धृति छम दम सौच संयम, अचौर बिधा बिबेक ।
सूरज फेरे फेर लै, धरनी रोली गोल ।
तू भी तेरह घेर लै, ता फिर रद पटि खोल |628|
भावार्थ: -- बार-बार सूर्य के चक्कर लगा कर पृथ्वी ने गोल आकृति धारित की है । तू भी जीभ कि परीक्षा कर, तत पश्चात वाचन कर ।।
अर्थात : -- "संचयित कलुषित धन, देश वासियों का ही श्रम धन है"
अर्थात : -- "प्रेम में ही जीवन की संकुलता है"
सत अरुख दस लखन धर्म करि मनु स्मृति उलेख ।६२१।
भावार्थ : -- धृति, क्षमा , दुराग्रह का दमन ,पवित्रता, इन्द्रियों का संयम , विवेक , सत्य और अक्रोध ये धर्म के दस लक्षण हैं मनु स्मृति (अध्याय ६, श्लोक ९२) में जिसका उल्लेख मिलता है ॥
किन्ह बरनत दीन कहें, किन्ह धनिक परिभाख।
भए सब भिखिन भव भोगन, भूखे निज अभिलाख । ६२२।
भावार्थ : -- दीन रूप में किसका वर्णन करें, किसको धनिक स्वरूप में परिभाषित करें, लोकिन सुखों को प्राप्त करने हेतु यहाँ सभी भिक्षुक हो गए हैं, जो अपनी अपनी अभिलाषाओं के भूखे हैं ॥
धरा धरे फुहारी जूँ, अर्थ औषध सार ।
जूँ धरि धाराबिष त्यूँ, धारे बिष अनुहार । ६२३।
भावार्थ : -- जिस प्रकार धरती वर्षा की फुहारों को धारण कर जीव धारियों का संरक्षण करती है उसी प्रकार हमें अर्थ को औषधि स्वरूप में ही ग्रहण करना चाहिए । और जिस प्रकार अति वृष्टि विष बनकर धरती के जन जीवन को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार अति अर्थ को भी विष के समान ही समझना चाहिए ॥
भोग बिषय को परिहरत,खेवाई करत खटाव |
भव सिन्धु खे पार चरें, चढ़त जीउ की नाव । ६२४।
भावार्थ : -- सांसारिक भोगों का परित्याग कर संचालन कर्म से प्राप्त पारिश्रमिक का केवल जीवन निर्वाह हेतु प्रयोग करते हुवे हमें इस आत्म तत्त्व को प्राप्त जीवन रूपी नौका को संचालित करते हुवे इस संसार से पार पाना चाहिए अर्थात परम गति प्राप्त करना चाहिए ।
कर सोंहें कारत करम, धरम चरण पद चार ।
लाहे परिफल कर कलस, चित दें सोंह उदार । ६२५।
भावार्थ : -- हाथ कर्म करते हुवे शोभायमान होते हैं। चरण, धर्म लक्षणों ( मनु स्मृति के अनुसार दस : -- धृति,क्षमा,दुराग्रह का दमन,अचौर्य,पवित्रता,इन्द्रिय का संयम,विवेक,विद्या,सत्य,और अक्रोध) के मार्ग पर चलते हुवे शोभायमान होते हैं । उक्त आचरण से करतल में जो प्रतिफल प्राप्त हो, चित्त उसे उदारता पूर्वक दान देते हुवे शोभायमान होता है ॥
निरख तरी के कमल सुम आलबाल तरिआए ।
निरखे गहन घुमर घूम कीच तरी महँ पाए |626| भावार्थ : -- धरती के कमल-पुष्पों को देखकर बादल गहरा गए । घुमते हुवे जब गहराई में जाकर देखा तो कीचड़ ही पाया ॥
अर्थात : --"प्रत्येक चमकती हुई वस्तु, सोना नहीं होती"
दाना दाना खोय कै सोचे चिरी मुँडेर ।
जों पहुंची मैं नीड पै चुन चुन लेंगे घेर |627|
भावार्थ -- दाने खो कर चिड़िया छत पर बैठी चिड़िया सोच रही है । जैसे ही मैं अपने घोंसले में जाउंगी, तो भूखे बच्चे मुझे घेर लेंगे ।।
किन्ह बरनत दीन कहें, किन्ह धनिक परिभाख।
भए सब भिखिन भव भोगन, भूखे निज अभिलाख । ६२२।
भावार्थ : -- दीन रूप में किसका वर्णन करें, किसको धनिक स्वरूप में परिभाषित करें, लोकिन सुखों को प्राप्त करने हेतु यहाँ सभी भिक्षुक हो गए हैं, जो अपनी अपनी अभिलाषाओं के भूखे हैं ॥
धरा धरे फुहारी जूँ, अर्थ औषध सार ।
