उद्धृत हुवा, अर्थात यदी 'लेन-देन' किया, सो तो आप व्यापारी हुवे ॥

कुंज कलित लोचन ललित, रह चाहे को बास । 
भाव भीत जँह ना बसे, सो तो उजड़ निबास ।७५३। 
भावार्थ : -- उद्यानों से विभूषित सुन्दर झरोखों वाला घर हो, चाहे ऐसे किसी भी वास में वासित हों । यदि उसके भीतर प्रेम का वास नहीं है तो वह उजड़ा निवास है ॥

एक पुर दरसत हरि हीर, एक पुर दिरिस पहार । 
जे कलित भगति हार करुँ ,कारुँ कौन जे कार । ७५४। 
भावार्थ : -- एक ओर भगवान स्वरूप हीरा दर्शित हो रहा हैं, दूसरी ओर पहाड़ का दृश्य । हीरे को भक्ति की माला में विभूषित कर लूँ किन्तु इस पहाड़ का क्या करूं ॥

नारी के अंतर थाह, पुरुख बहिर बिस्तार । 
जस धरनी गहनइ गाह, अम्बर महिमापार।७५५। 
भावार्थ : -- नारी के अंतस की थाह एवं पुरुष के बाहर का विस्तार, ऐसे हैं जैसे धरती की गहराई की गाथा और आकाश की अनंत महिमा ॥

ठाढ़े एकै थरी थंभ, जे पथ जोख निहार । 
आपै पंथ कलित लंब जे एक चरन पसार ।७५६। 
भावार्थ :-- यदि प्रतीक्षा करते रहे तो एक ही स्थान पर खड़े रहते हुवे जड़ हो जाओगे । जो एक पैर बढाया, पंथ लंबित होकर स्वत:विभूषित हो जाएंगे ॥

विभूषित भाव भाँवरे, करत कबित कल भाख । 
लगन लगाईं लेखनी, लाहत लावन लाख ।७५७। 
भावार्थ : -- भाषा सुन्दर कविता कर रही है, अलंकृत किया हुवा भावफरे ले रहा है, लेखनी लगन बांधे अत्यधिक सुशोभित हो रही है ॥

मति गति सोई संचरै, जापे जपनी जेइ । 
हरिदै भाव गहन करे, जे दृग दरसन देइ।७५८। 
भावार्थ : -  जो ध्वनि निरंतर मुखरित होती रहती है, मस्तिष्क के मार्ग में तत् सम्बंधित विचार संचारित होते हैं, ह्रदय वही भाव ग्रहण करता है, जो द्रष्टि में दृश्यमान होता है ॥

जोइ जे कला कौशला, सिद्ध भै सोइ नेम । 
तिन कला सबहिं कर सकै, भगति सेव सुभ प्रेम ।७५९। 
भावार्थ : -- जो जिस कला का कालाकार होता है वह उसी के अनुसार ही कृतार्थ होती है । किन्तु इन कलाओं के सभी कारूक हो सकते हैं भक्ति, सेवा, कल्याण, और प्रेम ॥

धाराधर में अमृत है, धाराधर मैं धार । 
जे एक बारी सार दे, धारइ धार निकार ।७६० । 
धाराधर = बादल, तलवार
निकार = बाहर निकालना, बंधन आदि से मुक्त करना, रकम जिम्मे करना
भावार्थ : -- बादल में अमृत है, तलवार में धार है, यदि इसे एक बारी सार दें तो यह रक्त की धाराएं बहा देगी,  महा वृष्टि का स्वरूप लेते हुवे घर की सारी जमा पूंजी निकाल देगी, उधार देने वालों को धक्का देते हुवे बहार निकाल देगी, और ली हुई उधारी को चुकता भी कर देगी ॥





रविवार, 8 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 73॥ -----

दोष दूषित मत विचार, कारन  कुल के नास । 
कुल नास सन धर्म नसे, तँह भए अघ के पाश ।७३१-क ।  

पातक कुल जन दूषिते,पातक करत बितान । 
जाति धर्म नस नय पतन, भए संकर संतान ।७३२-ख।  
भावार्थ : -- दोष युक्त विकृत मत एवं विचार  कुल के विनाश का कारण होते हैं । कुल नाश के होते ही कुल
धर्म का नाश हो जाता है । ऐसी नश्वर प्रक्रिया से मनुष्य पातक कर्म से बंधता जाता है ॥

यह पाप विस्तारित होता है तो कुल के स्त्री पुरुष दूषित हो जाती हैं परिणाम उत्तम गुण लक्षणों एवं विचार समूह से रहित पतन की ओर ले जाने वाली, संकर संताने ( दो या दो से अधिक जाति वर्ण अथवा धर्म के प्रसंग से उत्पन्न सन्तति ) उत्पन्न होती हैं, यही गीता के प्रथम अध्याय का सार है ॥

दोषन दूषित भावना,, जेतक धारे भाव । 
कारित दुजन अहित करे, तेतक कार प्रभाव । ७३२-क।

गुण ग्राम धर्म भावना , जेतक धारे भाउ । 
दूजन कारत भलाई ,तेतक कार प्रभाव ।७३२-ख। 
भावार्थ : -- दोष-विकारों से युक्त भावना, जीतने अधिक भाव गरहन करेगी । जब वह कार्य रूप में परिणत होगी प्रभावशील होकर दूसरों का उतना ही अहित करेगी ॥

उसी प्रकार, सद्गुणों का स्वभाव समूह जितने अधिक भाव ग्रहण करेगा, वह उतना अधिक प्रभाव शील होकर दूसरों का उतना ही हितकारी होगा ॥

