दान देई किन्ह देस , अरु देई किमि काल ।
जँह भूरि भूत सुभ करे, परि बस्तु के अकाल । ६११ ।
भावार्थ : -- शास्त्रों में यह प्रश्न किया गया है कि दान किस स्थान में, किस समय, और किसको दें कि वह दायन पश्चात अतिशय फलीभूत हो । जिस स्थान में पञ्च भूत( अवनी, अग्नी, अनिल, अंबु, अम्बर) एवं उसके यौगिक का अधिकाधिक कल्याण हो, और जहां किए गए दान की विषय-वस्तु का अभाव हो, दान देना वहीँ उपयुक्त होता है ॥
सुख-दुःख अरु भाउ अभाउ, पाप पुण्य दय दान ।
प्रसंगासंग के रंग, मानख धर्म अधान ।612|
भावार्थ : -- सुख -दुःख और भाव-अभाव, पाप-पुण्य, और दया-दान प्रसंग-वियोग आदि विषय मनुष्य के प्रकृति अथवा उसके स्वभाव पर धारित होते हैं ॥
झीनी रेल बिठाइ के, कालीकट पहुँचाए ।
सिहासन लिपटाई के, मोटी माया भाए |613|
भावार्थ : -- मन की आसक्ति स्वरूप सूक्ष्म माया से नाता तोड़ लिया । और धन-संपत्ति, पुत्र, घर-द्वार आदि स्वरूपी मोटी माया को सिंहासन के लोभ में ह्रदय में रखा ॥
आसा श्रद्धा साम छम, धरम चरन गुण शील ।
जँह जे रासि तँहहि कासि, करीषिनी कर कील ।६१४।
भावार्थ : -- आशा,श्रद्धा, शान्ति, क्षमा, धरम के चार चरण ( रा.च.मा. अनुसार : -- सत्य ,शौच,दया और दान ) सद्गुण एवं सदाचार । जहां ये राशि स्थित हो वहीं लक्ष्मी का रश्मि-स्तंभ प्रकाशित होता है ॥
मानस भूइ भव सागर कैसे आवत जाए ।
जैसे दीपक तैल धर बर्तिक जरत सिधाए ।615।
भावार्थ : -- मनुष्यजाति, धरती के सांसारिक सागर में जन्म ले कर कैसे मरता है । जैसे दीपक के तेल में वर्तिका जल कर मर जाती है ।।
अर्थात: -- "जीवन नश्वर है"
सिर पर धारे चौतनि देख रही का झाँक ।
तन पे ऐतक जोबनी जोर लगा के ढांक ।616।
भावार्थ: -- सिर पर टोपी रख कर, मत झांको । तुम इतने युवा हो, जोर लगा के कूद जाओ ।।
कँधे ढारि लाली चुनर गोरी केस नियास ।
सोन नदी के तट खड़ी पिया मिलन की आस ।617।
भावार्थ : -- कंधे पर लाल ओढ़नी डाल कर, केश विन्यासित कर । स्वर्ण नदी के तट पर प्रियतमा, प्रियवर के मिलन की आस में खड़ी है ॥
गगन नगन नख नग धरै अनगन जन धरनि धर ।
तमोध्न ही तमस हरै तमोगुन तेजस हर |618|
भावार्थ : -- गगन में अनगिनत तारे हैं, धरती पर अत्यधिक मनुष्य हैं । एक सूर्य और एक चन्द्रमा, अन्धकार को नष्ट कर देते है अज्ञानता को नष्ट करने के लिए भी, एक ओजस्वी पर्याप्त है ॥
काल कलुषित करनी कर जोड़ी कलुष कमाए ।
कमाए दुज धर मरन पर करनी सागे जाए |619|
भावार्थ:-- पापयुक्त, निकृष्ट कर्म कर काले धन का संचय किया मृत्यु पश्चात धन किसी दुसरे के पास चला जाता है, किन्तु करतूतें स्वयं के साथ जाते हैं ॥
अर्थात :-- "व्यक्ति के कर्म ही उसके जीवन एवं मृत्यु की दशा तय करते हैं"
बैठ भंडिरा चौंक पै सजन सँदेस सुनाए ।
गोरी घूँघट औंट कै होरी होरी गाए |620|
भावार्थ : -- पत्रवाहक चौराहे पर बैठ कर प्रियतम का सन्देश सुना रहा है । और प्रियतमा घूँघट कर होली है! होली है! कह रही है ॥
