धरनी सूर को घेरे, भँवरत भाँवर पंथ ।
धरणी के गति दिन रैन, सूर सदा रह कंत।५११।
भावार्थ : -- सूर्य को घेरे यह धरती भ्रमण पथ में चक्कर लगाती है । इसकी संतुलित गति के कारण ही दिवस और रात्रि होते हैं,सूर्य सदैव दैदीप्यमान है इसका उदय एवं अस्त, काल का क्रम निर्धारित करने हेतु की गई एक कल्पना है ॥
निर्धन धन चातक सुधा बिरहन चाह मिलाप ।
भाँति भाँति की चाह से प्राणी जगत बियाप |512|
भावार्थ : -- निर्धन को धन की, चातक को अमृत की, विरह को मिलन की चाह है । संसार विभिन्न प्रकार की लालसाओं से भरा है ॥
एक देस जलधि पर कोट, कोट पर कोठ काल ।
करे चौकसी पट ओट जहँ कोटि कोट पाल |513|
भावार्थ : -- एक देश में एक सागर है, सागर में एक किला है, किले में काल कोठरी है । जहां द्वार को रोके, बहुत सारे पहरी, पहरा दे रहे हैं ? ॥
उत्तर = आँख, भारत का कालापानी
कोन कोन मैं कलस बने भगवन एक ना पाए ।
जब मन देखा आपनै प्रियतम रूप मुसुकाए |514|
भावार्थ : -- कोने कोने में मंदिर निर्मित है किन्तु भगवान् एक में भी नहीं मिले । जब अपना ह्रदय देखा तो प्रियतम स्वरूप में भगवान मुस्कराते हुवे मिले ॥
मुख भित धुनि के बादरे अरनव बरन समाए ।
झड़ी बरसे बाढ़ करे हरि हरि अन उपजाए |515|
भावार्थ : -- मुख के भीतर शब्दों के बादल हैं जो अक्षरों के अथाह जल से परिपूर्ण हैं । यदि वह तेज बरसते हैं तो बाढ़ करके, वाद-विवाद की स्थिति उत्पन्न करते हैंऔर धीरे धीरे बरसते हैं तो अन्न का उत्पादन करके, मधुर वाणी का उद्वहन करते हैं ॥
हरि हरि झरी बदरि धरे बूँद बूँद संचाएँ ।
तापन हरित धान करे सीच हरियारि पाएँ |516|
भावार्थ : -- जब बादलों से अविराम जलधारा बहती हो तो उसके बूंद बूंद को संचित करें । उष्णता के कारण उपज के पिला हो जाने पर उसी संचित निधि से सिंचाई पुन: हरियाली प्राप्त करें॥
देहि तापन धूप परै बरे जारै जरधि समान ।
चाम स्याम बरन करै बारि बिन्दु उद्वान |517|
भावार्थ :-- ग्रीष्म ऋतु के सूर्य की आंच जब देह पर पड़ती है तो वह समुद्र के समान जलने लगती है और त्वचा को घन के समान सांवली करके स्वेदकण के रूप में जल का उद्वहन करती है.....
