शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 57॥ -----

दै फुहारी सकल रंग चुनरी मोरी घार । 
कहो लला तोरे अंग रंगू को रँगधार ॥|450|

भावार्थ : -- सारे रंग तो फुहार देकर मेरी चुनरी में भर दिए गोरी कहती है रे! लला, अब तेरे अंग मैं कौन सा रंग लगाऊ  ॥ 

चित भीति एक कूप खनी तामैं हरि दइ बोर । 
ते रँगेजल भरि लिखनी लिखै भगति रस खोर |572| 

भावार्थ : -- ह्रदय के अन्दर एक कुवां खोद कर, उस में श्रीहरि( ईश्वर)  को डुबो दिया । ऐसे रंग के जल को अर्थात नीले जल में भर कर लिखनी ने भक्ति रस उकेरा ।। 

हरि हरिता गौ ग्रास  वेनु का अधरोपर वास  । 
सुर सरगम सर साँस जल जमुना के तीर |573|

भावार्थ : -- गायों का हरा हरा आहार है, बाँसुरी कर अधरों पर अधिवास है । साँसों में सुरों की सरगम माला है, कहाँ??  जमुना के किनारे ॥

              " बांसुरी की खोज भगवान कृष्ण की है" 

अरन बरन बर्निक मिले मिले बरनन न बैन ।
पढ़न न को पर्निक मिले तेरे रुप के सैन |574| 

भावार्थ : -- लेखक को अक्षर के भेद तो मिल गए, किन्तु वर्णन हेतु भाषा नहीं मिली । तेरे रूप चिन्ह को पढ़ने के लिए कोई भी पृष्ठ नहीं मिला ॥ 

अर्थात: --  "सुन्दरता अनुभूति की विषय वस्तु है" 




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