भोग वाद कुनय गहने, ए बेर बहुसह देस ।
धर्म चरन निज परिहरत , वाके अनुगम सेष । ५३१ ।
भावार्थ : -- वर्त्तमान काल में भूयश: राष्ट्रों ने भोग वादी कुनीतियाँ अपना रखी हैं, अर्थात जब तक हम जीवित है इस पृथ्वी का भरपूर उपभोग करें, चाहे भविष्य अन्धकार में क्यों न रह जाए॥ शेष सभी देश अपने
स्वाभाविक आचरणों का परित्याग कर, इनकी ऐसी कुनीतियों का ही अनुगमन करते हुवे परिलक्षित हो रहे हैं ॥
स्वाभाविक आचरणों का परित्याग कर, इनकी ऐसी कुनीतियों का ही अनुगमन करते हुवे परिलक्षित हो रहे हैं ॥
देस प्रमुख करि करि कुनय, दुराचार भव भूरि ।
धूत चरन भै वंदनै, सदाचार परि धूरि । ५३२ ।
भावार्थ : -- राष्ट्र के प्रमुखों ऐसी अनीतियाँ कारित कर रहें हैं जिनके कारण संसार में निन्दित आचरण प्रसारित हो रहा है । जिसके प्रभाव से धूर्त चरित्रों के चरण पूज्यनीय हो गए हैं और उत्तम चरित्र पर धूल पड़ी हुई है ॥
काल पानि कुराउ भाल, कारन कुनय कराल ।
पंच भूत उदरन घाल, कारत भव भूचाल ।५३३।
भावार्थ : -- ऐसे दुष्ट राष्ट्र प्रमुख भाले हो गए हैं, जिन्हें समय रूपी हाथ ने ग्रहण कर लिए हैं । उनकी अनीति कारण बन गई और ये ऐसे भालों को पंचभूत ( अवनि, अम्बर, अनल, अनिल, अर्ण एवं इनके यौगिक ) के उदार में उतार कर, भूमि की व्युत्पत्तियों पर कम्पन का कारित कर रहे हैं ।
बहुरि काम न आवैगें , चर्म चेत करि सेत ।
सोइ जग सुधिआवैगें, किये कर्म जो हेत । ५३४ ।
भावार्थ : -- चमड़ी को उज्जवल करने का ज्ञान, कुछ काम नहीं आएगा । किये गए उज्जवल कर्म ही संसार के सुप्त चैतन्य ज्ञान को जागृत करेंगे ॥
माया के रस मुख पगे, निरस लगे जग भोग ।
सुख साधन सब साध तन, घारे चौसठ रोग । ५३५।
भावार्थ : - जब मुख माया (अर्थात अविद्या अर्थात विषय भोग के साधन प्रदान करने वाली विभूति) के रस में डूब जाता है, फिर उस मुख को संसार के समस्त भोग निरस लगने लगते हैं, सभी सुख साधनों को प्राप्त कर
फिर शरीर में चौसठ प्रकार के रोग हो जाते हैं ॥
धरनी दोहे तौ मिलै जल जलावन ज्वाल ।
जे तिन्ह अप ब्यय करै घिरै आपदा काल |536|
भावार्थ : -- धरती के दोहन के फलस्वरूप ही हमें जल, ईंधन, और बिजली मिलती है । जो इनको व्यर्थ में व्यय करेगा वह प्राकृतिक आपदाओं में घिर जाएगा ॥
अर्थात : -- 'जल है तो कल है'
'ज्वाल में ही काल है'
'ईंधन में भी धन है'
बोल बिलौनी राय की मुँह मैं थूक बिलोय ।
बाचन मखनी खाय कै भारत के जन रोय |537|
भावार्थ : - बोलों की मथनी से राजा राजा, मुख में ही थूक बिलोता है । वचनों का मक्खन खा खा के, भारत का नागरिक बहुंत रोता है ॥
को सिया को फुँके लंक कोउ राम के मंच ।
एक तै एक बंचक बंक सबके बुद्धि प्रपंच |538|
भावार्थ : -- कोई सीता के मंच से, कोई फूंकी हुई लंका के मंच से तो कोई रामलीला के मंच । एक से एक कुटिल भाषक हैं सब की बुद्धि कपट आचरण की है ॥
सिखे सिखाए ऊँटन कौ पंथ दरस दिखलाए ।
अब एसन रंगरुटन कौ जाने कौन सिखाए |539|
भावार्थ : -- अनुभवी ऊँटों को पथप्रदर्शन करता नौ सिखिया को कौन सिखाएगा ??
