देस दसा दरसत और, सासक दिसि कहँ और ।
सुधि बुधि सकल बिसारि कै, सोवत सारत सौर /५५१ /
भावार्थ : -- देश, विपरीत दशा प्रस्तुत कर रहा है और शासक की दिशा कहीं और ही भटक रही है / समस्त बुद्धि एवं विवेक का परित्याग कर शासक चादर तान कर सो रहा है ॥
आए तौ सुघर काम करै जग में जो भी कोए ।
जब काल दंड धरे जाने को गत होए ।552।
भावार्थ : -- इस संसार में जिस किसी ने भी जन्म लिया है, वह कल्याणकारी कार्य करे,क्योंकि मृत्यु जब डंडा पकड़ती है, तो उसके प्रहार से जाने क्या दशा होगी ।।
अर्थात : -- "मनुष्य को मृत्यु से भयभीत रहना चाहिए"
तना तने धँस धरनि तल धरे बिटप के भार ।
पर गगन के गह मंडल कौनु तने आधार |553|
भावार्थ : -- धरती में धंसा हुवा पेड़ का तना, तन्यता से पूरित होकर वृक्ष का भार वहन किये हुवे है । किन्तु गगन का ग्रह मंडल चक्र कौन से तने पर आधारित है ??
बूंद अगारे सिन्धु के पर सब खारे होए |
स्वाति की एक बिंदु के तबहिं प्यासे होए |554|
भावार्थ : -- सागर के पास बूंदों का भण्डार है किन्तु सभी बूंदे खारी हैं | जभी वह स्वाति की एक बूंद का भी प्यासा होता है||
अर्थात : -- " मात्रा की अपेक्षा गुणवत्ता श्रेष्ठ होती है"
कारे कारे पंथ तिर धारी पीली धार ।
दाहिने बाएँ फेरत सिर देख भाल कर पार ।555।
भावार्थ : -- काले काले मार्ग के किनारे पीली धारी रेखांकित है । जिसे दाहिने-बाएँ सिर घुमाकर भली भांति परीक्षा करने के पश्चात ही पार करना चाहिए ।।
अर्थात : -- "सावधानी हटी-और दुर्घटना घटी"
उदधि उदक बाहन चढ़े, दानै गगन बिहार ।
हरियारी धन कन धरे, बन खलिहान अहार।५५६।
भावार्थ : -- बादल के वाहन पर चढ़कर, आकाश में घूम घूम कर दान दिया । हरियाली को अन्न कणों की संपत्ति मिली, क्षेत्र एवं वनों को भोजन मिला ॥
एकपल धारे पुहुप रुप, एकपल उपल सरूप ।
देखो बरखत बारि की, महिमा महा अनूप ।५५७।
भावार्थ : -- एक क्षण में पुष्प का रूप धारण कर लेती है तो दुसरे क्षण में वन पत्थर स्वरूप हो जाती है । देखों इस बरसती हुई बरखा की महिमा कितनी अपरम्पार है ॥
सागर सार सुत सुत सरि, चाहत चढ़न अगास ।
जोइ तपन तप चरन चरि, पावत सोइ निवास । ५५८।
भावार्थ : -- सागर के समस्त जल मुक्तिक मालिकाएं आकाश पर चढ़ना की अभिलाषा किए हैं । किन्तु जिसने सूर्य का ताप सहन कर कठोर तपस्या की उसी ने वह परम स्थान प्राप्त किया ॥
उदर उदन कनक के कन, पावत औनइ पौन ।
सोचत बैठा भंडारी, अब उपजावै कौन । ५५९ ।
भावार्थ :-- उदर को गेहूं ,चावल आदि अनाज, औने-पौने दाम में मिले । अब भंडारी माने की खजांची, गृहणी, किसान, श्रमिक, आदि सोचा रहे हैं, छोडो कौन अन्न उपजाए ॥
अर्थात : -- "परिश्रम का अभाव, उत्पादन को प्रभावित करता है"
भँवरत भूमि भाँवर पथ, निस दिन नित नय नेम ।
श्रम कारत करि अहिर्निस, कन जनाए बर पेम ।५६०।
भावार्थ : -- सौर मंडल में यह पृथ्वी, नित्य प्रतिदिन नियम धर कर बड़ी ही निपुणता से सूर्य का भ्रमण करती है । और श्रम कार्य करते हुवे रात -दिन प्रादुर्भूत कर प्रेम पूर्वक अन्न उपजाति है ॥
सुधि बुधि सकल बिसारि कै, सोवत सारत सौर /५५१ /
भावार्थ : -- देश, विपरीत दशा प्रस्तुत कर रहा है और शासक की दिशा कहीं और ही भटक रही है / समस्त बुद्धि एवं विवेक का परित्याग कर शासक चादर तान कर सो रहा है ॥
आए तौ सुघर काम करै जग में जो भी कोए ।
जब काल दंड धरे जाने को गत होए ।552।
भावार्थ : -- इस संसार में जिस किसी ने भी जन्म लिया है, वह कल्याणकारी कार्य करे,क्योंकि मृत्यु जब डंडा पकड़ती है, तो उसके प्रहार से जाने क्या दशा होगी ।।
अर्थात : -- "मनुष्य को मृत्यु से भयभीत रहना चाहिए"
तना तने धँस धरनि तल धरे बिटप के भार ।
पर गगन के गह मंडल कौनु तने आधार |553|
भावार्थ : -- धरती में धंसा हुवा पेड़ का तना, तन्यता से पूरित होकर वृक्ष का भार वहन किये हुवे है । किन्तु गगन का ग्रह मंडल चक्र कौन से तने पर आधारित है ??
