गुरुवार, 15 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 47॥ -----

कारे कारज कर सचिव  , कारे  आप बिकास । 
करे बढ़ाई आपनी ,पत पानी की भास /४७१ । 
भावार्थ : -- काले काले कारनामे करके मंत्री 'जी ' ने केवल अपना ही विकास किया, फिर प्रतिष्ठा मयी भाषा में  अपने ही गाल बजाते हुवे मंत्री 'जी' ने अपनी ही प्रशंसा स्तुति की ॥

धन धान दाएँ तो दाएँ, मत सम्मती न दाएँ । 
सचिव स्वारथ के भरे, मत लै लुट लइ जाएँ । ४७२ । 
भावार्थ : -- भले ही धन संपत्ति दान  कर दें, किन्तु मत की सम्मति दान न करें । क्योंकि ये सचिव स्वार्थ के भरे हुवे हैं, धन का दान तो अपनेहाथ से दिया जाता है किन्तु सम्मति का दान देने से ये सचिव घर को ही लूट कर ले जाते हैं ॥  " क्या कोई सचिव स्वार्थ हीन दिखाई दे रहा है ?.....नहीं"

राउ रंक का धनवंत, स्वारथी सब कोइ। 
जो आपन अर्थ न खोएँ, बुद्धिमान भए सोइ ।४७३। 
भावार्थ : -- राजा हो निर्धन हो या धनवान हो सभी यहाँ पर स्वार्थी हैं । जो कोई व्यक्ति अपना आशय,प्रयोजन, धन सम्मति इन्द्रियों के विषय आदि को वश में रखता है,  वह व्यक्ति बुद्धिमान सिद्ध होता है ।।

सचिव जबलग बँधे मुँह, शब्द साँस  करि हाय । 
मोचित बँधन सोचि करें, कौन सुर लेइ गाएँ । ४७४। 
भावार्थ : -- मंत्री जब तक मौन रहते हैं तब तक शब्दों की भी सांस में सांस रहती है । उनका मुख खुलते ही शब्द भी सोच में पड़ जाते हैं इस बेसुरे मुख में कौन सा सुर लगा कर गाएँ ॥

भगवन के बर नाम ते, बड़े भगत के नाम । 
चन्द्र शेखर के निधान जहँ, कँह रामेसर धाम |475| 
भावार्थ : --भगवान के बड़े नाम से भी बड़ा भक्त का नाम होता है। ( भारत में ) जिस स्थान पर भगवान शिव का लिंग स्थापित है, उसे रामेश्वरम कहा जाता है ॥ 

अर्थात : -- "कर्म (कार्य), प्रधान होता है, लक्ष्य नहीं" 
 टिप्पणी : -- भगवान राम, भगवान शिव के भक्त हैं 

छिनु चढ़े छिनभिन उतरे  अस बदरि के सुभाउ । 
काम जनित प्रीत प्रतीत तस छिनु छित बिथुराए |476| 

भावार्थ :-- बादल का यह स्वभाव है कि वह क्षण में ही ऊपर चढ़ जाता है,और छिन्न भी होकर उतरता है । स्वार्थपरक  प्रेम और विश्वास भी वैसे ही क्षण में ही छिन्न भिन्न हो जाता है ॥ 

तिलछत बहु भूखन मरे रसन असन रसनाए । 
रस अलिक बहु तोष धरे दस अवगुन गिन गाए |477| 

भावार्थ : -- भूख से बहुत व्याकुल होने पर ही जिह्वा को भोजन स्वादिष्ट लगता है । रसयुक्त होकर तृप्त हो जाने पर जिह्वा भोजन के दस अवगुण निकालती है ।।    

बुद्धि के सरनि भीतरे भरे राय संचाए  । 
सागर तरंग धैर सम एक आवत एक जाय |478|

भावार्थ : -- बुद्धि मार्ग के अंतस  बहुत से विचार आवागमन कर रहे हैं । जो सागर की तरंग दैर्ध्य के जैसे एक  विचार आता है एक जाता है  ॥ 

भरत भूमि के भीतरे भरे राय अधि काय । 
सागर तरंग धैर सम एक आवत एक जाय |479| 

भावार्थ : -- भारत वर्ष के भीतर मुख्य एवं प्रधान स्वरूप में, बहुत से राजा महाराजा भरे है । सागर की तरंगो के जैसे, एक जाता है तो दुसरा आ जाता है ।।  

चलत पथ रे पथगामी पाछे भूरि न जाए ।
ऐतक आगिन जाए के सके चरन बहुराए |480|
भावार्थ : -- पथ पर चलते हुवे हे। पथिक, पीछे का पथ भूल न जाना । इतना ही आगे जाना कि, वापस लौट सके ॥



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