पोथी पत्रक बधपंगति अंतर रेखित रेख ।
आखर के कर संगति तहँ लिख लेखन लेख |540| भावार्थ : -- पुस्तक में पृष्ठ पंक्तिबद्ध हैं, जिसके अंतस रेखाएँ अनुरेखित हैं । अक्षर पाठ का स्मरण करो फिर शब्दविन्यासित करो और लेख लिखो ॥
काल पानि कुराउ भाल, कारन कुनय कराल ।
पंच भूत उदरन घाल, कारत भव भूचाल ।५३३।
भावार्थ : -- ऐसे दुष्ट राष्ट्र प्रमुख भाले हो गए हैं, जिन्हें समय रूपी हाथ ने ग्रहण कर लिए हैं । उनकी अनीति कारण बन गई और ये ऐसे भालों को पंचभूत ( अवनि, अम्बर, अनल, अनिल, अर्ण एवं इनके यौगिक ) के उदार में उतार कर, भूमि की व्युत्पत्तियों पर कम्पन का कारित कर रहे हैं ।
बहुरि काम न आवैगें , चर्म चेत करि सेत ।
सोइ जग सुधिआवैगें, किये कर्म जो हेत । ५३४ ।
भावार्थ : -- चमड़ी को उज्जवल करने का ज्ञान, कुछ काम नहीं आएगा । किये गए उज्जवल कर्म ही संसार के सुप्त चैतन्य ज्ञान को जागृत करेंगे ॥
माया के रस मुख पगे, निरस लगे जग भोग ।
सुख साधन सब साध तन, घारे चौसठ रोग । ५३५।
भावार्थ : - जब मुख माया (अर्थात अविद्या अर्थात विषय भोग के साधन प्रदान करने वाली विभूति) के रस में डूब जाता है, फिर उस मुख को संसार के समस्त भोग निरस लगने लगते हैं, सभी सुख साधनों को प्राप्त कर
फिर शरीर में चौसठ प्रकार के रोग हो जाते हैं ॥
धरनी दोहे तौ मिलै जल जलावन ज्वाल ।
जे तिन्ह अप ब्यय करै घिरै आपदा काल |536|
भावार्थ : -- धरती के दोहन के फलस्वरूप ही हमें जल, ईंधन, और बिजली मिलती है । जो इनको व्यर्थ में व्यय करेगा वह प्राकृतिक आपदाओं में घिर जाएगा ॥
अर्थात : -- 'जल है तो कल है'
'ज्वाल में ही काल है'
'ईंधन में भी धन है'
बोल बिलौनी राय की मुँह मैं थूक बिलोय ।
बाचन मखनी खाय कै भारत के जन रोय |537|
भावार्थ : - बोलों की मथनी से राजा राजा, मुख में ही थूक बिलोता है । वचनों का मक्खन खा खा के, भारत का नागरिक बहुंत रोता है ॥
को सिया को फुँके लंक कोउ राम के मंच ।
एक तै एक बंचक बंक सबके बुद्धि प्रपंच |538|
भावार्थ : -- कोई सीता के मंच से, कोई फूंकी हुई लंका के मंच से तो कोई रामलीला के मंच । एक से एक कुटिल भाषक हैं सब की बुद्धि कपट आचरण की है ॥
सिखे सिखाए ऊँटन कौ पंथ दरस दिखलाए ।
अब एसन रंगरुटन कौ जाने कौन सिखाए |539|
भावार्थ : -- अनुभवी ऊँटों को पथप्रदर्शन करता नौ सिखिया को कौन सिखाएगा ??
पोथी पत्रक बधपंगति अंतर रेखित रेख ।
आखर के कर संगति तहँ लिख लेखन लेख |540| भावार्थ : -- पुस्तक में पृष्ठ पंक्तिबद्ध हैं, जिसके अंतस रेखाएँ अनुरेखित हैं । अक्षर पाठ का स्मरण करो फिर शब्दविन्यासित करो और लेख लिखो ॥
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