मंगलवार, 20 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 52॥ -----

हरिआरी भइ रस मगन , घनघर घन तै घीर । 
नैना हेरत कहाँ गए , भँवर पंथ के हीर /५२१ / 
भावार्थ : -- हरियाली, गगन के घन से घिर कर रस मग्न हो उठी । अब हरियाली के नयन,  भ्रमण पथ के हीरे को ढूँडते हुवे कह रहे हैं कि कहाँ गए सूर्य //

तन माटी का पूतरा, भित मन मंदिर बास । 
जामे ज्ञान सूर उगे, तामें ब्रम्ह निबास । ५२२। 
भावार्थ : --यह शरीर तो मिट्टी की मूरत भर है इसके भीतर मन के स्वरूप में एक मंदिर बसा है । जिसके अंतस ज्ञान के सूर्य का उदय हो गया समझो उसमें ईश्वर का निवास हो गया ॥

माया ऐसी भूतनी, करत अंध बिस्वास  /
भँवरी जस मन भाँवरे,जाके रसरी फाँस ।५२३। 
भावार्थ : -- यह माया भूतनी से कम नहीं है जिसके ऊपर अंधा विश्वास करके, उसकी रस्सी से बंधकर यह मन भौंरी (लट्टू ) के सदृश्य घूमता रहता है ॥

ज्ञानवंत की मार भलि, फल बहु वाकी गार । 
अज्ञानी के मधुर मंत, कारत बोध बिकार।५२४। 
भावार्थ : -- ज्ञानी की तो मार भी अच्छी है, उसके निन्दित वाक्य भी कुछ न कुछ परिणाम देते हैं । किन्तु अज्ञानी के उत्तम मंत्रणाएं भी ज्ञान को विकृत कर देते हैं ॥

गौ महिषी के रस घीउ, निकसे बिय भित तेल । 
शब्द सूक्ति सार धरे , बरन बरन कर मेल । ५२५ । 
भावार्थ : -- जिस प्रकार गाँव भैंस के रस से घृत एवं बीजों से तरल तेल निकलता है उसी प्रकार वर्णों  के संधान स्वरूप शब्द सूक्ति से ज्ञान रूपी सार निकलता है ॥

एक कलस काल कीलाल दुजन मैं भरे पंक । 
दोनों के कर कल काल का राजा का रंक |526| 
भावार्थ : -- एक कलश में सुरा भरी है, तो दुसरे में पाप भरा है ।    संपन्न हो या सम्पन्नहीन  इसके हाथो भविष्य में दोनों की ही मृत्यु संभव है ॥ 

अर्थात : -- " कदाचरण कैसे भी क्यों न हो, अंत में मृत्यु का कारण बनता है" 

आखर जनी नियास कर मालन जोड़ बनाए । 
अखरी मुख अभ्यास कर तहँ ज्ञानी कहलाएँ |527| 

भावार्थ : --  लेखनी से लिख कर वर्णमाला बनाओ । और मुख से उच्चारण करके अभ्यास करो, फिर साक्षर कहलाओ ॥ 

अर्थात : - "पढ़ने से केवल शिक्षित होते हैं,किन्तु सार ग्रहण करने से ज्ञानी होते हैं "

पल के मलके कास कै कल के बलक गठाए  । 
बलके मलके साँस कै एक पल मैं बिथुराए |528| 

भावार्थ : -- पल पल की माला में कल के सपने ग्रंथित हैं । सांस की माला ऐसी है जो एक पल में ही टूट के बिखर जाती है और कल का सपना, सपना ही रह जाता है ॥ 

करनी कर सिख तरु मिले चाहे फले न फूल । 
अकरनी के कर खुले  पौध मिले न सूल |529| 

भावार्थ : -- कर्मशील को अनुभव का पौधा प्राप्त होता है बेशक उसमें सफलता या असफलता के पुष्प खिलें या न खिलें । किन्तु अकर्मण्य को कुछ भी प्राप्त नहीं होता, न अनुभव न सफलता और न असफलता ॥ 

घर मैं राउ राज करै बाहर धन संजोए । 
काम करै न काज करै तान तान के सोए |530| 
भावार्थ : -- हमारा शासककौतुक तो हमारे देश में करता है, और धन पराए देश में रखता है ।  कॊइ भी श्रम का कार्य करता नहीं, और ऊपर से बढे ही निश्चिन्त होकर सो रहा है ॥

  " कर्मतस स्वस्तिन : संभव : 
        अकर्मतस न" 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...