सोमवार, 19 अगस्त 2013

----- ॥ सुठि-सोरठे ॥ -----

दुइ चरन पंच बाह, जे देही रथ जान किए । 
काम क्रोध मद लाह, चौपथ मति सुत संचरै।१ ।  
भावार्थ : -- विधाता ने इस देह को रथ की आकृति दी और दो चरण देकर पञ्च इन्द्रियों को घोड़ी बनाया। कम,क्रोध, मद और लोभ इन चार मार्गों पर, मति स्वरूप सारथी विचरण कर रहा है॥

माया मारत फूँक , उड़े गगन पवन प्रसंग /
काया धू धू धूँक , बहुरि काहे धूरि मिले /२ /
भावार्थ : -- जब मायावी माया में इतनी शक्ति है की इसके प्राप्त होते ही लोग हवा का प्रसंग कर गगन में उड़ने लगते हैं, तो फिर यह काया धूं धूं  कर जलती हुई  मिट्टी में क्यूँ मिल जाती है, इसे तो यह माया नहीं बचा पाती ॥ 
कलकल जल हंसबर सर सरसे सरस सरसिज । 
पग धरे रितु पटतर  अरस परस जल भिग रही |3-क| 

लख रहे लख तरुबर नयन भए मत मद मुकुलित । 

बर्निका बर्निक कर पत्त के पथ पद पद बही |3-ख| 

धन धूरि धूरि अधर धवला भइ धवल धवलित ।

निमद मझ मज्जन कर लवलीन लइ लाह लही ।3-ग| 

आइ रितु सर तट तर उद बिंदु मनु मनि बलयित । 
उदक उदक बिंदु बर द्रव रसा तरु कासि गहे |3-घ। 

 

बसित बसन बपुरधर  लहित लसित लखित लवनित । 
लख लख तरु लोय भर अरन अरन बरनगत अहि  |३-ढ। 

भावार्थ : -- सरोवर में श्रेष्ठहंस कलरव कर रहे हैं..,सुन्दरकमल प्रस्फुटित हुवे..,वस्त्र त्याग कर ऋतु ने पाँव रखे..,जल आलिंगन कर वह भीग रही है..... 

पेड़ों के पलाश यह देख रहे हैं..,उनके नयन मद उन्मत्त हो अध् मूंदे से हैं ।लेखक के हाथों से मसि पत्तों के पथ 
चरण-चरण पर प्रवाहित हुई ।।

धूल युक्त गौर वर्ण युवती, धूल गई और धूल कर सुन्दर निर्मला हुई ।। मंद स्वर उच्चारित कर मझधारमें तन्मयता पूर्वक गोते लगाती उसकी कांति अग्नि के जैसे देदीप्यमान हुई ।। 
 
ऋतु तैर कर सरोवर के तट पर आई | जल बिन्दुएँ ऐसी कि जैसे मणि ही वलयित हों..,  इन छटकति सुन्दर बूँदों को.., पलाश ने मुट्ठी में लपक लिया..... 

वस्त्रों को ग्राह्य कर उस मोहनी मूरत का लावण्य दर्शनीय था । जिसे पलाश नयन भर के  देख रहे थे यह देख पथिक ने जल एवं अक्षरों का (सुन्दर) वर्णन किया ॥

फिर किरण पाँव धरे निरख रही मुकुर मुख धो । 
निर्झरी नीर झरे  नाद कर नुपूर चमके  । ४-क । 

फिर ग्रहे पट गहरे दमके रूप लावण लौ । 
पद कमल कर सँवरे भर मणि माणिक मनके ॥ 

फिर दिनकर दिन करे जाग उठा रात भर सो । 
कर वन्दन पद वरे जल ढलके अमृत बनके ॥ 

रमण किरण बाहु भरे लाज धरे नयन नत हो ॥ 
रथ रयनि कण उतरे पुष्प पत्र पर सुर झनके ॥ 

शंख करे रव हरे जयति जय राधेमाधौ । 
कलश कलश जल भरे खन खन खंखणा खनके ॥ 

फिर सर सजदा दरे मस्जिद में अल्लाह हो । 
गिरजा घर गुंजरे फुली शफ़क सबद सुनके ॥ 


सुधि पाठक के रंग, पाठावली के प्रसंग । 
अस जस नभस बिहंग, विहरत वीथि विभूषिते ।०५-क । 
भावार्थ : --पाठसंग्रह के सम्बन्ध में सुबुद्धित पाठक गण का प्रेम उनकी अनुभूतियाँ उनकी शोभा ऐसी है जैसे पंछी,बादल, सूर्य, चन्द्रमा आदि नभ के छाया पथ में विहारते हुवे सुशोभित हो रहे हों  ॥ 

नौ रसि मसि लसिनाए , कबिताकृति काँचन काए । 
बन बेलि मंडलाए, कौतुक कर केलि  कलिते ।०५-ख।  
भावार्थ : -नौ रसयुक्त मसि सुशोभित होती कविता की आकृति कंचन काया स्वरूप हो गई । साथियों और लताओं से घिरे उपवन में कौतुहल के सह क्रीडा करती हुई विभूषित हो रही है ॥  

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