रोष हुँते सर्बस बरे , अहहैं औषध देर ।
जीउ हुँत जस संखिया, हत निज गुरु रुख फेर ।६३१।
भावार्थ : -- "क्रोध की सर्वोत्तम औषधि है : -- विलंब "
----- ॥ सेनेका ॥ -----
"क्रोध का क्रम आत्म गौरव हेतु घातक है, जैसे जीवन हेतु संखिया "
----- ॥ जे.जी. हालैण्ड ॥ -----
संखिया = एक बहुंत तीव्र एवं प्रभावकारी विष जो एक उपधातु है ।
संचइ सदैव रहि नीच , दानी पद रह ऊँच ।
सागर सदा रहे धरा, बादर गगन पहूँच ।६३२।
"स्थितिरुच्चै: पयोदानां पयोधीनामध: ॥ "
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- संचय करने वाले का स्थान सदैव नीचे होता है और दानवान का पद ऊंचा रहता है । जिस प्रकार सागर की स्थिति अधर में होती है और बादल ऊँचे गगन पर स्थित होता है ॥
साँच सदैव भयऊ जइ, असंच अहहैं नाहि ।
ज्ञान जान बिस्तार लै, सांच के पंथ माहि । ६३३।
"सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयान:। "
----- ॥ मुंडकोपनिषद,६ ॥ -----
भावार्थ : - और सत्य की सदैव जय होती है असत्य की नहीं होती, सत्य के मार्ग पर ही ज्ञान के विमान का विस्तार होता है ॥
औषधी तिन पौध कहें, एक फर फुरत सिराएँ ।
बनस्पति तिन औन रहें, बारहिं बार फराएँ । ६३४।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- औषधि उन पादपों को कहते हैं जो एक बार में फुल फल कर समाप्त हो जाते हैं जैसे : --गेहूँ चावल,दाल आदि के पौधे । और इस भूमि पर वनस्पति वह पादप हैं जो बार बार फलीभूत होते हैं : -- जैसे विभिन्न प्रकार के फलदार वृक्ष एवं पौधे ॥
तरु धरा नद नग नद पति, सर्बस अग जग जेह ।
ससि सुर जल मलयनिलादि, सकल जोइ प्रभु देह । ६३५।
-----॥ भागवत कथा ॥ -----
भावार्थ : -- पृथ्वी, ये द्रुमषंड, यह नदी, यह पर्वत और नदनाथ, समस्त चर-अचर । वो शशी,सूर्य, ये जल और मलयानिल आदि सभी ईश्वर की ही देह है ॥
बारह गाँव का चौधरी तेरह गाँव नौराए ।
अपने काम न आए तो ऐसी ऐसी तैसी जाए ।636।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ -- बड़ा हुवा-तो क्या हुवा, अपने काम का नहीं, तो व्यर्थ है.....
करें न पतन आपन हुँत, करें आप उद्धाप ।
मानस आपन मित आप, अरु रिपु आपहि आप । ६३७।
----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ६ /५॥ -----
भावार्थ : -- अपने द्वारा अपना उद्धार करें, अपना पतन न करें । क्योंकि ( मनुष्य) आप ही अपना मित्र है, और आप ही अपना शत्रु है ॥
----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ६ /५॥ -----
भावार्थ : -- मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करें, पतन न करें । क्योंकि वह ( मनुष्य) आप ही अपना मित्र है, और आप ही अपना शत्रु है ॥
पञ्च बदन दस बाहु दल, एक उदर दोइ पाद ।
भगवद गीता के पाठ, मूरत प्रभु संवाद । ६३८।
----- ||पद्म। उत्तर १७१/२७-२८ ॥ -----
भावार्थ : -- पांच अध्याय पञ्च मुख के सदृश्य हैं, दस अध्याय दस भुजाओं का समूह है , एक अध्याय क्रमश: उदर है दो अध्याय चरणाकृति होते हुवे श्रीमद्भगवद्गीता के अष्टादस अध्याय ईश्वर की वाङ्ग्मयी मूर्ति है ॥
भावावेस भयभीते, रुग्नाल्प बय काल ।
अबूझ उन्मत जड़बुद्धि, निषिद्ध देवन दान । ६३९ ।
----- ॥ गौतम धर्म सूत्र ५/२ ॥ -----
भावार्थ : -- भावावेश, भय भीत होकर, रुग्णावस्था में, अल्पावस्था में, मुर्खता वश, उन्मत्त या अचेतन स्थिति में,
दान देना निषिद्ध होता है ॥
जस पुरातन बास तजत, गहत मनुज नउ बास ।
तेसेइ अंतरात्मन, गह नउ देह निवास । ६४० ।
----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता २ /२२ ॥ -----
भावार्थ : -- जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है । उसी प्रकार यह अंत:करण भी पुराना शरीर त्याग कर नयाशरीर धारण करता है ॥