नर राउ नारी सैन, गेह सदन भए राज । 
तब संचारित जन तंत्र,  जब दोउ केरि काज ।७३३-क । 

नर राउ नारी सैन, गेह सदन भए राज । 
नारि कर्मन सैन तंत्र  राज तंत्र नर काज ।७३३-ख । 


भावार्थ : -- गृह सदन रूपी राष्ट्र में नर राष्ट्र प्रमुख है और नारी सेना है । जब राष्ट्र में दोनों कार्य ( नारी के सन्दर्भ में गृह कार्य भी)करते हैं तो समझो की घर में लोक तंत्र है ॥

यदि केवल नारी कार्य करे तो समझो सैन्य तंत्र है, यदि केवल पुरुष कार्य करे, और नारी  नौकर चाकर से कार्य करवाए तो समझो घर में  राजतंत्र है ॥

मानख माने काल क्रम, धरनी गति आधार  । 
गगन सिन्धु सौर मंडल, बरे बहुस बिस्तार  ।७३४-क।  
भावार्थ  -- मानव काल गति की गणना पृथ्वी की घूर्णन गति के आधार पर करता है ॥ (पृथ्वी के अपने अक्ष पर की एक पूर्ण परिक्रमा करने पर एक दिवस होता है एवं सूर्य के एक परिक्रमा पूर्ण करने पर एक वर्ष होता है ) किन्तु सौर मंडल का भी एक वृत्तव्यास ग्रहण किये हुवे है जो गति शील है, उसकी एक पूर्ण परिक्रमा का मान क्या होगा ? यदि सौर मंडल गति शील है, तो फिर आकाश गंगा भी अवश्य ही गति शील होगी, उसकी एक पूर्ण परिक्रमा का मान क्या होगा ?

सौर मंडल के परिकर, जदि सत काल कहाए । 
गगन सिन्धु के परिकरन, को कहु का कहि जाए ।७३४-ख। 
भावार्थ : - यदि सौर मंडल की एक पूर्ण परिक्रमा को एक शताब्दी ( मान निकालने पर यदि वह सौ वर्ष के बराबर हो )   कहा जाए । तो फिर आकाश गंगा की एक पूर्ण परिक्रमा को क्या कहा जाए एक युग ?

धरनी सहित नौग्रह इब, भँवर भरे का तार । 
तब कौन भए मझधार, कौन खड़े प्रस्तार ।७३५ -क। 

सून मध प्रस्तार में हैं, ॐ नाम के संत । 
सून ॐ के भाग दे, भए फल भूत अनंत ।७३५-ख 
भावार्थ : -- पृथ्वी सहित नौ ग्रहों के जैसे क्या तारे भी परिक्रमा कृते हैं ? यदि करते हैं तो केंद्र में कौन है, और वृत्त की परिधि में कौन है ?

 यदि ( आकाश गंगा के) शुन्य केंद्र में है और माना कि वृत्त की परिधि में ॐ है फिर उसका भाग फल अनंत आएगा ॥

किंकनि नथ मुँदरि कंगन, चूरी बिरिया हार । 
घुँघची घुँघरु भुज बंधन, टीका कंठी घार ।७३६-क। 

भव बिभूति के आभरन जुगत बारह प्रकार । 
पावन भेष विभूषिते, कर सोलह सिंगार ।७३६-ख। 

भावार्थ : -- १०) नूपुर २) किंकिणी ३) हार ४) चूड़ी ५) मुद्रिका ६) कंगन ७) बाहु बंद ८) कंठ श्री ९) बेसर ( नासिका के आभूषण ) १०) बिरिया ( कर्ण आभूषण) ११) टीका (मांग टीका) १२) घुंघची (चूड़ा मणि, शीशफूल)

माता श्री लक्ष्मी को निर्मल वस्त्रों से विभूषित  करते हुवे, इन बारह प्रकार के आभूषण से युक्त कर उनका सोलह श्रृंगार करें

टीका : -- "आभूषण उपरोक्त बारह प्रकार के होते हैं"

करतन अकरन बाँध्या, भइ करतब सो कार । 
करतन अकरन खोल्या, कहत सोइ अधिकार ।७३७-क। 

एक दु बार के अनुरोदन, कहत तिन्ह अनुरोध । 
बार बार बरपुरुख गह  , सो तो बलात् होत ।७३७-ख।  
भावार्थ : -- किसी कार्य को करने अथवा न करने कि बाध्यता कर्त्तव्य है । किसी कार्य को करने अथवा न करने की स्वतंत्रता ही अधिकार है ॥

एक दो बार का अनुरोदन, प्रार्थना  कहलाता है । बार बार का अनुरोदन, अनुचित दबाव ग्रहण कर बलात् अथवा हठ का स्वरुप ले लेता है ॥

टीप्पणी : - "मत दान करना एक अधिकार है कर्त्तव्य नहीं, इसे दान करने हेतु हम स्वतंत्र हैं बाध्य नहीं।"

प्रात किरन पानि परसत, भए पत पदम् प्रफूर । 
रात पानि म्लानि मिलत , भयउ सब एकै कूर ।७३८-क। 

पुरस्कार भए परिष्कृत, जोइ परसे सुजोग । 
भयउ असंस्कृत तब जब, परसे कोउ अजोग।७३८-ख। 

भावार्थ : --  जो पद्म पत्र भोर में किरणों के हाथों का स्पर्श प्राप्त कर प्रस्फुरित हो उठते हैं वही पत्र  रात्रि के हाथों की मलिनता का स्पर्श प्राप्त कर मंद कान्त होते हुवे एक ढेर में परिवर्तित हो जाते हैं  ॥

