मंगलवार, 13 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 45॥ -----

सुमनस होत बहुस जात, सुबास होत अजात । 
ज्ञानी होत जात रहित, जात जुगत जस गात /४ ५१/
भावार्थ : -- पुष्प की बहुंत सी प्रजातियाँ होती हैं जैसे : -- बेला, चमेली,रजनी गंधा आदि आदि किन्तु गंध की कोई जाती नहीं होती जैसे शरीर जातियुक्त होता है कैसे : "ये साधु है" माने मर्द जात का है, ये साध्वी है माने औरत जात है, 'ये ज्ञानी है' पता नहीं मर्द है, कि औरत है, कि हिन्दू कि मुस्लिम है, कि सिक्ख है, कि ईसाई है.…।
किन्तु भैया.....ये ज्ञानी है॥

पाछिन के न सुध सुरता, परखे दाएँ न बाएँ /
चला अगौहें आँधरा , लै जा गेरे खाए /४५२ /
भावार्थ : -- भूतकाल का न तो स्मरण है न ही वह ध्यान में है , और न ही दाहिन-बाएँ  को जांचा-परखा । फिर ये अंधे आगे जा रहे हैं.....देश को आगे ले जा रहे हैं .....ले जा के खाई में गेर देंगे.....

किये दोष अपराध के, दरस भाउ गंभीर /
एक जन दुजन संगठन कि, कारे कोउ सरीर/४५३/
भावार्थ : -- किये गए दोष अथवा अपराध की गंभीरता को देखना चाहिए, चाहे वह व्यक्ति अथवा व्यक्तियों अथवा कोई संगठन अथवा किसी संस्था द्वारा कारित क्यों न किया गया हो ॥

अर्थात : -- अपराध के स्वरूप को देखना चाहिए, अपराधी के नहीं

शब्द समउ जोगता कभु, समउ शब्द को जोग । 
शब्द बियुग्म बियोग कभु, समउ बियुग्म बियोग /४५४।   
भावार्थ : -- शब्द समय की प्रतीक्षा करता है, अर्थात हम कुछ कहना चाहते हैं किन्तु समय उचित नहीं होता , कभी समय शब्द की प्रतीक्षा करता है अर्थात अवसर उचित होता है किन्तु  हमारे पास कहने को शब्द नहीं होते । इस प्रकार कभी शब्द समय के बिना अकेले होते हैं कभी समय शब्द के बिना अकेला  होता हैं ॥ 

" उचित समय पर उचित वाक्य के प्रयोग से जो भाव प्रवाहित होता है उससे एक चमत्कार की अनुभूति होती है 

बोले बोल अधिकाधिक कथन कहावत जोर । 
लाख अरथ सूक्ति सटिक बचन धरावत जोर |455| 

भावार्थ : -- यदि वर्णन में कहावत संयुक्त हो तो वह,थोड़े शब्दों में अधिक अर्थ उत्पन्न करते है । वही सूक्ति अधिक अर्थ रखती है जिसमे सार्थक शब्दों का समूह हो ।। 

कीरी के सम कर उदर करे अल्प आहार । 
कुंजर काय सम मति कर भरे ज्ञान भंडार ।456। 

भावार्थ : -- पेट को हाथी की आकृति नहीं देनी चाहिए, क्योंकि हाथी बहुत अधिक खाता है, चींटी की आकृति देनी चाहिए, जो थोड़ा सा खाती है, बुद्धि को हाथी की आकृति देकर, ज्ञान का अधिकाधिक भंडारण करना चाहिए ॥ 

खात अघात वमन करें बांधे सौ सौ गाँठ । 
पुनि देहरि पसार खढ़े मारे सिर लठ आठ |457| 

भावार्थ : -- जो भिखारी, खा खाके उल्टियां करते हैं और अत्यधिक संचय भी करते है   यदि वे  देहली पर मांगने हेतु पुन: खड़े हों, तो उनके सिर पर आठ डंडे मार के उन्हें भगा देना चाहिए ॥ 

धरनी के अँधेर मिटे उग अम्बर जब सूर । 
मूरख कहत मलत डिठे हम जागे तौ भूर |458| 

भावार्थ : -- धरती का अन्धेरा आकाश में सूर्योदय से हटता है । और ज्ञान हीन आँख  मलते हुवे कहते हैं कि,
हमारे जागृत होने से ही सुबह हुई ॥  

अर्थात : -- " अकर्मण्य अन्य की कृति का भी श्रेय ले लेते हैं"  

जोगे बनिक बनि पंगत कहु को गाहक आए । 
एक दिनु साँस काल अगत बिना मोल ले जाए ।|459|

भावार्थ : -- बाजार में व्यापारी ग्राहक की प्रतीक्षा कर रहा है वह कहीं से तो आए । एक दिन, जब मृत्यु का आगमन होगा, तो वह बिना मूल्य चुकाए ही, प्राण  ले जाएगी ॥ 

मंदर मंदर चढि रहे ते सम्पद का मान ।  
चरनन गहि सथ हरि रहे जे कर दीनन दान |460| 

भावार्थ : -- मंदिरों पर चढ़ी धन-सम्पति का क्या मोल है ? कोई नहीं । जो सम्पति दुर्दशा ग्रस्त लोगो को दान दी जाती है, वह संपत्ति हीप्रभु को प्राप्त होती है ॥ 

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