साधु संत जस शब्द मह अनुगत अर्थ अनेक ।
भेस धरे कँह आँधरे, नयनइ ज्ञान बिबेक /५४१ /
भावार्थ : --साधू ,सुधिजन, संत,सज्जन जैसे शब्द में अनेक अर्थ निहित हैं । अविद्या के वशीभूत अंध जनों के लिए विभिन्न वेश धारियों को ही साधू,संत कहते हैं जबकि ज्ञान दृष्टि रखने वाले विद्वान, ज्ञान और एवं विवेक शील जनों को ही साधू,संत कहते हैं ॥
ज्ञानी लेइ डूब तरे, शब्द सिन्धु सुत सार ।
अज्ञानी तिर डूब मरे, राखार गार निकार । ५४२ ।
भावार्थ : -- शब्द के सागर में जब ज्ञानी डूबे तो मोती मोती लेकर निकले । और अज्ञानी राखड़ गारे जैसे अवशिष्ट पदार्थ लेकर तट पर ही डूब मरे ॥
दीन धनी न अति सुख-दुःख , धर्म निरत जँह लोग ।
रोष दोष राग न लाग, ते भू राजन जोग । ५४३ ।
भावार्थ : --जहाँ न अधिक विपन्नता हों न ही अधिक संपन्नता हों, न तो अधिक दुःख हो और न ही अधिक सुख हो और जहां लोग अपने अपने -धर्म-कर्म में चित्त लगाए हों । जहां न अधिक रोष हो न ही अधिक दोष हो न तो अधिक राग-द्वेष हो, वह भूमि निवास हेतु योग्य है अथवा वह भू शासक योग्य है ॥
प्रीति जन पद नीति निरत, सेवा धर्म सुभाउ ।
सुधि सुधरमन जन जन जे, जोग जुगित ते राउ । ५४४।
भावार्थ : -- जनता के चरणों में ही प्रेम, केवल नीतियों में ही अनुरक्ति धर्म जिसका सेवा धर्म, जन जन के न्याय कर्तव्यों के प्रति चैतन्यता, यह शासक की युक्तियुक्त योग्यता है ॥
मुख दै रसन करन श्रवन नैनन दरस सँसार ।
बैन बदनन मति मंथन अस भगवन तन सार |545|
भावार्थ : -- मुँह स्वाद लेने हेतु दिया कान सुनाने हेतु दिए, आख संसार को देखे के लिए दीं । वाणी, अभिव्यक्ति हेतु दी, बुद्धि विचार करने हेतु प्रदान की, इस प्रकार ईश्वर ने मानव शरीर की रचना की ॥
सीत तपन घन से रखन करपर सीस टिकाए |
तन रखन ढँके बहु बसन मन के कौन ढँकाए | 546|
भावार्थ : -- ठंड, गर्मी और वर्षा से रक्षा हेतु सिर पर छाया कर ली,शरीर की रक्षा के लिए बहुत प्रकार के वस्त्र धारण कर लिए, किन्तु मन की विषय वासना को किससे ढँका ?
मानस जीवन सेतु सम बंधे दो ही छोर ।
एक मरनी ते एक जनम तापर सँस पद दौर |547|
भावार्थ : -- मानव का जीवन भी, सेतु के समान दो छोर में बंधा है । एक छोर जन्म से, दूसरा मृत्यु से, इस सेतु पर सांस रूपी चरण दौड़ लगा रहे हैं ||
मेघ काल बरन मिटाए निर्मल जल बरसाए ।
सीस काल चरन हटाए जोग ज्ञान बर पाए |548|
भावार्थ : -- मेघ मैल मिटा कर, केवल स्वच्छ जल की वर्षा करता है । उसी प्रकार यदि शिष्य भी कलुषित आचरण का त्याग करे,तो उसे भी शुद्ध एवं उत्कृष्ट ज्ञान की प्राप्ति होगी ॥
जलधि मल धर निज निवास निर्मल जल घन दाए ।
अवगुन धर गुरु आपन पास सदगुन सीस पढ़ाए |549|
भावार्थ : -- मैले और खारे जल को सागर अपने पास रखता है, मेघ को स्वच्छ जल देता है उसी प्रकार गुरु भी अवगुणों को अपने पास रखकर, छात्र को सद्गुणों का पाठ पढाता है ॥
जन संचालन तंत्र भित, जहां दोष भए गौन ।
न्याय प्रबंध विफल कृत , तहाँ दंड धरि मौन /550 ।
भावार्थ : -- जन संचालन तंत्र में जहां दोष गौण हो जाता है, वहां न्यायिक व्यवस्था को विफल करते हुवे,दंड मौन धारण कर लेता है ।।
संक्षेप में : -- "जहां दोष गौण हो जाए, वहां दंड मौन हो जाता है"
भेस धरे कँह आँधरे, नयनइ ज्ञान बिबेक /५४१ /
भावार्थ : --साधू ,सुधिजन, संत,सज्जन जैसे शब्द में अनेक अर्थ निहित हैं । अविद्या के वशीभूत अंध जनों के लिए विभिन्न वेश धारियों को ही साधू,संत कहते हैं जबकि ज्ञान दृष्टि रखने वाले विद्वान, ज्ञान और एवं विवेक शील जनों को ही साधू,संत कहते हैं ॥
ज्ञानी लेइ डूब तरे, शब्द सिन्धु सुत सार ।
अज्ञानी तिर डूब मरे, राखार गार निकार । ५४२ ।
भावार्थ : -- शब्द के सागर में जब ज्ञानी डूबे तो मोती मोती लेकर निकले । और अज्ञानी राखड़ गारे जैसे अवशिष्ट पदार्थ लेकर तट पर ही डूब मरे ॥
दीन धनी न अति सुख-दुःख , धर्म निरत जँह लोग ।
रोष दोष राग न लाग, ते भू राजन जोग । ५४३ ।
भावार्थ : --जहाँ न अधिक विपन्नता हों न ही अधिक संपन्नता हों, न तो अधिक दुःख हो और न ही अधिक सुख हो और जहां लोग अपने अपने -धर्म-कर्म में चित्त लगाए हों । जहां न अधिक रोष हो न ही अधिक दोष हो न तो अधिक राग-द्वेष हो, वह भूमि निवास हेतु योग्य है अथवा वह भू शासक योग्य है ॥
प्रीति जन पद नीति निरत, सेवा धर्म सुभाउ ।
सुधि सुधरमन जन जन जे, जोग जुगित ते राउ । ५४४।
भावार्थ : -- जनता के चरणों में ही प्रेम, केवल नीतियों में ही अनुरक्ति धर्म जिसका सेवा धर्म, जन जन के न्याय कर्तव्यों के प्रति चैतन्यता, यह शासक की युक्तियुक्त योग्यता है ॥
मुख दै रसन करन श्रवन नैनन दरस सँसार ।
बैन बदनन मति मंथन अस भगवन तन सार |545|
भावार्थ : -- मुँह स्वाद लेने हेतु दिया कान सुनाने हेतु दिए, आख संसार को देखे के लिए दीं । वाणी, अभिव्यक्ति हेतु दी, बुद्धि विचार करने हेतु प्रदान की, इस प्रकार ईश्वर ने मानव शरीर की रचना की ॥
सीत तपन घन से रखन करपर सीस टिकाए |
तन रखन ढँके बहु बसन मन के कौन ढँकाए | 546|
भावार्थ : -- ठंड, गर्मी और वर्षा से रक्षा हेतु सिर पर छाया कर ली,शरीर की रक्षा के लिए बहुत प्रकार के वस्त्र धारण कर लिए, किन्तु मन की विषय वासना को किससे ढँका ?
मानस जीवन सेतु सम बंधे दो ही छोर ।
एक मरनी ते एक जनम तापर सँस पद दौर |547|
भावार्थ : -- मानव का जीवन भी, सेतु के समान दो छोर में बंधा है । एक छोर जन्म से, दूसरा मृत्यु से, इस सेतु पर सांस रूपी चरण दौड़ लगा रहे हैं ||
मेघ काल बरन मिटाए निर्मल जल बरसाए ।
सीस काल चरन हटाए जोग ज्ञान बर पाए |548|
भावार्थ : -- मेघ मैल मिटा कर, केवल स्वच्छ जल की वर्षा करता है । उसी प्रकार यदि शिष्य भी कलुषित आचरण का त्याग करे,तो उसे भी शुद्ध एवं उत्कृष्ट ज्ञान की प्राप्ति होगी ॥
जलधि मल धर निज निवास निर्मल जल घन दाए ।
अवगुन धर गुरु आपन पास सदगुन सीस पढ़ाए |549|
भावार्थ : -- मैले और खारे जल को सागर अपने पास रखता है, मेघ को स्वच्छ जल देता है उसी प्रकार गुरु भी अवगुणों को अपने पास रखकर, छात्र को सद्गुणों का पाठ पढाता है ॥
जन संचालन तंत्र भित, जहां दोष भए गौन ।
न्याय प्रबंध विफल कृत , तहाँ दंड धरि मौन /550 ।
भावार्थ : -- जन संचालन तंत्र में जहां दोष गौण हो जाता है, वहां न्यायिक व्यवस्था को विफल करते हुवे,दंड मौन धारण कर लेता है ।।
संक्षेप में : -- "जहां दोष गौण हो जाए, वहां दंड मौन हो जाता है"
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