उसी प्रकार : --  सुयोग्य हाथों के स्पर्श से पुरस्कार सुसंस्कृत होते है, अयोग्य हाथों का स्पर्श उन्हें असंस्कृत कर देता हैं ॥

काल के कौन बिस्बास, आए काल बन काल । 
मराल को कागा किये, कागा किये मराल ।७३९। 
भावार्थ : -- कल का क्या भरोसा है, कल वह मृत्यु बन कर आ जाए । कल हंस कौआ हो जाए और कौआ हो जाए अर्थात रावण जैसे विद्वान को कल ने स्त्री हरण करने वाला डाकू बना दिया था, और डाकू रत्नाकर जो विद्यमान समय के आतंकवादी जैसे थे उसी स्त्री के पिता स्वरुप में महर्षि वाल्मीकि बना दिया था ॥

अर्थात : -- "कल की केवल कल्पना की जा सकती है, और कल्पनाए कुछ एक ही साकार स्वरुप होती है"

रंग धरे सब कमल ने, कीच धरा के साथ । 
मेहदी पाहन पिस गइ, लाली लसाए हाथ ।७४०। 
भावार्थ : -- सारे रंग सारी अनुभूतियाँ कमल का फूल ले गया, कीचड़ धरती में रहा । मेहंदी बिचारी पत्थर में पीस गई । उसकी लाली से हाथ सोना हो गया ॥

  

शनिवार, 7 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 71॥ -----

गिनती के दिन रैन हैं, गिनती की है साँस । 
काल कर्मन माप जोग, लिए खडा दंड पास ।७११। 
भावार्थ : -- (क्योंकि) इस भाव संसार में प्राणियों के दिवस एवं रैन गिनती के ही हैं, और गिनती की ही उनकी साँसे हैं । मृत्यु दंड का पाश लिए सर ऊपर खडी है, और नियती और समय को माप रही है ॥

काल गति अति कार्पनइ, ऊपर एकहु न दाए । 
जेतक सारे सौर साँस, तेतक चरन लमाए ।७१२। 
भावार्थ : -- समय की गति भी बड़ी ही कंजुस है । उसने माप के दिन रेन और साँसे दी हैं वह एक भी अधिक नहीं देगी । सांसों की चादर की जितनी पसार है, उतने ही पाँव फैलाने चाहिए ॥ 

देखन मैं जागा लगे,मूरख गहरी निंद । 
सुधिगन जागे सोवते,जूँ श्री हरि अरविंद ।७१३। 
भावार्थ : -- बुद्धिहिन देखने में जागृत दिखाई देते हैं किन्तु वे गहरी नींद में होते हैं । किन्तु प्रबुद्ध जन शयनित अवस्था में भी जागृत रहते हैं जैसे भगवती के कमल सदृश्य स्वामी शयनित अवस्था में भी जागृत रहते हैं ॥ 

माया दीपाकार धरे, कायाकार पतंग । 
रागन सकल अंग जरे, चित किए कारे रंग ।७१४। 
भावार्थ : --भोग विषयों की साधन स्वरूपा यह माया दीपक के आकृति किये है । और यह काया की आकृति पतंग जैसी है ।  इससे अनुरक्ति होने पर यह समस्त अंगों जला कर भस्म करते हुवे अंतस को कलुषित कर देती है ॥

चित्त चेतस चीते जब, करन कोउ कल्यान । 
पहिलै त्याग होत बर, तेइ पर होत दान ।७१५।
भावार्थ:-- अंत:करण  का ज्ञान विवेक जब किसी का कल्याण करना चाहे, तो उस हेतु सर्वप्रथम असुंदरता  का त्याग श्रेष्ठ होता है, तत्पश्चात सुन्दरता किया हुवा दान श्रेष्ठ होता है ॥

आपन देह ढकाई के, बानी देइ उघार । 
धुनी लवन सिलाई के, दे पट रुप सिंगार ।७१६। 
भावार्थ : -- अपनी देह को आच्छादित कर  लिया किन्तु मुख की देह वाणी अनाच्छादित रही । सुन्दर शब्दों को बुन कर फिर ऐसे वस्त्र वाणी को पहना के उसका रूप-श्रृंगार करें ॥

मन के अंग अनेक हैं, मन के रंग अनेक । 
जिन अंग प्रियतम बसे, वाके रंग प्रबेक ।७१७। 
भावार्थ : -- ह्रदय के अनेक खंड है, ह्रदय की अनेक अनुभूतियाँ हैं । जिस खंड में प्रियतम का वास है,
उसकी अनुभूति सर्वोत्कृष्ट है ॥

 नयन पलक में हेमबर, राखे बहुसहि रंग । 
कोउ बिरहन आभूषित, को भूषित पिय संग ।७१८। 
भावार्थ : -- पलकों में विभिन्न रंगो एवं अनुभूतियों के मोती  सुशोभित हैं । कोई वियोग स्वरूप  में आभूषित हैं, तो कोई प्रीतम के संयोग रूप में विभूषित हैं ॥

प्रीति माँगे ह्रदय देस, देही माँगे काम। 
मति माँगे मत गुन ज्ञान, मुख माँगे हरि नाम।७१९। 
भावार्थ : --प्रीति  हृदय में स्थान की मांग करती है देह काम की मांग करती है, बुद्धि ज्ञान एवं गुण युक्त विचारों की मांग करती है तथा मुख ईश्वर के नाम स्वरूप उसके वर्ण-व्याख्या की मांग करता है ॥