जूँ धरि धाराबिष त्यूँ, धारे बिष अनुहार । ६२३।
भावार्थ : -- जिस प्रकार धरती वर्षा की फुहारों को धारण कर जीव धारियों का संरक्षण करती है उसी प्रकार हमें अर्थ को औषधि स्वरूप में ही ग्रहण करना चाहिए । और जिस प्रकार अति वृष्टि विष बनकर धरती के जन जीवन को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार अति अर्थ को भी विष के समान ही समझना चाहिए ॥
भोग बिषय को परिहरत,खेवाई करत खटाव |
भव सिन्धु खे पार चरें, चढ़त जीउ की नाव । ६२४।
भावार्थ : -- सांसारिक भोगों का परित्याग कर संचालन कर्म से प्राप्त पारिश्रमिक का केवल जीवन निर्वाह हेतु प्रयोग करते हुवे हमें इस आत्म तत्त्व को प्राप्त जीवन रूपी नौका को संचालित करते हुवे इस संसार से पार पाना चाहिए अर्थात परम गति प्राप्त करना चाहिए ।
कर सोंहें कारत करम, धरम चरण पद चार ।
लाहे परिफल कर कलस, चित दें सोंह उदार । ६२५।
भावार्थ : -- हाथ कर्म करते हुवे शोभायमान होते हैं। चरण, धर्म लक्षणों ( मनु स्मृति के अनुसार दस : -- धृति,क्षमा,दुराग्रह का दमन,अचौर्य,पवित्रता,इन्द्रिय का संयम,विवेक,विद्या,सत्य,और अक्रोध) के मार्ग पर चलते हुवे शोभायमान होते हैं । उक्त आचरण से करतल में जो प्रतिफल प्राप्त हो, चित्त उसे उदारता पूर्वक दान देते हुवे शोभायमान होता है ॥
निरख तरी के कमल सुम आलबाल तरिआए ।
निरखे गहन घुमर घूम कीच तरी महँ पाए |626| भावार्थ : -- धरती के कमल-पुष्पों को देखकर बादल गहरा गए । घुमते हुवे जब गहराई में जाकर देखा तो कीचड़ ही पाया ॥
अर्थात : --"प्रत्येक चमकती हुई वस्तु, सोना नहीं होती"
दाना दाना खोय कै सोचे चिरी मुँडेर ।
जों पहुंची मैं नीड पै चुन चुन लेंगे घेर |627|
भावार्थ -- दाने खो कर चिड़िया छत पर बैठी चिड़िया सोच रही है । जैसे ही मैं अपने घोंसले में जाउंगी, तो भूखे बच्चे मुझे घेर लेंगे ।।
तू भी तेरह घेर लै, ता फिर रद पटि खोल |628|
भावार्थ: -- बार-बार सूर्य के चक्कर लगा कर पृथ्वी ने गोल आकृति धारित की है । तू भी जीभ कि परीक्षा कर, तत पश्चात वाचन कर ।।
अर्थात : -- "संतुलित पृथ्वी के जैसे, वाणी भी संतुलित होनी चाहिए"
कारे कारज कारि कै धवलित दधि जे सार ।
कारी मटुकी धारि के लटकी देस बहार |629|
भावार्थ : -- कलुषित कर्म के द्वारा , श्वेत मक्खन निकाला । काले कुम्भ में भर कर देश के बाहर लटका दिया ॥
कारी मटुकी धारि के लटकी देस बहार |629|
भावार्थ : -- कलुषित कर्म के द्वारा , श्वेत मक्खन निकाला । काले कुम्भ में भर कर देश के बाहर लटका दिया ॥
अर्थात : -- "संचयित कलुषित धन, देश वासियों का ही श्रम धन है"
दिया बर्ति प्रिया प्रीतम प्रीत घीउ की धार ।
बारे सार सकले तम जीवन जोत उजार ।630|
भावार्थ : -- दीपक प्रियतम रूप और वर्तिका प्रियतमा स्वरूप है प्रेम घृत की धारा के सरिस है प्रज्वलित करने पर जीवन ज्योति का उजाला, फैले हुवे अँधेरे को समेट लेता है ॥
बारे सार सकले तम जीवन जोत उजार ।630|
भावार्थ : -- दीपक प्रियतम रूप और वर्तिका प्रियतमा स्वरूप है प्रेम घृत की धारा के सरिस है प्रज्वलित करने पर जीवन ज्योति का उजाला, फैले हुवे अँधेरे को समेट लेता है ॥
अर्थात : -- "प्रेम में ही जीवन की संकुलता है"
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