दै फुहारी सकल रंग चुनरी मोरी घार ।
कहो लला तोरे अंग रंगू को रँगधार ॥|450|
भावार्थ : -- सारे रंग तो फुहार देकर मेरी चुनरी में भर दिए गोरी कहती है रे! लला, अब तेरे अंग मैं कौन सा रंग लगाऊ ॥
चित भीति एक कूप खनी तामैं हरि दइ बोर ।
ते रँगेजल भरि लिखनी लिखै भगति रस खोर |572|
भावार्थ : -- ह्रदय के अन्दर एक कुवां खोद कर, उस में श्रीहरि( ईश्वर) को डुबो दिया । ऐसे रंग के जल को अर्थात नीले जल में भर कर लिखनी ने भक्ति रस उकेरा ।।
हरि हरिता गौ ग्रास वेनु का अधरोपर वास ।
सुर सरगम सर साँस जल जमुना के तीर |573|
भावार्थ : -- गायों का हरा हरा आहार है, बाँसुरी कर अधरों पर अधिवास है । साँसों में सुरों की सरगम माला है, कहाँ?? जमुना के किनारे ॥
" बांसुरी की खोज भगवान कृष्ण की है"
अरन बरन बर्निक मिले मिले बरनन न बैन ।
पढ़न न को पर्निक मिले तेरे रुप के सैन |574|
भावार्थ : -- लेखक को अक्षर के भेद तो मिल गए, किन्तु वर्णन हेतु भाषा नहीं मिली । तेरे रूप चिन्ह को पढ़ने के लिए कोई भी पृष्ठ नहीं मिला ॥
अर्थात: -- "सुन्दरता अनुभूति की विषय वस्तु है"
कहो लला तोरे अंग रंगू को रँगधार ॥|450|
भावार्थ : -- सारे रंग तो फुहार देकर मेरी चुनरी में भर दिए गोरी कहती है रे! लला, अब तेरे अंग मैं कौन सा रंग लगाऊ ॥
चित भीति एक कूप खनी तामैं हरि दइ बोर ।
ते रँगेजल भरि लिखनी लिखै भगति रस खोर |572|
भावार्थ : -- ह्रदय के अन्दर एक कुवां खोद कर, उस में श्रीहरि( ईश्वर) को डुबो दिया । ऐसे रंग के जल को अर्थात नीले जल में भर कर लिखनी ने भक्ति रस उकेरा ।।
हरि हरिता गौ ग्रास वेनु का अधरोपर वास ।
सुर सरगम सर साँस जल जमुना के तीर |573|
भावार्थ : -- गायों का हरा हरा आहार है, बाँसुरी कर अधरों पर अधिवास है । साँसों में सुरों की सरगम माला है, कहाँ?? जमुना के किनारे ॥
" बांसुरी की खोज भगवान कृष्ण की है"
अरन बरन बर्निक मिले मिले बरनन न बैन ।
पढ़न न को पर्निक मिले तेरे रुप के सैन |574|
भावार्थ : -- लेखक को अक्षर के भेद तो मिल गए, किन्तु वर्णन हेतु भाषा नहीं मिली । तेरे रूप चिन्ह को पढ़ने के लिए कोई भी पृष्ठ नहीं मिला ॥
अर्थात: -- "सुन्दरता अनुभूति की विषय वस्तु है"
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