कायाकर हरिदै कमलिन, बासे आसन कंत । 
सोंह जीवन जोत बरे, होए जान कब अंत ।७२०। 
भावार्थ : -- यह काया आकर स्वरूप है और हृदय कमलिन के सदृश्य है जिसके आसन में प्रियतम निवासित हैं ।प्रियतम के सम्मुख जीवन रूपी ज्योत प्रज्वलित है जाने कब यह ज्योत बुझ जाए ॥










  




बुधवार, 4 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 70॥ -----

देइ ज्ञान करम इंद्रिय, पूरन कार सरूप । 
कारु काया कल्प मनुज,   किए जगत सूर  भूप ।७०१ । 
भावार्थ : -- विधाता ने मनुष्य देह की रचना करते हुवे उसे पूर्ण रूप से सक्रिय पांच ज्ञानेद्रियाँ ( नयन, कर्ण, नासिका, रसन, चर्म) एवं पांच कर्मेन्द्रियाँ ( हस्त,पद,वाक्,गुदा,उपस्थ) दीं, और उसे  सबसे शक्तिशाली प्राणी बनाकर संसार का राज घोषित कर दिया ॥

पसु पाख कंठ देइ सुर, सेष किये सुरहीन । 
मनख के मुख मुखरिते, केरे सकल अधीन ।७०२। 
भावार्थ : -- पशु-पक्षी के कंठ को केवल स्वर दिया, और अचर प्रकृति को स्वरहिन किया । मनुष्य के मुख को शब्दायमान कर सारी सृष्टि उसके अधीन कर दी ॥

कारी काय कारन तिन, करे भूत के जोग । 
कारन भावन भूर के, लगे भाव भव भोग।७०३। 
भावार्थ : --  (मनुष्य की ) काया की रचना इस उद्देश्य से की गई कि वह पञ्च भूत की रक्षा करे । पर उत्पत्ति उद्देश्यों को विस्मृत कर मनुष्य केवल सांसारिक सुख को साधने में ही अनुरक्त है ॥

लाह लालस लोभ मात , लोभ पाप के तात । 
कलुखित कारज कारनी, करे दोष के धात ।७०४। 
भावार्थ : -- लाभलिप्सा लोभ की माता है, और लोभ पाप का पिता है । यह पाप ही है जो कलंकित कार्य कारित करने की प्रेरणा देता है,और दोषों के योग्य बनाता है ॥

धर्म अर्थ दौ सारनी, दोनउ महत प्रभूत । 
एक करमन की कारनी, दुजे फल वसीभूत ।७०५। 
भावार्थ : -- दो प्रणाली है धर्म एवं अर्थ, दोनों अपने अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं । धर्मप्रणाली  कर्म की प्रेरक है फल का नहीं,  जबकि अर्थप्रणाली फल के अधीन है ॥

अर्थ अगार के भित जदि, सारे धर्म अधार ।
फल के दोषन परिहरत, धारे सकल अभार ।७०६। 
भावार्थ : -- अर्थ के भवन की भित्तिका, धरम की नींव पर प्रस्तारित करना चाहिए । धर्म, परिणाम में निहित दोषों का  परित्याग करता है, एवं अर्थ के आगार का समस्त भार भी वहन कर लेता है ॥ जैसे "किये गए प्रसंग से पुत्र की कामना" यहाँ किया गया प्रसंग अर्थ है, और पुत्र फल है । 'निमित्त मात्र प्रसंग' अर्थात मात-पिता निमित्त मात्र हों, परिणाम परिस्थिति के हाथों में हो तो वह धर्म है ॥

साधन उपजोग जिउ पथ, चरत भेद लखि देस । 
उपभोग रत साधक हथ, भै भव भूषन भेस ।७०७।  
भावार्थ : -- साधन ( धन-संपत्त ,वस्त्र-वाहन , करण-कारण,हित-हेतु आदि )का यह कार्य है कि प्राणी इनका उपयोग सावधानी पूर्वक करते हुवे जीवन पथ पर संचालित होकर अपने काल रूपी लक्ष्य को सुगमता पूर्वक प्राप्त करे । किन्तु जो साधन संपन्न एवं भोगवादी हैं उनके लिए ये साधन वेश-भूषा हो गए हैं ।
जैसे : --निर्धारित स्थान पर पहुँचने हेतु  केवल एक साधारण वाहन ही पर्याप्त है ,क्योंकि यह एक वाहन भी वही कार्य करेगा जो चमचमाते हुवे अथवा पंक्ति बढ वाहन करेंगें ॥

कार करम की कारनी, कार कारिका कार । 
कारे कंचन कोष कर, कूरा केर बहार ।७०८। 
भावार्थ :-- काले कर्मों की प्रेरक यह काला व्यापार काली वृत्ति एवं आजीविका ही है । इनसे एकत्र हुवा धन
संपदा भंडार का कूड़ा करकट एवं एकत्र हुवे दोषों का बहिष्कार करना चाहिए ॥

भव बंधन भाव ब्यूह,सकल जीव भव भीत । 
ते भाव मन्यु मोचिते, भए भव सागर  जीत । ७०९।  
भावार्थ : -- संसार में जन्म-मरण ही चक्र है और भौतिक सत्ता में अनुरक्ति व्यूह रचना है,समस्त प्राणी इस चक्र व्यूह से भयभीत हैं  ॥ जो मनुष्य आसक्त  से विरक्त अवस्था में इस चक्रव्यूह को भेदने में सफल होता है, वह मनुष्य इस संसार रूपी सागर को पार कर परम गति प्राप्त करता है ॥

