सोमवार, 26 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 59॥ -----

अन धन भू गौ जल अंग, जीवन छम श्रम ज्ञान /
दाता तेइ कर देइए, लेइ जोग जे दान /५९१ /
भावार्थ : -- अन्न दान, धनदान , भूदान, गोदान, जलदान , अंगदान, जीवनदान ,क्षमादान , श्रमदान ,ज्ञानदान,
आदि दान दाता को उसी के हाथ में देना चाहिए जो इन्हें लेने के योग्य हों ॥

 कहि गए बिरध दान महिम, कनिआ मुकुती सीप ।
जेइ दान माटी मिले, लेइ चुल्हा लीप । ५९२ । 
भावार्थ : -- बड़े वृद्ध दान की महिमा का वर्णन इस प्रकार कर गए कि कन्या घर में मोती रूप है जो  दान देने पर सीप स्वरूप हो जाती है । यदि दान में मिट्टी भी मिले तो वह चुल्हा लीपने के काम आती है अर्थात दान में मिली कोई भी वस्तु व्यर्थ नहीं जाती ॥

भरत देस जे संस्कृति, कनिआ लाकह्मी रूप ।  
पालक करत पानि दान, मान बर हरि सरूप ।५९३। 
                  ( दानमहिमा -अंक से साभार )  
भावार्थ : --भारत देश की यह संस्कृति है कि यहाँ कन्या को लक्ष्मी का रूप माना जाता है । माता-पिता अथवा अभिभावक , वर को विष्णु का स्वरूप मान कर ही कन्या का पाणि-दान करते हैं ॥

तजन वंत की दीनता, दानी के दिए दान । 
बास बसन तापस चरन, के न करै अपमान ।५९४। 
भावार्थ : -- त्यागवान  की दीनता और दानी के दिए हुवे दान का, तपस्वी के वेश-भूषा का अपमान नहीं करना चाहिए ॥

पाहुन को तौ हरि कहें, अमृत कहँत नद नीर । 
कैसे जे जन भारती, सागर को कँह छीर ।५९५। 
भावार्थ : -- अतिथि को तो भगवान कहते हैं, नदी के जल को अमृत कहते हैं । ये भारतीय लोग कैसे नमूने हैं जो सागर को क्षीर कहते हैं ॥

टिप्पणी : -- भारत वर्ष के आदि पुराणों में सागर को क्षीर कहा गया । क्यों कहा गया ? .....तब के लोग अंधे तो थे नहीं.....क्षीर जैसा दिखता होगा जभी तो कहा गया..... विधमान में कैसा दिखता है?.....नीला.....फिर ऐसा क्या भौगोलिक परिवर्तन हुवा कि सागर नीला दिखाई देने लगा.....

दिए धूम काल दरस पर, लेखे उजबल लीख । 
दिरिस रंजन अंजन किए, दरस जोत करि तीख ।५९६। 
भावार्थ : --  धुआँ काला दिखाई देता है किन्तु, वह लेख बहुँत उज्जवल लिखता है । यदि उसका अंजन बना कर दृष्टि को रंजित कर दें तो फिर वह दर्शन ज्योति को तीक्ष्ण कर देता है ॥

जान बूझ के गढ गिरे दूज अबूझ खुदाए । 
अजान के अंधेर घिरे निकसे कौन उपाय |597| 

भावार्थ : -- ज्ञानी होकर, अज्ञानी के खोदे हुवे गड्ढे में गिरने का अर्थ  अज्ञान  के  अँधेरे  में  घिरना  है फिर ऐसे व्यक्ति के बाहर निकलने का कोई उपाय नहीं है ॥ 

सोए अँख मुँदी रैन भर मानुज मरनि समान । 
चरन मुख आछादन कर ओड़ी चादर तान |598| 

भावार्थ : --आँखे बंद कर रात भर सोया हुवा मनुष्य मृतक के समान और सिर से पाँव तक आच्छादित चादर उसका शव आच्छादन है ॥ 

अर्थात : -- "सुषुप्ति जड़ एवं जागृति चैतन्यता के चिन्ह है"  

चले पवन बहु जोर  छाई घटा घनी घोर ॥ 
पोत पति भरी भोर बहनु दै बहनु आदेस |599|

भावार्थ : -- वायु बहुत ही तीव्रता से प्रवाहित हो रही है, घनघोर घटा छाई हुई है । जहाज के  स्वामी ने पौ फटते ही, पोत के चालक को प्रस्थान करने का आदेश दिया॥

चोर मांगे रैन मिले, बैनी निंदन चैन । 
जहँ दुनौ के नैन मिले, मिले न कहुँ कर सैन |600| 

भावार्थ : -- चोर; रात मांग रहा है, और धनिक चैन की नींद मांग रहा है । जैसे ही दोनों के आँखे मिलती है, पुलिस कही नहीं मिलती ॥    

अर्थात : -- "समय पर काम आने से ही वस्तु की उपयोगिता है'   







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----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

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