जन पद के परिचै नहीं, परिचै लाहन चाह ।
धरम करम खरिचै नहीं, खरिचै चाहन लाह /581 /
भावार्थ : -- जनता के चरणों से परिचय भी नहीं है और अभिलाषाएं लाखों संगृहीत कर ली । सामजिक कर्त्तव्य नहीं निभाए , कर्मों की लागत लगाई नहीं ,प्राप्य लाभों के सुख प्राप्ति की कामना है ॥
समरथ हुँते ज्ञान रचे, असमरथ हुँते दान ।
दीन हुँत बिध दया रचे, धरम चरनि हुँत मान ।५८२।
भावार्थ : -- विधाता ने समर्थ हेतु ही ज्ञान की रचना की, असमर्थ हेतु दान की रचना की, दुर्दशाग्रस्त हेतु दया की रचना की इस प्रकार धर्म के चार चरण : -- सत्य, शौच, दया व दान पर चलने वाले के लिए सम्मान को रचा ॥
टिप्पणी : -- सत्य शौच, ज्ञान के ही लक्षण हैं ॥
रुधिर चरन तन संचरै , हियरा के करि काम ।
कर करत रत कार भला, अनभल नाम बिश्राम । ५८३।
भावार्थ : -- ह्रदय के कार्य वश रुधिर के संचरण ही से यह शरीर चलायमान है, इस प्रकार हाथ भी कार्यशील रहे तो अच्छा है, विश्राम का नाम काल का सूचक है ॥
धरनी भँवरे चंदु भँवरे, भँवरे मंडल सौर ।
बहोरि बिनु परिश्रम किये, तू काहे एक ठौर ।५८४।
भावार्थ : -- जब धरती भ्रमण कर रही, चन्दा भ्रमण कर रहा है नौ गृह और सत्ताईस उपग्रह भ्रमण कर रहे हैं । रे मनुष्य ! फिर तू बिना परिश्रम के एक ही स्थान पर क्यूँ बैठा है ॥
गहनहि गर्त खोरी कै जोट गोट गोड़ाए।
काल अलकतर जोरि के पंथ बिछावत जाए |585|
भावार्थ : -- गहरे गड़े खोद के, गिट्टी जोड़कर एक सार करके,काला चारकोल मिलाकर यह युवा, सुन्दर मार्ग बना रहा है ॥
घट की पूँजी भै पयस घट की पूँजी साँस ।
जब दुनौ के घटे बयस गये घाट के पास ।586।
भावार्थ : -- मटके की पूँजी पानी है, और देह की पूंजी, सांस है । जब दोनों की पूँजी की शक्ति घटी , तो एक शमशान में गया, दूसरा नदी तट पर ||
बैनी मति के भेद दे बैनी दे मत भेद ।
बैनी मुख मत तेज दे बैनी दे सब छेद ।587।
भावार्थ : -- वाणी मन के भेद देती है, वाणी मतभेद करवा देती है । वाणी के शब्द अधिक तीव्र नहीं होने चाहिए,
अन्यथा वह बाण के जैसे अपने लक्ष्य को प्राप्त करके ही रहती है ।।
अर्थात : -- " तोल मोल के बोल"
बरे बरे भाखा थरी , बरे भेस परिधान ।
सिद्ध करे ते नउ नवल, होए न पंथ पुरान |588|
भावार्थ : -- वैश्विक भाषा एवं उत्तम वेश-भूषा एवं उत्तम स्थान ग्रहण कर,प्राचीन विचार आधुनिक सिद्ध नहीं होते ॥
अर्थात : --"भौतिकवाद एवं विचारवाद में मूलभूत अंतर होता है"
निर्धन के सत गुन रतन गिनते उपल समान ।
जे भए धनिक ते सब गन उपलहु रतनन मान |589|
भावार्थ: --निर्धन के सत्य रूपी रत्न को असत्य के पत्थर स्वरूप गिना जाता है । जब वह धनवान हो जाता है तो उसके असत्य के पत्थरों को भी रत्नमाना जाता है ॥
अर्थात:-- "धन की चकाचौंध, मनुष्य को दिग्भ्रमित कर देती है"
बोली है भइ बहु बली, बोली है बहु मोल ।
बोली की गोली चली, खोली सबकी पोल |590|
भावार्थ : -- बोल में अत्यधिक बल होता है, बोल मूल्यवान भी हैं | बोल के अस्त्र रहस्य को भेद देते है॥
अर्थात : -- " संयमित वाणी, रहस्यों की रक्षा कवच है"