उयउ उर अंतर दिनकर, जब किये ज्ञान प्रकास । 
भव बंधन मोचन केर, तामस गुन  के नास । ७१० । 
भावार्थ : --जब अंत:कारन में ज्ञान के सूर्य का उदयित होकर ज्ञान का प्रकाश प्रस्तारित करता है । वह अज्ञान, क्रोध एवं आलस्य आदि अँधेरों का नाश कर, भव बंधन के चक्र व्यूह को भेदन करने में समर्थ होता है ॥











मंगलवार, 3 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 69॥ -----

घनाकर हिमबर बरसे उरबर देत किसान । 
दिन मनि कर धरनि हरसे धरे हरियारि धान |691| 

भावार्थ : - वर्षा ऋतु में मोती बरस रहे हैं, किसान खेतों में उर्वरक दे रहे हैं ॥ सूर्य की किरणें प्रापी कर्ण धरती  प्रसन्ना चित हो गई ॥ और धान, हरियाली से आच्छादित हो गए ॥

दै धान लै मूल थोर रहे रेवरी बाँट । 
तहँ मति राउ मद्य बोर,श्रमिक धन किये गाँठ । ६९२।  
 

भावार्थ : -- एक राज्य की लघु कथा है कि पहले तो उस राज्य के शासक ने, श्रमिकों को थोड़े मुल्य में अनाज देकर ललचाया । फिर उन श्रमिकों को मदिरा की लत लगाकर उनका सारा श्रम धन हड़प लिया ॥ 

सबहि बैठे चाक धरे माटी मोल बढ़ाएँ । 
मनहु पीछे पवन पड़े गगन धर सिर चढ़ाए |693| 

भावार्थ : -- चाक धरके सभी कुम्भकार बने बैठे हैं और मिटटी का मोल बड़ा रहे हैं । मानो हवा, धूल को गगन पर चढाने हेतु उसके पीछे ही पड़ गई है ॥ 

फरे तरु पाथर मारे उलटे मुँह पर आए । 
कर जोर जोर हिरकारे झर बेरी बरसाए । ६९४।  

भावार्थ : -- फलदार वृक्ष में पत्थर मारने से वह उल्टे मुख पर आता है । यदि हाथ जोड़ कर याचना करते हुवे हिलाया जाए तो फिर फिर झड़ते हुवे बेरी बरसाता है ॥

सौच मति मुख मृदुल भाख, अंतस सद अचार । 
कलंक हीन चारित ही, मानख सत ओहार ।६९५। 
भावार्थ : --" शुद्ध बुद्धि, मृदु भाषा, सदाचरण, निष्कलंक चरित्र ही मनुष्यके वास्तविक वस्त्र हैं..,"

कुम्भ कार कर कारु कर  मटके चाक बनाए । 
राखे ते जल बहोरे पटके ते बिसराए । ६९६ ।  

भावार्थ : -- कुम्भ कार के हाथ की कलाकारी है और घड़े चाक बना रहा है । इन घड़ों को यदि सम्भाल के रखा जाए तो यह जल संगृहीत करते हैं, क्रोधवश पटक देने से यह टूट जाते हैं ॥ 

कर पसार दल बहु खड़े सबहिं दल एक समान । 
'मत' लै करिया धन भरें दै मति दै मत दान । ६९७।  

भावार्थ : -- हाथ पसारे चुनावी दल तो बहुंत से हैं । किन्तु हैं सभी एक स्वरूप के.…. 'भ्रष्टाचारी.....ये  "मत" दान में लेकर फिर धरती और धरती वासियों की छांती  में मुंग दल के काला धन संगृहित करते हैं.....अत: इन्हें बुद्धि दान में देनी चाहिए अपना मत नहीं.....

दर्सक बिन दर्पन हीन बिन सँवरे सिंगार । 
दोउ दीन दरस अधीन दोउ दरप आधार ।६९८।

भावार्थ : -- दर्शक के बिना दर्पण दर्पण व्यर्थ होता है, प्रियतम के बिना श्रृंगार व्यर्थ होता है । दोनों अर्थात दर्पण और श्रंगार

गुरु सर निर्मल जल करूँ, मैं रूप अकारूँ  कीच । 
ज्ञानारविंद कर धरूँ, रहूँ चरन जल नीच। ६९९। 
भावार्थ : -- गुरु को सरोवर का निर्मल जल कारित कर, मैं स्वयं को सरोवर का कीच की आकृति करूँ ।  ज्ञान के कमल को हाथ में लेते हुवे सदा गुरु रूपी निर्मल जल के चरणों के नीचे ही रहूँ ॥

दुचारि चित अरु दुभाखें, नेता बन भुवन भूप । 
दुइ सिरु 
बरन रुधिरु रखें दुइ रसन रेतस रूप ।७००।
भावार्थ : -- ध्यान इधर-उधर , मध्यस्थ माने की दल्लू, ये नेता इस भूमि के राजा बने बैठे हैं । दुरंगी रक्त वाले, सर्प और गधे-खच्चर कहीं के, अपनी मृत्यु को आमंत्रित कर रहे हैं ॥  






सोमवार, 2 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 68॥ -----

अंतह करन पयस मान, देही नग नग तूल । 
जे गतागत गगन सरन, जे धरनी थिर थूल । ६८१। 
भावार्थ : -- अंतः करण जल के सदृश्य है । देह अविचल स्थूल पर्वत के समान है । अंत: करण, गगन मार्ग में आवागमन करते हुवे गतिशील है । और देह धरती पर ही स्थित रहती है ।।  

