मंगलवार, 27 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 60॥ -----

नयन देव संत दरसन, करनन हुँत श्रुत साँच । 
चितबन हुँत चिंतन मनन, मुख हरी बरनन बाँच ।६०१। 
                          ( दानमहिमा -अंक से साभार ) 
भावार्थ : -- नयन देव एवं संतों के दर्शन हेतु है, दोष दर्शन हेतु नहीं, कर्ण  सत्य श्रवण हेतु है कामुक वार्ता हेतु नहीं । चित्त चिंतन मनन हेतु है अचिंत हेतु नहीं, और मुख ईश्वर की वर्ण-व्याख्या हेतु है व्यर्थ प्रलाप हेतु नहीं ॥

भोगरत हुँत बिषय दमन, हिंसक दय आचार । 
सँजोइ हुँत दानाचरन, भए सुख के आधार ।६०२।
                            ( दानमहिमा -अंक से साभार )  
भावार्थ : -- भोगों में अनुरक्त मनुष्य हेतु इन्द्रियों इन्द्रियों का दमन, हिंसक मनुष्य हेतु दया का आचरण संग्रही मनुष्य हेतु दान व्यवहार सुख प्राप्ति  के आधार होते हैं ॥

सोह सासन सेवाजन , सोहत मुख भगवान । 
सोह सरीर सील चरन ,हाथ आचरन दान ।६०३।  
                           ( दानमहिमा -अंक से साभार )  
भावार्थ : -- शासन, जनसेवा करता सुशोभित होता है, दान-फान नहीं, मुख पर ईश्वर का श्री नाम ही सुशोभित होता है नेताओं-अभिनेताओं का नहीं, शरीर पर शील आचरण ही शोभा देते हैं टाई-फाई नहीं, और मनुष्य के हाथ दान देते हुवे सुशोभित होते हैं,दान लेते हुवे नहीं ।


तापस चरन दोष रहित, तोखित श्रमी उदारि । 
जेइ जन चिद गगन गहित, तेइ दान अधिकारि ।६०४।   
    ----- ॥ दान की महिमा -अंक से साभार ॥ -----
भावार्थ : --  दान का सुपात्र कौन है ? : -- जो व्यक्ति तपस्वी हो, दोष अर्थात अपराधिक कृत्यों से रहित हो,संतोषी हो,परिश्रमी हो, उदार आचरण वरण किये हो, और जो आत्म ज्ञानी हो वही दान हेतु सुपात्र है,अपात्र  के अभाव में दान नहीं करना ही श्रेयष्कर है ॥

टीका : -- "असमर्थ को केवल रक्षा मात्र के लिए आवश्यक वस्तु देनी चाहिए"

बिथुरन को कँह परिहरन, बियवन को कह दान । 
जे बिषय असुभ असुन्दर, जे सुन्दर कल्यान ।605।  
----- ॥ दान की महिमा -अंक से साभार ॥ -----

भावार्थ : --  बिखराने अथवा फेंकने को त्याग कहते हैं, बोने को दान कहते हैं ॥ अशुभ एवं असुंदर का त्याग की विषय वस्तुएं हैं, शुभ एवं सुन्दर दान की विषय वस्तुएं हैं  जैसे : --माया ( भोग विषयों की साधन स्वरूपा) कुरूप एवं अकल्याणकारी है, अत: उसका त्याग करना ही श्रेष्ठ है ।  श्री अर्थात लक्ष्मी सुन्दर है अत: उसका दान करना श्रष्ट है ॥

अज्ञानी दे ज्ञान भला संचय धन दै दीन । 
कल कल जल भए निरमला रोके भयउ मलीन  |606| 
भावार्थ: -- विपन्न को संचयित ज्ञान और धन का दान करना ही अच्छा है ।क्योंकि बहता हुवा पानी सदैव शुद्ध रहता है, और रोकनेसे वह अशुद्ध हो जाता है ॥ 

पवन पावत पाँख उरे जल पाए तिरे मीन । 
थल धावत सिंग दूरे मानस साधन तीन |607| 

भावार्थ  -- पक्षी,वायु की में गमन करते हैं, मछली पानी में । शेर, स्थल पर गमन करता है, मनुष्य इन तीनों 
साधनो से गमन करता है ॥ 

अर्थात -- "बुद्धिमता के बल से दुर्गम मार्ग भी सुगम हो जाता है"

पवन पावत पाँख उरे जल पाए तिरे मीन । 
थल धावत सिंग दूरे मानस साधन तीन |608| 

भावार्थ  -- पक्षी,वायु की में गमन करते हैं, मछली पानी में । शेर, स्थल पर गमन करता है, मनुष्य इन तीनों 
साधनो से गमन करता है ॥ 

अर्थात -- "बुद्धिमता के बल से दुर्गम मार्ग भी सुगम हो जाता है"

चोर चारन रैन भली, माँग भली रह बैन । 
प्रीति प्रतीति नैन भली लाग भली रह सैन |609| 

भावार्थ: -- चोरी के लिए रात्रि की आवश्यकता होती है, मागने के लिए वाणी की आवश्यकता है । प्रेम के लिए आखों  में  विश्वास  की  आवश्यकता है,लड़ाई के लिए सेना की आवश्यकता होती है ॥ 

आलू सब साक साजे बैगन बेगुनी गिन । 
आम कहँ सब फलराजे पर मिलत दिवस तीन |610| 

भावार्थ: --आलू सभी शाक में लगता है बैगन में कोई गुन नहीं है(फिर भी इस के सिर पर ताज सजा है ) आम को सब फल का राजा कहते है, किन्तु तीन मास ही फलता है ॥ 

अर्थात : -- "गुणों की गणना स्वरूप से नहीं, अपितु चरित्र से होती है"






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