रविवार, 18 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 50 ॥ -----

नियती निर्मित संपदा , राखै सकल प्रभूत । 
अन्यतर कर धन धन्या, राखै काल त्रियूत । ५०१। 
भावार्थ : -- प्रकृति द्वारा निर्मित धन समस्त व्युत्पत्तियों के आदि मध्य एवं अंत का संरक्षण करता है । जबकि अन्य स्त्रोतों से निर्मित धन केवल पृथ्वी पर के त्रिकाल समूह अर्थात  भूत,वर्त्तमान, भविष्य का ही संरक्षण करता है ॥

आखर धरनी धार कै, चढ़े शब्द सोपान /
भँवरा भँवरत भँवर पथ, बैठे ज्ञान बिमान /५०२/
भावार्थ : -- वर्णों को आधार कर शब्दों की सीडिया चढ़ कर ज्ञान के विमान पर बैठ कर यह भँवरा मन ग्रह मंडल का भ्रमण कर रहा है ॥


भव सागर बहु अवतरे, घाल गर्भ गृह नाल ।  
को सुकुति धर मुकुती भए, को भयवह घड़ियाल ।५०३।    
भावार्थ : -- गर्भ गृह से नाभिनलिन को ग्रहण कर इस संसार रूपी सागर में बहुंत से महानुभाव अवतरित हुवे उनमें से कुछ सीप  के मोती बनकर परम गति को प्राप्त हुवे, और कुछ भयानक घड़ियाल बन गए ॥

जबलग जग मैं गात है, तबलग तेरी जात । 
गात गए जग जात गई, रहि जँइ केवल बात  । ५०४ । 
भावार्थ : -- इस संसार में जबतक यह नश्वर शारीर जीवित है तब तक इसकी जाति  है अर्थात यह मानव जातिगत पहचान है, मर्द जात है कि औरत जात और भी भाँति-भाँति के जात जैसे ही यह शरीर अंतर्ध्यान हो जाता है दुष्टों का सिरा जाता है तब इससे सम्बंधित जैसे वंश, गोत्र, वर्ण, वर्ग, देश आदि समस्त व्युत्पत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं, केवल इसके द्वारा किये गए कर्म और इसकी बातें रह जाती है॥

कीच मैं पग धारै ते खींच नीच लै जाए । 
कीच पाथर मारै ते आपन मुख छिटकाए |505|

भावार्थ : -- कीचड़ में पाँव रखने से वह खिंच कर नीचे ले जाता है ॥ कीचड़ में पत्थर मारने से वह अपने ही मुँह में छिटक आता है ॥ 

धर्म चरन बेली चढ़े सत ते ढाँके चोल । 
सद चरन धन धान बढ़े दुर ते घाटे तोल |506| 

भावार्थ : -- धर्म के आचरण से ही वंश (मानव या पशु जाति) की वृद्धि होती है , सत्य से ही कुकृत्य छुपते हैं॥
सदाचरण से धन संपत्ति में वृद्धि होती है, दुराचरण से घाटा ही घाटा है ॥ 

अनर्गल ते मौन भला, बोले तो अस बोल । 
धर्म सत्य के सुर मिला मदरस आखर घोल |507|

भावार्थ : -- व्यर्थ प्रलाप से, मौन रहना ही उचित है, बोलना ही है तो ऐसे बोलें  कि जिसमें धर्म और सत्य के स्वर मिश्रित हों और व्यंजन मधुरस में घुले हों ॥   

अर्थात :-- " वाणी के सम्मोहन से किसी को भी मोहित किया जा सकता है" 

नौ मास जी उदर धरे, पीर करत जनि माए  । 
तबहिं जनिमन चरन परे जग जननी पद दाए |508| 

भावार्थ : -- नौ मास तक जीव को उदर में धारण कर, फिर माता  पीड़ा उठा कर उसे जन्म देती है  । इस लिए जन्म लेने वाले उसके चरण स्पर्श करते है और उसे जगज्जननी का पद दिया ॥ 

छिमा के जोग असमरथ दया के जोग दीन । 
रखनै जोग सरनागत दान के जोग हीन |509| 

भावार्थ : -- असमर्थ क्षमा के योग्य हैं, दुर्दशाग्रस्त दया के योग्य हैं, शरणागत रक्षा के योग्य है, दान के योग्य विपन्न हैं ॥ 

आँट साँठ गाँठ गाँठे  करत आठ के साठ । 
कोटि कोटि आँट गाँठे रहे जे साठ आठ |510|

साठ आठ = दरिद्र,रसहीन
भावार्थ = षड़यंत्र पूर्वक गाँठ बांधे, आठ को साठ बनाते जिनकी दरिद्र अवस्था थी वे भी करोड़ों-करोड़ों के स्वामी हो गए ॥ 

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