मानख काया कृतावधि, कल्प कलेवर कार । 
सीस मति एक अंतरतम, सह  अंग नउ द्वार ।६८२। 
भावार्थ : --रचनाकार ने मानव शरीर को निश्चित अवधि हेतु इस प्रकार की आकृति देकर रचा है कि शीश के अंतर में एक मस्तिष्क है, एक अंतरात्मा है, साथ में नौ अंग द्वारहैं ॥ मुख, दो कान नासिका के दो छिद्र, दो नेत्र, गुदा एवं उपस्थ । किन्तु कबीर ने दस द्वार माने हैं जिसमें एक ब्रह्माण्ड है । आधुनिक शरीर विज्ञान को आधारित करें तो मानव शरीर में ये छिद्र द्वार हैं : -- मुख, नेत्र, नासिका, कर्ण, स्तन, नाभि,योनि, गुदा इति ( चूँकि दो नेत्र नासिका के दो छिद्र, एवं दो कर्ण के एक ही कार्य है)  । नवम द्वार अन्वेषण के अधीन है मृत्यु के समय कदाचित यह आत्मा  के निकलने का मार्ग है और कबीर अनुसार यही ब्रह्मांड है ॥ 

टीका : -- अंग द्वार वह छिद्र हैं जो शरीर में ग्रहण एवं उत्सर्जन की क्रिया करते हैं ॥

देहाकृति अम्बरकार, अंतरतम खद्योत। 
नउ गृह नउ अंग द्वार, मति सीर्ष खग जोत।६८३। 
भावार्थ : -- देह को अम्बर की आकृति में आकारित करते हुवे यह ह्रदय सूर्य किया  । नव गृह नव अंग द्वार किये  । और यह शीश में मति चंद्रमा के सदृश किया ॥

नारी धरा नर खगोल, तेहि ह्रदय  खद्योत । 
भँवरत जाके भँवर पथ, जरी गृहस की जोत ।६८४।  
भावार्थ : --यदि नारी धरणी स्वरूप है, तो नर खगोल का रूप है, और उसका ह्रदय सूर्य है, जिसके भ्रमण पथ की परिक्रमा करते हुवे ही गृहस्थी की ज्योति प्रज्वलित रहती है ।।

नर नभ निलय नभ केतन, नारी रूप समूँद ।
कर्ष किरन काम सरूप, बरखे बादर बूँद ।६८५।  
भावार्थ : -- आकाश सदृश्य नर का सूर्य सदृश्य ह्रदय है । और नारी का रूप सागर स्वरूप है । चाह स्वरूपी किरणे रूप के सागर को कर्षित कर फिर स्नेह रूपी बादल से बूंदों की वर्षा करता है ॥

नारी भइ गर्भाधान क्षीर सिन्धु कृत कार । 
धरा धारी नाभि नाल, केसव नर श्री नार।६८६ । 
भावार्थ: - नारी गर्ववती हुई और गर्भ को क्षीर सागर के सदृश्य आकार दिया । नाभि नाल को शेषनाग की आकृति दी । गर्भस्थ शिशु यदि नर है तो विष्णु स्वरूप है और नारी है तो लक्ष्मी का रूप है ॥
 

दरसत जग दृग दिरिस दौ, अरोचित कोउ रोच । 
सर्जन सरजत लखन दो, को पवित कोउ पोच ।६८७ । 
भावार्थ : -- संसार में दो ही दृश्य दर्शित होते हैं । कोई शोभनीय कोई अशोभनीय । सृष्टि ने दो लक्षणों को रचा है, अच्छे लक्षण और बुरे लक्षण । जैसे प्रकाश के सह अन्धकार, सुख के सह दुःख, रूप के सह कुरूप,सद्गुण-दुर्गुण आदि ॥  

रहे ज्ञान अवशेष जब, वरधे भेस प्रताप । 
जे उपजै आप जाके, अंत आप ही आप ।६८८ ।   
भावार्थ : -- जब वेष के प्रताप में वृद्धि होती है तब ज्ञान का लगभग अवसान हो जाता है । यह अज्ञानता स्वयं ही उत्पन्न होती है जिसका अंत भी स्वयं से ही होना है ।

अर्थात : -- जीव के  स्वरूप का प्रताप स्थायी नहीं रहता, अंतरात्म का तपन ही चिर काल तक प्रकाशित रहता है, कारण कि जीव नश्वर है किन्तु उसका आत्म तत्त्व अनश्वर है ॥

नियम नियन्त तेइ बरित, जेइ बर पंचभूत । 
भव भाव भूषन सरूप, बरधे भू श्री यूत । ६८९।   
भावार्थ : -- वे ही नियम-नियामक वरणीय हैं, जो पंचभूत ( धरणी, अग्नि , वायु, जल आकाश ) एवं उसके यौगिक हेतु श्रेष्ठ हों । जो भौतिक संसार के अस्तित्व से स्नेह रखते हुवे उसके  आभूषण स्वरूप होते हुवे इस पृथ्वी की शोभा,संपत्ति,साधन आदि श्री समूहो का वर्द्धन करें ॥

पहिलै बाँधे डिम्ब रज, दूजन नाभिहि नाल ॥
बहुरि बाँधे भव बंधन, अस मानख की खाल ।६९०।
भावार्थ : -- विधाता ने मनुष्य को सर्व प्रथम रज और डिम्ब से बांधा, फिर नाभि नाल से बाँधा। तत्पश्चात उसे जन्म और मरण के चक्रव्यूह में कसा, मनुष्य की ऐसी ही प्रकृति है कि उसे नियमों में बांधना आवश्यक है ॥  