दान खाए पापी कहें दान दै पूनवान ।
जे कन खाए बाहु गहे ते घुन साँप समान |518|
भावार्थ : -- दान किये हुवे को खानेवाले पापी कहलाते हैं, जो दान देते हैं पुण्यपुरुष कहलाते हैं । जो दान किये हुवे अन्न को खाकर भी सेवक, मित्र, जन प्रतिनिधि, निकट सम्बन्धी स्वरूप पास में रहते है वे घुन और सांप के समान होते हैं ॥
कन के धन उपजाए तै जन जन कहे किसान ।
जे कन के कर दाय तै कहलाहीं भगवान |519|
भावार्थ : -- अन्न का उत्पादन करे वाले को लोग किसान कहते हैं । यदि किसान अपने उत्पाद के लाभ का करदान भी करेगा तो वह भगवान कहलाएगा ॥
" विश्व में सबसे श्रेष्ठ उत्पाद, कृषि उत्पादन है"
बूँदन के का तोल है बूँदन के का मान ।
बूँदन के का मोल है जाने तिसन किसान |520|
भावार्थ : -- जल के सदृश्य कौन है? कौन जल के समान है ..... कोई नहीं । जल का मूल्य क्या है? यह प्यासा जानता है या किसान॥
" जल से ही जीवन है"
धरणी के गति दिन रैन, सूर सदा रह कंत।५११।
भावार्थ : -- सूर्य को घेरे यह धरती भ्रमण पथ में चक्कर लगाती है । इसकी संतुलित गति के कारण ही दिवस और रात्रि होते हैं,सूर्य सदैव दैदीप्यमान है इसका उदय एवं अस्त, काल का क्रम निर्धारित करने हेतु की गई एक कल्पना है ॥
निर्धन धन चातक सुधा बिरहन चाह मिलाप ।
भाँति भाँति की चाह से प्राणी जगत बियाप |512|
भावार्थ : -- निर्धन को धन की, चातक को अमृत की, विरह को मिलन की चाह है । संसार विभिन्न प्रकार की लालसाओं से भरा है ॥
एक देस जलधि पर कोट, कोट पर कोठ काल ।
करे चौकसी पट ओट जहँ कोटि कोट पाल |513|
भावार्थ : -- एक देश में एक सागर है, सागर में एक किला है, किले में काल कोठरी है । जहां द्वार को रोके, बहुत सारे पहरी, पहरा दे रहे हैं ? ॥
उत्तर = आँख, भारत का कालापानी
कोन कोन मैं कलस बने भगवन एक ना पाए ।
जब मन देखा आपनै प्रियतम रूप मुसुकाए |514|
भावार्थ : -- कोने कोने में मंदिर निर्मित है किन्तु भगवान् एक में भी नहीं मिले । जब अपना ह्रदय देखा तो प्रियतम स्वरूप में भगवान मुस्कराते हुवे मिले ॥
मुख भित धुनि के बादरे अरनव बरन समाए ।
झड़ी बरसे बाढ़ करे हरि हरि अन उपजाए |515|
भावार्थ : -- मुख के भीतर शब्दों के बादल हैं जो अक्षरों के अथाह जल से परिपूर्ण हैं । यदि वह तेज बरसते हैं तो बाढ़ करके, वाद-विवाद की स्थिति उत्पन्न करते हैंऔर धीरे धीरे बरसते हैं तो अन्न का उत्पादन करके, मधुर वाणी का उद्वहन करते हैं ॥
हरि हरि झरी बदरि धरे बूँद बूँद संचाएँ ।
तापन हरित धान करे सीच हरियारि पाएँ |516|
भावार्थ : -- जब बादलों से अविराम जलधारा बहती हो तो उसके बूंद बूंद को संचित करें । उष्णता के कारण उपज के पिला हो जाने पर उसी संचित निधि से सिंचाई पुन: हरियाली प्राप्त करें॥
देहि तापन धूप परै बरे जारै जरधि समान ।
चाम स्याम बरन करै बारि बिन्दु उद्वान |517|
भावार्थ :-- ग्रीष्म ऋतु के सूर्य की आंच जब देह पर पड़ती है तो वह समुद्र के समान जलने लगती है और त्वचा को घन के समान सांवली करके स्वेदकण के रूप में जल का उद्वहन करती है.....
दान खाए पापी कहें दान दै पूनवान ।
जे कन खाए बाहु गहे ते घुन साँप समान |518|
भावार्थ : -- दान किये हुवे को खानेवाले पापी कहलाते हैं, जो दान देते हैं पुण्यपुरुष कहलाते हैं । जो दान किये हुवे अन्न को खाकर भी सेवक, मित्र, जन प्रतिनिधि, निकट सम्बन्धी स्वरूप पास में रहते है वे घुन और सांप के समान होते हैं ॥
कन के धन उपजाए तै जन जन कहे किसान ।
जे कन के कर दाय तै कहलाहीं भगवान |519|
भावार्थ : -- अन्न का उत्पादन करे वाले को लोग किसान कहते हैं । यदि किसान अपने उत्पाद के लाभ का करदान भी करेगा तो वह भगवान कहलाएगा ॥
" विश्व में सबसे श्रेष्ठ उत्पाद, कृषि उत्पादन है"
बूँदन के का तोल है बूँदन के का मान ।
बूँदन के का मोल है जाने तिसन किसान |520|
भावार्थ : -- जल के सदृश्य कौन है? कौन जल के समान है ..... कोई नहीं । जल का मूल्य क्या है? यह प्यासा जानता है या किसान॥
" जल से ही जीवन है"
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