धरम करम खरिचै नहीं, खरिचै चाहन लाह /581 /
भावार्थ : -- जनता के चरणों से परिचय भी नहीं है और अभिलाषाएं लाखों संगृहीत कर ली । सामजिक कर्त्तव्य नहीं निभाए , कर्मों की लागत लगाई नहीं ,प्राप्य लाभों के सुख प्राप्ति की कामना है ॥
समरथ हुँते ज्ञान रचे, असमरथ हुँते दान ।
दीन हुँत बिध दया रचे, धरम चरनि हुँत मान ।५८२।
भावार्थ : -- विधाता ने समर्थ हेतु ही ज्ञान की रचना की, असमर्थ हेतु दान की रचना की, दुर्दशाग्रस्त हेतु दया की रचना की इस प्रकार धर्म के चार चरण : -- सत्य, शौच, दया व दान पर चलने वाले के लिए सम्मान को रचा ॥
टिप्पणी : -- सत्य शौच, ज्ञान के ही लक्षण हैं ॥
रुधिर चरन तन संचरै , हियरा के करि काम ।
कर करत रत कार भला, अनभल नाम बिश्राम । ५८३।
भावार्थ : -- ह्रदय के कार्य वश रुधिर के संचरण ही से यह शरीर चलायमान है, इस प्रकार हाथ भी कार्यशील रहे तो अच्छा है, विश्राम का नाम काल का सूचक है ॥
धरनी भँवरे चंदु भँवरे, भँवरे मंडल सौर ।
बहोरि बिनु परिश्रम किये, तू काहे एक ठौर ।५८४।
भावार्थ : -- जब धरती भ्रमण कर रही, चन्दा भ्रमण कर रहा है नौ गृह और सत्ताईस उपग्रह भ्रमण कर रहे हैं । रे मनुष्य ! फिर तू बिना परिश्रम के एक ही स्थान पर क्यूँ बैठा है ॥
गहनहि गर्त खोरी कै जोट गोट गोड़ाए।
काल अलकतर जोरि के पंथ बिछावत जाए |585|
भावार्थ : -- गहरे गड़े खोद के, गिट्टी जोड़कर एक सार करके,काला चारकोल मिलाकर यह युवा, सुन्दर मार्ग बना रहा है ॥
घट की पूँजी भै पयस घट की पूँजी साँस ।
जब दुनौ के घटे बयस गये घाट के पास ।586।
भावार्थ : -- मटके की पूँजी पानी है, और देह की पूंजी, सांस है । जब दोनों की पूँजी की शक्ति घटी , तो एक शमशान में गया, दूसरा नदी तट पर ||
बैनी मति के भेद दे बैनी दे मत भेद ।
बैनी मुख मत तेज दे बैनी दे सब छेद ।587।
भावार्थ : -- वाणी मन के भेद देती है, वाणी मतभेद करवा देती है । वाणी के शब्द अधिक तीव्र नहीं होने चाहिए,
अन्यथा वह बाण के जैसे अपने लक्ष्य को प्राप्त करके ही रहती है ।।
अर्थात : -- " तोल मोल के बोल"
बरे बरे भाखा थरी , बरे भेस परिधान ।
सिद्ध करे ते नउ नवल, होए न पंथ पुरान |588|
भावार्थ : -- वैश्विक भाषा एवं उत्तम वेश-भूषा एवं उत्तम स्थान ग्रहण कर,प्राचीन विचार आधुनिक सिद्ध नहीं होते ॥
अर्थात : --"भौतिकवाद एवं विचारवाद में मूलभूत अंतर होता है"
निर्धन के सत गुन रतन गिनते उपल समान ।
जे भए धनिक ते सब गन उपलहु रतनन मान |589|
भावार्थ: --निर्धन के सत्य रूपी रत्न को असत्य के पत्थर स्वरूप गिना जाता है । जब वह धनवान हो जाता है तो उसके असत्य के पत्थरों को भी रत्नमाना जाता है ॥
अर्थात:-- "धन की चकाचौंध, मनुष्य को दिग्भ्रमित कर देती है"
बोली है भइ बहु बली, बोली है बहु मोल ।
बोली की गोली चली, खोली सबकी पोल |590|
भावार्थ : -- बोल में अत्यधिक बल होता है, बोल मूल्यवान भी हैं | बोल के अस्त्र रहस्य को भेद देते है॥
अर्थात : -- " संयमित वाणी, रहस्यों की रक्षा कवच है"
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