----- ॥ दोहा-दशम 67॥ -----

बरन बरन के बरन लै बर्तिक बट दै कास 
डार दीप पत ज्ञान कै तेर घारि कै चास |671|

भावार्थ: -- विभिन्न प्रकार के शब्द लेकर, बाती स्वरूप में कड़क बल दे । फिर उसे पत्र रूपी दीपक में डाल दे, तत पश्चात ज्ञान का तेल देकर उसे प्रदीप्त कर ॥ 

पड़ि पड़ि कै मनु मति मुरख पाथर मूरति कार । 
ज्ञान के मन मंदिर रख आखर दीपक बार |672| 

भावार्थ : -- हे मनुष्य,  पत्थर रूपी मंद मति को अध्ययन द्वारा मूर्ति आकार दे । उस मूर्ति को ज्ञान-मंदिर में रख कर अक्षरों के दीपक जला ॥ 

सुन्दरता सोहाग सरि सद चरित सोन सरूप । 
एक मूलहीन परे धरि त एक मूल मूलरूप |673| 

भावार्थ : -- सुन्दरता सुहागा के समान है, सुहागा सुन्दरता के समान है सदचरित्र स्वर्ण स्वरूप है स्वर्ण सद्चरित्र के रूप है । सुहागा, स्वर्ण से अलग होकर मूल्यहीन हो जाता है ।  सुन्दरता, सद्चरित्र से अलग होकर मूल्यहीन हो जाती है किन्तु स्वर्ण और सद्चरित्र का मूल्य अपने मूल रूप में ही स्थापित रहता है ॥  

पंथ पंथ में पत्र भरै पत्र पत्र में भर ग्रन्थ ।
धरा धरा हरियरि करै मत कर बट का अंत ।674। 

भावार्थ  -- रास्ते रास्ते पत्ते भरते हैं.., पत्ते पत्ते में ग्रन्थ रचते हैं.., धरती को हरी-भरी करते हैं.., पेड़ को मत काटो.....

भागी रे सरकार भागी धर पाँव सिर ऊपर | 
भागे भागे भूत के भाग लंगोटी धर |675| 
 
भावार्थ  -- ये सरकार अंत हुवा,  जो मिल रहा है वो ही ले लो.....

दाने दाने चून कै चून चून कै दान । 
छानी छाने घून कै तै दै चून पिसान |676| 

भावार्थ : -- (1 ) दाने दाने का चुनाव कर देखें कितने दाने है ।  छलनी से छान के घून देखें कितने हैं फिर आटा पिसवाएँ ॥ 
                 
( 2 )दाने दाने का चुनाव कर दानग्रहीता को छांट कर दान दे ।(छंटने पर भी नहीं मिले तो मत दें)  जो घून के जैसे हैं अर्थात दाने को खाने वाले हैं उन्हें देख परख कर कारावास की चक्की दें ॥ 

सठ के अवगुन कबि कहत लाज न ओटे अंग ।
निरख दूज जस कुंठ धरत उर पर लोट उरंग |677| 

भावार्थ : -- दुष्ट के अवगुणों को कवियों ने कहा है कि उनके तन पर लाज का आवरण नहीं होता । दूसरों का यश देख कर ये कुंठित होकर ईर्ष्या करते हैं ॥ 

काम   सनेहु   सब   जग   जन  चाम  चाँद   ना   कोए । 
जलधि जल घन, घन जलकन दिन कर दिनकर होए |678| 

भावार्थ  = काम को जगत में सभी जन सराहते हैं  चन्द्रमा  की सुन्दरता को नहीं । समुद्र के जलने से बादल एवं बादल से जल कण एवं दिन सूर्य के करने से होता है ॥ 

आँट साँट साठ जन कर गाँठ गाँठ दे काट ।
आँट आँट कर बुद्धिबर गाँठ गाँठ कर आठ  |679|

आँट साँट = षड़यंत्र
गाँठ = ग्रंथि
आँट = गूंथना

भावार्थ : --षड़यंत्र करने वाले व्यक्ति बहुंत है जो गठबंधन को षडयत्र पूर्वक काट देते हैं बुद्धिमान उसे गूँथकर आठ गाँठ करके रखता है...... 

'मत' लै मंडल माँडि कै बैठ सिंग सिस सिखर | 
कारे कार काण्ड कै भर कारा धनाकर |680| 

मत = वोट 
लै =  प्राप्त कर 
माँड कै = रचित कर 
सिंग = जैसे गधे के सिंग 
कारे = काले 
कार = किये 
काण्ड = प्रकरण, अध्याय 
कै = कितने 
धनाकर = धनकोष 

भावार्थ : -- मत को दान स्वरूप ग्रहण कर मंत्री मंडल मांड के शासक सर ऊपर बैठ गए हैं । काले काले अध्याय और प्रकरण करके केवल अपना ही धन कोष भरा है 

----- मिनिस्टर राजू 103 -----

" राजू! कल मुझे एक ठो  महापुरुख मिल गए थे"

राजू: -- हाँ तो मास्टर जी !