जँह भूरि भूत सुभ करे, परि बस्तु के अकाल । ६११ ।
भावार्थ : -- शास्त्रों में यह प्रश्न किया गया है कि दान किस स्थान में, किस समय, और किसको दें कि वह दायन पश्चात अतिशय फलीभूत हो । जिस स्थान में पञ्च भूत( अवनी, अग्नी, अनिल, अंबु, अम्बर) एवं उसके यौगिक का अधिकाधिक कल्याण हो, और जहां किए गए दान की विषय-वस्तु का अभाव हो, दान देना वहीँ उपयुक्त होता है ॥
सुख-दुःख अरु भाउ अभाउ, पाप पुण्य दय दान ।
प्रसंगासंग के रंग, मानख धर्म अधान ।612|
भावार्थ : -- सुख -दुःख और भाव-अभाव, पाप-पुण्य, और दया-दान प्रसंग-वियोग आदि विषय मनुष्य के प्रकृति अथवा उसके स्वभाव पर धारित होते हैं ॥
झीनी रेल बिठाइ के, कालीकट पहुँचाए ।
सिहासन लिपटाई के, मोटी माया भाए |613|
भावार्थ : -- मन की आसक्ति स्वरूप सूक्ष्म माया से नाता तोड़ लिया । और धन-संपत्ति, पुत्र, घर-द्वार आदि स्वरूपी मोटी माया को सिंहासन के लोभ में ह्रदय में रखा ॥
आसा श्रद्धा साम छम, धरम चरन गुण शील ।
जँह जे रासि तँहहि कासि, करीषिनी कर कील ।६१४।
भावार्थ : -- आशा,श्रद्धा, शान्ति, क्षमा, धरम के चार चरण ( रा.च.मा. अनुसार : -- सत्य ,शौच,दया और दान ) सद्गुण एवं सदाचार । जहां ये राशि स्थित हो वहीं लक्ष्मी का रश्मि-स्तंभ प्रकाशित होता है ॥
मानस भूइ भव सागर कैसे आवत जाए ।
जैसे दीपक तैल धर बर्तिक जरत सिधाए ।615।
भावार्थ : -- मनुष्यजाति, धरती के सांसारिक सागर में जन्म ले कर कैसे मरता है । जैसे दीपक के तेल में वर्तिका जल कर मर जाती है ।।
अर्थात: -- "जीवन नश्वर है"
सिर पर धारे चौतनि देख रही का झाँक ।
तन पे ऐतक जोबनी जोर लगा के ढांक ।616।
भावार्थ: -- सिर पर टोपी रख कर, मत झांको । तुम इतने युवा हो, जोर लगा के कूद जाओ ।।
कँधे ढारि लाली चुनर गोरी केस नियास ।
सोन नदी के तट खड़ी पिया मिलन की आस ।617।
भावार्थ : -- कंधे पर लाल ओढ़नी डाल कर, केश विन्यासित कर । स्वर्ण नदी के तट पर प्रियतमा, प्रियवर के मिलन की आस में खड़ी है ॥
गगन नगन नख नग धरै अनगन जन धरनि धर ।
तमोध्न ही तमस हरै तमोगुन तेजस हर |618|
भावार्थ : -- गगन में अनगिनत तारे हैं, धरती पर अत्यधिक मनुष्य हैं । एक सूर्य और एक चन्द्रमा, अन्धकार को नष्ट कर देते है अज्ञानता को नष्ट करने के लिए भी, एक ओजस्वी पर्याप्त है ॥
काल कलुषित करनी कर जोड़ी कलुष कमाए ।
कमाए दुज धर मरन पर करनी सागे जाए |619|
भावार्थ:-- पापयुक्त, निकृष्ट कर्म कर काले धन का संचय किया मृत्यु पश्चात धन किसी दुसरे के पास चला जाता है, किन्तु करतूतें स्वयं के साथ जाते हैं ॥
अर्थात :-- "व्यक्ति के कर्म ही उसके जीवन एवं मृत्यु की दशा तय करते हैं"
बैठ भंडिरा चौंक पै सजन सँदेस सुनाए ।
गोरी घूँघट औंट कै होरी होरी गाए |620|
भावार्थ : -- पत्रवाहक चौराहे पर बैठ कर प्रियतम का सन्देश सुना रहा है । और प्रियतमा घूँघट कर होली है! होली है! कह रही है ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें