शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 56॥ -----

अधरोपर धरे बाँसुरी साँवरिया सुर संग । 
राधा नगरि ढूँड रही चाह मलूँ मुख रंग । 561-क।  

नहि मिलै तो सोचि खड़ी रँग खेलूं किस संग । 
झाँक कर देखि बावरी चित मैं रसिया रंग ।561-ख। 

भावार्थ : -- अधरों पर बांसुरी रखे, श्याम सुरों के साथ हैं । राधे ने मुख में रंग लगाने की चाह में उन्हें सारा नगर ढूंड लिया ।1। 

जब नहीं मिले तो खड़ी होकर सोचने लगी अब मैं किस के साथ होली खेलूं । जब ह्रदय में झांक कर देखा, कृष्ण तो यहाँ सुशोभित हैं  | 2 । 

घिर बन कलि कलियाइ नीर नुपूर चरन धरे  ।                                            
भँवर भँवर भरमाए जोग रहि दिखावन नाच |562-क|

राग रंग बरनाए  पत रुर सुर सरगम भरे  । 
जोबन के बलियाए अंग अंग कंचन काँच |562-ख| 

आवनु कहि, नहि आए जोगत नैन हरिद बरे । 
रोचन मुख मुरझाए करि बड़बड़ कह कछु बाँच |562-ग|


 लालि चुनर कँध ढारि  कर गोरी केस नियास । 

 जोगि पथ खड़ी कठारि धर पिय दर्सन अभिलाख  ।562-घ।  

भावार्थ -- वन में घिर कर कलियाँ प्रस्फुटित हुई,  पैर को बूंदों के  घुंघरू सेसुसज्जित  कर भ्रमर के भ्रम में भ्रमण करती, नाच दिखाने हेतु उसकी राह देख रही हैं ॥

अद्भुत राग को वरण किये सुदर पत्र सुरमयी हो उठे । यौवन सेपरिपूर्ण पुष्प के अंग प्रत्यंग स्वर्णमयी एवं कांच के जैसे कोमल हैं ॥

आने को तो कहे थे पर नहीं आए, प्रतीक्षा में नयन भी पीले पड़ गए ॥ मुख की शोभा जाती रही और कलि मुख से  कुछ प्रलाप रही है ॥ 

कंधे पर लाल ओढ़नी डाल कर, केश विन्यासित कर । नदी के तट पर प्रियतमा, प्रियवर के मिलन की अभिलाषा में खड़ी है॥  

घट घट समतल घाटि गिरि जे घट मेढ़ किसान । 
बरसे बदरा ज्ञान घिरि ठारे नीर निपान । 563 -क। 

जे बिय बोए मेढ़ बँधे उपजै ते फल फूल ।
मंद मंद सुरभित गँधे गँधे न झाड़ी बबूल ।563-ख। 

भावार्थ : -- प्रत्येक शरीर  समतल धरा, पहाड़ी एवं पर्वत के समान है, ज्ञान का पानी उस शरीर में ठहरता है जो शरीर किसान के खेत के समान है  ।1। 

जो बिज खेत में बोये हुवे है उनमें हुई फल फुल की उपज होती है और वे ही भीने भीने मधुर गंध देते है जो झाडी बबूल होते है वे नहीं गंधाते | 2 । 

कारे कारे करज कर सारी कुम्भी कार । 
गोरे घर धरे भर भर कारे गौरस सार |564-क|

अंक तंत्र के मंत्र पढ़ गुणा भाग कर जोर  । 

काँधे उपर काँधे चढ़ लटकी मटकी फोर |564-ख|  
भावार्थ : -- मटकीकार ने अपनी हाथो की उंगलियों से कला कर मटकी बनाई श्यामा गाय के दूध से बने मक्खन को उस मटकी में भर कर गोरे के घर में रख दी । 

अंक एवं बिज गणित के मंत्र को पढ़ कर तू गुणा भाग कर और फिर जोड़ लगा । इसके पश्चात कंधे के ऊपर कंभे पर चढ़ कर उस मटकी को फोड़ दे ॥  

जाउँ नदिया पार कहे अलबेली सी नाँव । 
कमल कर पतवार गहे रे सखि तू किस गाँव |565-क| 

बोली सखि सुन बतलाउँ जहँ बेली की छाँव । 
धारे धारे बहि जाउँ दूर पिया के गाँव |565-ख|

भावार्थ : -- एक अनूठी सी नाव कह रही है कि में नदी के पार जा रही हूँ । हे! मित्र  कमल जैसे हाथों में पतवार लिए, तुम कहाँ जा रही हो??॥ 