जीउ हुँत जस संखिया, हत निज गुरु रुख फेर ।६३१।
भावार्थ : -- "क्रोध की सर्वोत्तम औषधि है : -- विलंब "
----- ॥ सेनेका ॥ -----
"क्रोध का क्रम आत्म गौरव हेतु घातक है, जैसे जीवन हेतु संखिया "
----- ॥ जे.जी. हालैण्ड ॥ -----
संखिया = एक बहुंत तीव्र एवं प्रभावकारी विष जो एक उपधातु है ।
संचइ सदैव रहि नीच , दानी पद रह ऊँच ।
सागर सदा रहे धरा, बादर गगन पहूँच ।६३२।
"स्थितिरुच्चै: पयोदानां पयोधीनामध: ॥ "
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- संचय करने वाले का स्थान सदैव नीचे होता है और दानवान का पद ऊंचा रहता है । जिस प्रकार सागर की स्थिति अधर में होती है और बादल ऊँचे गगन पर स्थित होता है ॥
साँच सदैव भयऊ जइ, असंच अहहैं नाहि ।
ज्ञान जान बिस्तार लै, सांच के पंथ माहि । ६३३।
"सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयान:। "
----- ॥ मुंडकोपनिषद,६ ॥ -----
भावार्थ : - और सत्य की सदैव जय होती है असत्य की नहीं होती, सत्य के मार्ग पर ही ज्ञान के विमान का विस्तार होता है ॥
औषधी तिन पौध कहें, एक फर फुरत सिराएँ ।
बनस्पति तिन औन रहें, बारहिं बार फराएँ । ६३४।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- औषधि उन पादपों को कहते हैं जो एक बार में फुल फल कर समाप्त हो जाते हैं जैसे : --गेहूँ चावल,दाल आदि के पौधे । और इस भूमि पर वनस्पति वह पादप हैं जो बार बार फलीभूत होते हैं : -- जैसे विभिन्न प्रकार के फलदार वृक्ष एवं पौधे ॥
तरु धरा नद नग नद पति, सर्बस अग जग जेह ।
ससि सुर जल मलयनिलादि, सकल जोइ प्रभु देह । ६३५।
-----॥ भागवत कथा ॥ -----
भावार्थ : -- पृथ्वी, ये द्रुमषंड, यह नदी, यह पर्वत और नदनाथ, समस्त चर-अचर । वो शशी,सूर्य, ये जल और मलयानिल आदि सभी ईश्वर की ही देह है ॥
बारह गाँव का चौधरी तेरह गाँव नौराए ।
अपने काम न आए तो ऐसी ऐसी तैसी जाए ।636।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ -- बड़ा हुवा-तो क्या हुवा, अपने काम का नहीं, तो व्यर्थ है.....
करें न पतन आपन हुँत, करें आप उद्धाप ।
मानस आपन मित आप, अरु रिपु आपहि आप । ६३७।
----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ६ /५॥ -----
भावार्थ : -- अपने द्वारा अपना उद्धार करें, अपना पतन न करें । क्योंकि ( मनुष्य) आप ही अपना मित्र है, और आप ही अपना शत्रु है ॥
----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ६ /५॥ -----
भावार्थ : -- मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करें, पतन न करें । क्योंकि वह ( मनुष्य) आप ही अपना मित्र है, और आप ही अपना शत्रु है ॥
पञ्च बदन दस बाहु दल, एक उदर दोइ पाद ।
भगवद गीता के पाठ, मूरत प्रभु संवाद । ६३८।
----- ||पद्म। उत्तर १७१/२७-२८ ॥ -----
भावार्थ : -- पांच अध्याय पञ्च मुख के सदृश्य हैं, दस अध्याय दस भुजाओं का समूह है , एक अध्याय क्रमश: उदर है दो अध्याय चरणाकृति होते हुवे श्रीमद्भगवद्गीता के अष्टादस अध्याय ईश्वर की वाङ्ग्मयी मूर्ति है ॥
भावावेस भयभीते, रुग्नाल्प बय काल ।
अबूझ उन्मत जड़बुद्धि, निषिद्ध देवन दान । ६३९ ।
----- ॥ गौतम धर्म सूत्र ५/२ ॥ -----
भावार्थ : -- भावावेश, भय भीत होकर, रुग्णावस्था में, अल्पावस्था में, मुर्खता वश, उन्मत्त या अचेतन स्थिति में,
दान देना निषिद्ध होता है ॥
जस पुरातन बास तजत, गहत मनुज नउ बास ।
तेसेइ अंतरात्मन, गह नउ देह निवास । ६४० ।
----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता २ /२२ ॥ -----
भावार्थ : -- जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है । उसी प्रकार यह अंत:करण भी पुराना शरीर त्याग कर नयाशरीर धारण करता है ॥
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