शनिवार, 31 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 65॥ -----

बसै भीतर धौर हरा, मति मत ना बिकसाए । 
पहिनै कोमली कापरा, सदजन ना कहिलाए ।६५१। 
भावार्थ : --  बहु खंडी भवन एवं अट्टालिकाओं में निवास करने से विचार वर्द्धित नहीं होते । और बहुमूल्य वस्त्र धारण कर लेने ही से कोई चरित्रवान नहीं कहलाते ॥

काया बिधि करि थर चरी, माया जर न सुहाए । 
अंत समय पर मीन सम, छाँड़त तड़पत जाए ।६५२। 
भवार्थ : --विधाता ने इस काया को थलचर स्वरूप में रचा है इसे काया( भोग विषयों की साधन स्वरूपा, अति मोह)  रूपी जल नहीं सुहाता । जब अंत समय आता है तो मछली के जैसे इस माया रूपी जल को छोड़ते हुवे यह काया तडपती हुई जाती है ॥

काल कल्पना कार  पर काल जिआ ना जाए । 
सूर चंद्र निसदिन उगैं, काल आए ना आए ।६५३। 
भावार्थ : -- और इस कल की केवल कल्पना ही की जा सकती कल में जिया नहीं जा सकता । जैसे सूर्य चंद्रमा तो प्रत्येक दिन उदय होंगे यह कल्पना है किन्तु ये आँखें कल उन्हें देख पाएं या न देख पाएं, यह यथार्थ है ॥

पाछे त बहु लेख लिखे आगिन पारत काएँ । 
पाछे लेख सुमिरत कर आगिन बाढ़त जाएँ |654| 


भावार्थ : -- जब पीछे इतने लेख लिखे हैं, तो आगे क्यों रच रहे हो ? पीछे के लेखों का स्मरण कर के ही आगे बढ़ना चाहिए ॥ 

नारी नयन पीर भरी नीर भरी उरसीज । 
दोषु धनु के तीर धरी पौरुष तन के रीझ ।655।  

भावार्थ: -- नारी की आँखों में पीड़ा और स्तनों में पीयूष भरा है । और पुरुष, दोषों के धनुष-बाण रखे केवल नारी तन के प्रेमी हैं ।। 

बरन बरन के बरन लै रचि पचि कोटि पचास । 
चित्र काब्य कर पटी पै तै चौखट दे कास | 656|

भावार्थ : -- विभन्न प्रकार के अक्षर/रंग/स्वर लेकर उन्हें पचास बारी गढ़-छोल । चित्रपटी पर चित्र रूपक काव्य कर फिर उसे चौखट में चढ़ा ॥ 

कनक कलस कटि बिराजे उदके उद के अंक ।
जहँ उदके ऊत राजे तहँ उद बिदके रंक ।657। 

भावार्थ : -- स्वर्ण कुम्भ से सुशोभित कमर, पानी के आलिंगन हो उत्साह अतिरेक से उछल रही है । जिसे देखकर जैसे ही मुर्ख राजा उछला, वैसे ही प्रजा उठ कर भाग गई ।।  

किरन पानी परसन ते भै कन कंचन धार । 
एकु गाँछ के नैया रे खेवे खेवनहार |659|

भावार्थ :-- सूर्य के स्पर्श से या किरणों द्वारा पानी के स्पर्श से बिंदु-धारा स्वर्णिम हो उठी । पेड़ के एक ही तने से बनाई गई नाँव को नाविक नाव चला रहा है ।। 

जे जल जन तप धन तरे सुथरे मुकुतिक संग । 
चढ़े गगन घमंड भरे उतरे रज कन अंग |660| 


भावार्थ : -- जो मनुष्य नीचे जल के सदृश्य  मोती  के  समान स्वच्छ चरित्र वाले सज्जन के साथ रहते हुवे ताप
रूपी धन पा जाते है वे फिर  अम्बर पर चढ़े बादल के समान  घमंड  से  भरे  धूल  से  लिपटी बूंद के सदृश्य निकृष्टता प्राप्त कर नीचे उतरते हैं ।।  



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