 " थे वर्ण क्रम चित्र के विचित्र  से वित्त चित्र, कहने लगे हम तो जात-पात को नहीं मानते"

राजू : -- हाँ तो उनके मानने न मानने से का होगा, लोग तो उन्हें पुरुख जात मानते हैं, हैं ना मास्टर जी! अब वो इ बोलें कि हम दुर्गन्ध मारते हुवे सड़े हुवे सांसद-विधायकों के बनाए बिल को नहीं मानते, तो फिर कौनो बात है.…. काहे की जब दुनिया  ने बड़े बड़े महर्षियों के लिखे वेद-पुराणों को नहीं माना, लोगों ने धर्म ग्रंथों में लिखी बातों को नहीं माना, लब्ध प्रतिष्ठित भारतीयों ने अम्बेडकर के लिखे तुच्छ से संविधान को नहीं माना.....तो इन सड़े हुवे सांसदों-विधायकों के विधेयकों को कौन मानेगा.....इसीलिए
                                      नियम नियन्त तेइ बरित, जेइ बर पंचभूत । 
                                       भव भाव भूषन सरूप, बरधे भू श्री यूत ॥ 
अर्थात : -- वे ही नियम-नियामक वरन करने योग्य हैं, जो पंचभूत ( धरणी, अग्नि , वायु, जल आकाश ) एवं उसके यौगिक हेतु श्रेष्ठ हों । जो भौतिक संसार के अस्तित्व से स्नेह रखते हुवे उसके  आभूषण स्वरूप होते हुवे इस पृथ्वी की शोभा,संपत्ति,साधन आदि श्री समूहो का वर्द्धन करें 

मास्टर जी! शेष सभी नियम न होकर केवल गुंडागर्दी है.....

रविवार, 1 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 66॥ -----

पवित भाव मन मात रुप, दरस देइ परदार । 
अपवित निज मात सरूप, दरसत बस एक नार /६६१ /
भावार्थ : -- पवित्र भाव से युक्त चित्त को, पराई स्त्री में भी माता का ही रूप दिखाई देता है । अपवित्र चित्त, स्वयं की माता के स्वरूप में भी एक स्त्री ही देखता है॥

मन मंदिर मति अगारे, अंतरात्म अधान । 
जैसी भावइ आरती , तैसे धारत भान ।६६२। 
भावार्थ : -- मस्तिष्क के भित्ति से घिरे मन के मंदिर में अंतर आत्मा स्थापित है ।  भाव एवं विचारों से उसकी जैसी आरती होती है, वह मूर्ति उसी प्रकार का आलोक धारण करती है ॥

साँस माँस रक्त सक्ती , अंतर आत्म  प्रान । 
सकल सार सरीर जौग, पंच भूत आधान । ६६३। 
भावार्थ : --देह के समस्त यौगिक तत्त्व, पञ्च भूत पर ही आधारित हैं ।  वायु से स्वांस, पृथ्वी से मांस(अंग), जल से रुधिर, अग्नि से विश्व पाचक(जीव शक्ति), और आकाश से अदृश्य  अंतरात्मा ॥

जे तेरे मन भीत भरे, संका कारि बिचार। 
सोच पट दुआरी धरे, करि दे धूँक बहार ।६६४।  
भावार्थ : --  तेरे चित्त के अंतर संदेह स्वरूप कलुष विचार वासित हैं ।  उन्हें बहिष्कृत करते हुवे विचार भवन की द्वार के पट बंद कर दे ॥

फिरत गेह उदयान भित, जदि गंधे संदेह । 
प्रतीति पौध लगाए के, सार सुगंध सनेह ।६६५। 
भावार्थ : -- यदि वह संदेह गृह उद्यान में ही भ्रमण कर रहा है एवं गंध दे रहा हो । तो विश्वास के पौधे रोपित करते हुवे स्नेह के सुगन्धित पुष्प से उसे दूर कर ॥

बन राज नयन बन राजि, बिचरत बन संदेह । 
सार गुण गह भोजनै, सारत हिरन सनेह ।६६६। 
भावार्थ : -- संदेह सिंह बनकर नयन वन के पलक स्वरूपी वृक्ष समूहों में विचरण कर रहा है । तो वह सनेह रूपी हिरन को विदारित कर, सार गुण ग्रहण करते हुवे उसे अपना भोजन बना लेगा ॥ 

रच प्रतीत का पिंजरा, रचइत प्रीति सलाएँ । 
धरत सील का पूतरा, केसरी अंतराएँ  ।६६७। 
भावार्थ : -- (पुन:) प्रीत से रचित शालाकोओं से, विश्वास के पिंजरे की रचना करते हुवे , उसके अंतर सदाचार का पुतले रखते हुवे, फिर वह संदेह स्वरूपी सिंह पिजरे में बंध जाता है ॥ 

चाहें करन साँच श्रवन, पहलै निज मुख धार । 
चाह नयन दिव्य दर्सन, कर निज कायाकार।६६८।   
भावार्थ : -- और यह कर्ण यदि सत्य सुनाने की अबिलाषा करते हैं तो वह सत्य सर्वप्रथम स्वयं के मुख पर स्थापित कर । नेत्र उसकी अलौकिकता के दर्शनाभिलाषी है तो सर्वप्रथम स्वयं की काया को देवोचित स्वरूप दे ॥ 

मन मत्त मति भरम भरे, जे एहि सम्मति मान । 
देही धरणी संचरै, अंतरात्म अधान ।६६९। 
भावार्थ : -- उन्मत्त चित्त, भ्रमयुक्त होकर विपरीत अवधारणा किए हुवे है ।  इस विचार को मान्यता देते हुवे कि,  देह जिसके अंतर में जीवात्म स्थापित है, गतिमान होते हुवे पृथ्वी में भ्रमण शील है ॥ 


सरल कल तरल धर्म जल, ते तुल तृपल कठोर। 
धारा तरंग गति धार, पर्वत एक हीं ठोर । ६७०। 
भावार्थ : -- जल तरल,सरल, प्रकृति का हिते हुवे ध्वनीकार है, पाषाण की प्रकृति जल की तुलना में कठोर है ।नदी-धारा एवं सागर-तरंग गति शील हैं किन्तु पर्वत एक ही स्थान पर स्थित है॥ 





----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...