धन धाम रतन दीप धर, मत कर रे अभिमान ।
मनि कंचन स्यामल सर, सब पाहन की खान /६४१ /
भावार्थ : -- धन संपदा एवं रत्नों के दीपक धारण करने वाले रे धनवान , तू इन पर अहंकारमत कर । क्योंकि ये नीलम ये हीरे मणि और यह स्वर्ण सब ही पाषाण खनिज होकर पाषाण का स्वरूप ही हैं ॥
चार दिवस किए आरती, चारि दिवस बैठाए ।
माटी केरी मूरती, माटी माहि सिराए । ६४२।
भावार्थ : -- और इस काया का क्या अहंकार, यह तो इस संसार में चार दिन के लिए ही स्थापित हुई है जिसकी चार दिन की ही आरती है, यह पञ्च भूत से निर्मित मूर्ति है, अंत में इसका विसर्जन पञ्च भूत में ही होना है॥
धन संपद सम संखिया, सकेर धरि बिष मान ।
पर जे सोध सुधित धरि, होत औषध समान ।६४३।
भावार्थ : -- धन संपदा संखिया ( एक अति प्रभावकारी तीक्ष्ण विष, जो एक उपधातु है) के समतूल होती है, भौतिक जगत को कष्ट पहुंचाते हुवे इसका संग्रह किया जाए तो यह विष के समरूप कार्य करती है । यदि इसे संशोधित स्वरूप में अर्थात धर्म के मार्ग पर चलते हुवे, नीति पूर्वक कार्य करते हुवे 'केवल जीवन निर्वाह के निमित्त' चित्त में ऐसी अवधारणा की जाए तो यह औषधि का कार्य करती है ॥
धन के लाखौ गुन लखन, जग मैं रहे न थाए ।
जे पद चरे धर्म चरन, तेइ बड़ाई पाए । ६४४।
भावार्थ : -- धन अर्जित करने के चाहे लाखों गुण या लक्षण हों इस संसार में वे स्थाई नहीं रहे । जिन चरणों ने, धर्म के मार्ग का अनुकरण किया, उनके ही गुण आचरणों ने संसार में प्रशंसा प्राप्त की ।
मानस मनस बिचार भित, जे भए बिषय बिकार ।
साँच राँच औषधि आँच, करें सकल उपचार । ६४५।
भावार्थ : -- रे मनुष्य तेरे मन में उत्पन्न हो रहे विचारों के भीतर यदि विषय सम्बंधित दोष है तो उसकी भी औषधि है सत्य में लीन होकर विचारों को उसकी आंच में तपाते हुवे समस्त दोषों का उपचार कर ॥
पी प्रबसे सागर पार मैं रहि पंथ निहार ।
धार धरी ऊपर धार सखि मैं कवन अधार |646|
भावार्थ : -- प्रियतम विदेश में प्रवासित है और मैं आगमन की प्रतीक्षा में हूँ । धारा के ऊपर धारा है, हे ! मित्र, मैं किस के आधार रहूँ ॥
रल बल रैन सकल रई कल दीपक के अंग।
बर्तिक बर के मर गई यस कर धरे पतंग |647|
भावार्थ : -- कल दीपक के साथ राग मग्न हो सारी रात लिपट कर एक में मिली वर्तिका जलकर मर गई, कीर्ति पतंगा की हुई ॥
अर्थात : -- "श्रम कहीं और होता है, यश कहीं और"
कमल को मल कीच भरे मल कहँ मल नहि कोय ।
कमल कोमल नीच धरे जल महँ जल नहि धोय |648|
भावार्थ : -- कमल का मर्दन कर कीचड़ से भरे दुष्ट कहते हैं कि यहाँ कोई दुष्ट नहीं है । कोमल कमल के ही नीचे जल में ही स्थापित है फिर भी उन्हें जल नहीं पाता ॥
अर्थात :-- "अपने मुख से अपनी ही प्रशंसा करना दुष्ट का स्वभाव होता है"
ज्ञान रहित का बर्तनी, जनु दीपक बिनु तेल ।
तैल दै ते बर्ति बरी, बर्तनी ज्ञान मेल |649|
भावार्थ : --ज्ञान रहित वर्तनी का क्या औचित्य है, तेल के बिना दीपक का क्या औचित्य है । तेल दान से दीपक की वर्तिका प्रज्वलित होती ज्ञान के मिलान से वर्तनी प्रज्वलित होती है ॥
चली चलत चित्रपट बनी, बनी ठनी इतराए ॥
दोए टका की ढेंपनी लाख टकै बिक जाए |650|
भावार्थ: -- चल चित्रपट की वनस्थली में, वेश विभूषित होकर घमंड करती निम्न मुल्य की गठरी(packet) का भी अधिक मूल्य प्राप्त हो जाता है.....