मित्र बोली सुनो बतलाती हूँ, कोमल शाखाओं से युक्त, उद्यान से घिरा हुवा,पहाड़ के किनारे दूर जो प्रियतम का गाँव दिखाई दे रहा है, में वहीं जा रही हूँ ॥  

मति कोस तूल तारि कै मत के डोरे बाँट  । 
बाटे कोर पिरोए दे आखर आखर छाँट |566-क| 

आँट आँट के गाँठ  घर गीर के घुँघरु घाल । 
पत्र पंगत के काँठ कर मंजु मनोहर माल |566-ख| 

भावार्थ: -- बुद्धि के कोष से कपास के तार बनाकर  फिर विचारों की डोरी बना वलयित छोर से अक्षर अक्षर का चयन कर उसमें पिरो दे॥ 

गहरी गाँठ लगा कर उसमें भाषा के घुंघरू डाल यह सुन्दर मन को हरने वाली माला पत्र पंक्तियों के कंठ में उतार कर ||

फूर फर खाट खोर दे लाख लखन गुन धार। 
तोड़ ताड़ के जोर दे फिर दै घाट उतार ।५६७-क ।  

फूर फर खाट खोर दे लकरी बहु गुन धार 
तोड़ ताड़ के जोर दे फिर दै घाट उतार । ५६७-ख । 

भावार्थ : -- फुल,फल, सय्या और आच्छादन देती है, इसमें अत्यधिक लक्षणों से युक्त एवं अति गुण कारी है । यदि इसे तोड़ कर पुन: जोड़ दें तो यह घाट भी उतार देती है ॥

फुल,फल, सय्या और आच्छादन देती है, लकड़ी अत्यधिक लक्षणों से युक्त एवं अति गुण कारी है । यदि इसे तोड़ कर पुन: जोड़ दें तो यह घाट भी उतार देती है ॥

घाट उतार = नदी, समुद्र आदि के पार, अंतिम संस्कार  

भरत देस राउ नगरी चारू चौंक निबास । 
बाट बीथि बिच हाट भरे  नीम पेड़ के पास |568-क| 

टनटना कर पोर पँवर मटुकी लई बिसाए । 
तापे जल सीतल करे थापे तान सुनाए |568-ख| 


भावार्थ :-- भारत देश  की एक राजधानी सुन्दर चौराहा बसा है । जहांमार्ग ऊपर गली के बिच एक क्रय-विक्रय केंद्र है 

उस केंद्र के एक द्वार के पास ठोक बजा के एक मटकी क्रय की, जो तिप्त जल को शीतल तो करती ही है थपथपाने से मीठी तान भी सुनाती है ॥ 

अपनी सुध बिसराए के चित सँवरे सुध धार ।
नयन पलक पथराए के जोग रही हरकार ।५६९ -क।

सँवरे सँवरे दिन रैन सँवरे सँवरे नैन ।
बिनु सँवरे सँवरे नैन सँवरे दिन अरु रैन ।५६९-ख।   

भावार्थ : -- अपना ध्यान न करते हुवे चित्त में प्रियतम का ध्यान करते हुवे, डाकिये की प्रतीक्षा करते करते प्रियतमा की आँखें पथरा गईं

दिन और रात तो सजे हुवे हैं नयन भी सज ही गए किन्तु बिना प्रियतम के नयन, दिवस तथा रयन सज के भी साँवले से हो गए ॥ 

बन भेस बदल रितु राजन राजे..,
सखी राजुं में किस भेस..,
पिय बिनु सोला सिंगार न साजे..,
पिय प्रबसे पराये देस.....

समरथ आपन आप कँह, भाव पद धनाधार । 
जेइ मंतर की जपनी ले, आपन भाव सुधार ।५७०-क। 

को भाव कोउ धाम धन, को पद पदक अधीन । 
तेइ मुक्ति पत आपनै, समरथ तिन्ह कहीन ।५७०-ख। 

भावार्थ : - जो पद एवं धन स्थिति के अनुसार स्वयं को समर्थ समझते हैं । उन्हें इस मंत्र की जपनी धारण करके अपनी समझ में सुधार कर लेना चाहिए ॥

कोई सत्ता, कोई धन संपत्ति, कोई पद, कोई उपाधि, पुरस्कारों के अधीन व्यक्ति समर्थ नहीं कहलाता । जो  इन समस्त साधनों से स्वतन्त्र होकर स्वयं  स्वामी  है वही  समर्थ है ॥





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