बूंद अगारे सिन्धु के पर सब खारे होए |
स्वाति की एक बिंदु के तबहिं प्यासे होए |554|
भावार्थ : -- सागर के पास बूंदों का भण्डार है किन्तु सभी बूंदे खारी हैं | जभी वह स्वाति की एक बूंद का भी प्यासा होता है||
अर्थात : -- " मात्रा की अपेक्षा गुणवत्ता श्रेष्ठ होती है"
कारे कारे पंथ तिर धारी पीली धार ।
दाहिने बाएँ फेरत सिर देख भाल कर पार ।555।
भावार्थ : -- काले काले मार्ग के किनारे पीली धारी रेखांकित है । जिसे दाहिने-बाएँ सिर घुमाकर भली भांति परीक्षा करने के पश्चात ही पार करना चाहिए ।।
अर्थात : -- "सावधानी हटी-और दुर्घटना घटी"
उदधि उदक बाहन चढ़े, दानै गगन बिहार ।
हरियारी धन कन धरे, बन खलिहान अहार।५५६।
भावार्थ : -- बादल के वाहन पर चढ़कर, आकाश में घूम घूम कर दान दिया । हरियाली को अन्न कणों की संपत्ति मिली, क्षेत्र एवं वनों को भोजन मिला ॥
एकपल धारे पुहुप रुप, एकपल उपल सरूप ।
देखो बरखत बारि की, महिमा महा अनूप ।५५७।
भावार्थ : -- एक क्षण में पुष्प का रूप धारण कर लेती है तो दुसरे क्षण में वन पत्थर स्वरूप हो जाती है । देखों इस बरसती हुई बरखा की महिमा कितनी अपरम्पार है ॥
सागर सार सुत सुत सरि, चाहत चढ़न अगास ।
जोइ तपन तप चरन चरि, पावत सोइ निवास । ५५८।
भावार्थ : -- सागर के समस्त जल मुक्तिक मालिकाएं आकाश पर चढ़ना की अभिलाषा किए हैं । किन्तु जिसने सूर्य का ताप सहन कर कठोर तपस्या की उसी ने वह परम स्थान प्राप्त किया ॥
उदर उदन कनक के कन, पावत औनइ पौन ।
सोचत बैठा भंडारी, अब उपजावै कौन । ५५९ ।
भावार्थ :-- उदर को गेहूं ,चावल आदि अनाज, औने-पौने दाम में मिले । अब भंडारी माने की खजांची, गृहणी, किसान, श्रमिक, आदि सोचा रहे हैं, छोडो कौन अन्न उपजाए ॥
अर्थात : -- "परिश्रम का अभाव, उत्पादन को प्रभावित करता है"
भँवरत भूमि भाँवर पथ, निस दिन नित नय नेम ।
श्रम कारत करि अहिर्निस, कन जनाए बर पेम ।५६०।
भावार्थ : -- सौर मंडल में यह पृथ्वी, नित्य प्रतिदिन नियम धर कर बड़ी ही निपुणता से सूर्य का भ्रमण करती है । और श्रम कार्य करते हुवे रात -दिन प्रादुर्भूत कर प्रेम पूर्वक अन्न उपजाति है ॥
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