चार दिवस किए आरती, चारि दिवस बैठाए ।
माटी केरी मूरती, माटी माहि सिराए । ६४२।
भावार्थ : -- और इस काया का क्या अहंकार, यह तो इस संसार में चार दिन के लिए ही स्थापित हुई है जिसकी चार दिन की ही आरती है, यह पञ्च भूत से निर्मित मूर्ति है, अंत में इसका विसर्जन पञ्च भूत में ही होना है॥
धन संपद सम संखिया, सकेर धरि बिष मान ।
पर जे सोध सुधित धरि, होत औषध समान ।६४३।
भावार्थ : -- धन संपदा संखिया ( एक अति प्रभावकारी तीक्ष्ण विष, जो एक उपधातु है) के समतूल होती है, भौतिक जगत को कष्ट पहुंचाते हुवे इसका संग्रह किया जाए तो यह विष के समरूप कार्य करती है । यदि इसे संशोधित स्वरूप में अर्थात धर्म के मार्ग पर चलते हुवे, नीति पूर्वक कार्य करते हुवे 'केवल जीवन निर्वाह के निमित्त' चित्त में ऐसी अवधारणा की जाए तो यह औषधि का कार्य करती है ॥
धन के लाखौ गुन लखन, जग मैं रहे न थाए ।
जे पद चरे धर्म चरन, तेइ बड़ाई पाए । ६४४।
भावार्थ : -- धन अर्जित करने के चाहे लाखों गुण या लक्षण हों इस संसार में वे स्थाई नहीं रहे । जिन चरणों ने, धर्म के मार्ग का अनुकरण किया, उनके ही गुण आचरणों ने संसार में प्रशंसा प्राप्त की ।
मानस मनस बिचार भित, जे भए बिषय बिकार ।
साँच राँच औषधि आँच, करें सकल उपचार । ६४५।
भावार्थ : -- रे मनुष्य तेरे मन में उत्पन्न हो रहे विचारों के भीतर यदि विषय सम्बंधित दोष है तो उसकी भी औषधि है सत्य में लीन होकर विचारों को उसकी आंच में तपाते हुवे समस्त दोषों का उपचार कर ॥
पी प्रबसे सागर पार मैं रहि पंथ निहार ।
धार धरी ऊपर धार सखि मैं कवन अधार |646|
भावार्थ : -- प्रियतम विदेश में प्रवासित है और मैं आगमन की प्रतीक्षा में हूँ । धारा के ऊपर धारा है, हे ! मित्र, मैं किस के आधार रहूँ ॥
रल बल रैन सकल रई कल दीपक के अंग।
बर्तिक बर के मर गई यस कर धरे पतंग |647|
भावार्थ : -- कल दीपक के साथ राग मग्न हो सारी रात लिपट कर एक में मिली वर्तिका जलकर मर गई, कीर्ति पतंगा की हुई ॥
अर्थात : -- "श्रम कहीं और होता है, यश कहीं और"
कमल को मल कीच भरे मल कहँ मल नहि कोय ।
कमल कोमल नीच धरे जल महँ जल नहि धोय |648|
भावार्थ : -- कमल का मर्दन कर कीचड़ से भरे दुष्ट कहते हैं कि यहाँ कोई दुष्ट नहीं है । कोमल कमल के ही नीचे जल में ही स्थापित है फिर भी उन्हें जल नहीं पाता ॥
अर्थात :-- "अपने मुख से अपनी ही प्रशंसा करना दुष्ट का स्वभाव होता है"
ज्ञान रहित का बर्तनी, जनु दीपक बिनु तेल ।
तैल दै ते बर्ति बरी, बर्तनी ज्ञान मेल |649|
भावार्थ : --ज्ञान रहित वर्तनी का क्या औचित्य है, तेल के बिना दीपक का क्या औचित्य है । तेल दान से दीपक की वर्तिका प्रज्वलित होती ज्ञान के मिलान से वर्तनी प्रज्वलित होती है ॥
चली चलत चित्रपट बनी, बनी ठनी इतराए ॥
दोए टका की ढेंपनी लाख टकै बिक जाए |650|
भावार्थ: -- चल चित्रपट की वनस्थली में, वेश विभूषित होकर घमंड करती निम्न मुल्य की गठरी(packet) का भी अधिक मूल्य प्राप्त हो जाता है.....
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