शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 55॥ -----

देस दसा दरसत और, सासक दिसि कहँ और । 
सुधि बुधि सकल बिसारि कै, सोवत सारत सौर /५५१ /
भावार्थ : -- देश, विपरीत दशा प्रस्तुत कर रहा है और शासक की दिशा कहीं और ही भटक रही है / समस्त बुद्धि एवं विवेक का परित्याग कर शासक चादर तान कर सो रहा है ॥ 

आए तौ सुघर काम करै जग में जो भी कोए । 
जब काल दंड धरे जाने को गत होए ।552।  

भावार्थ : -- इस संसार में जिस किसी ने भी जन्म लिया है, वह कल्याणकारी कार्य करे,क्योंकि मृत्यु जब डंडा पकड़ती है,  तो उसके प्रहार से जाने क्या दशा होगी ।। 

                अर्थात : -- "मनुष्य को मृत्यु से भयभीत रहना चाहिए" 

तना तने धँस धरनि तल धरे बिटप के भार । 
पर गगन के गह मंडल कौनु तने  आधार |553| 
भावार्थ : -- धरती में धंसा हुवा  पेड़ का तना, तन्यता से पूरित होकर वृक्ष का भार वहन किये हुवे है । किन्तु गगन का ग्रह मंडल चक्र कौन से तने पर आधारित है ??

बूंद अगारे सिन्धु के पर सब खारे होए | 
स्वाति की एक बिंदु के तबहिं प्यासे होए |554| 

भावार्थ : -- सागर के पास बूंदों का भण्डार है किन्तु सभी बूंदे खारी हैं | जभी वह स्वाति की एक बूंद का भी प्यासा होता है|| 

अर्थात : -- " मात्रा की अपेक्षा गुणवत्ता श्रेष्ठ होती है" 

कारे कारे पंथ तिर धारी पीली धार । 
दाहिने बाएँ फेरत सिर  देख भाल कर पार ।555। 

भावार्थ : -- काले काले मार्ग के किनारे पीली धारी रेखांकित है । जिसे दाहिने-बाएँ सिर घुमाकर भली भांति परीक्षा करने के पश्चात ही पार करना चाहिए ।।

अर्थात : -- "सावधानी हटी-और दुर्घटना घटी" 

उदधि उदक बाहन चढ़े, दानै गगन बिहार । 
हरियारी धन कन धरे, बन खलिहान अहार।५५६। 
भावार्थ : -- बादल के वाहन पर चढ़कर, आकाश में घूम घूम  कर दान दिया । हरियाली को अन्न कणों की संपत्ति मिली, क्षेत्र  एवं वनों को भोजन मिला ॥ 

एकपल धारे पुहुप रुप, एकपल उपल सरूप । 
देखो बरखत बारि की, महिमा महा अनूप ।५५७। 
भावार्थ : -- एक क्षण में पुष्प का रूप धारण कर लेती है तो दुसरे क्षण में वन पत्थर स्वरूप हो जाती है । देखों इस बरसती हुई बरखा की महिमा कितनी अपरम्पार है ॥ 

सागर सार सुत सुत सरि, चाहत चढ़न अगास । 
जोइ तपन तप चरन चरि, पावत सोइ निवास । ५५८। 
भावार्थ : -- सागर के समस्त जल मुक्तिक मालिकाएं आकाश पर चढ़ना की अभिलाषा किए हैं । किन्तु जिसने सूर्य का ताप सहन कर कठोर तपस्या की उसी ने वह परम स्थान प्राप्त किया ॥

उदर उदन कनक के कन, पावत औनइ पौन । 
सोचत बैठा भंडारी, अब उपजावै कौन । ५५९ । 

भावार्थ :-- उदर को गेहूं ,चावल आदि अनाज,  औने-पौने दाम में मिले । अब भंडारी माने की खजांची, गृहणी, किसान, श्रमिक, आदि सोचा रहे हैं, छोडो कौन अन्न उपजाए ॥  

अर्थात : -- "परिश्रम का अभाव, उत्पादन को प्रभावित करता है"   

भँवरत भूमि भाँवर पथ, निस दिन नित नय नेम । 
श्रम कारत करि अहिर्निस, कन  जनाए बर पेम ।५६०। 
भावार्थ : -- सौर मंडल में यह पृथ्वी, नित्य प्रतिदिन नियम धर कर बड़ी ही निपुणता से सूर्य का भ्रमण करती है । और श्रम कार्य करते हुवे रात -दिन प्रादुर्भूत कर प्रेम पूर्वक अन्न उपजाति है ॥ 

    
















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