शनिवार, 17 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 49॥ -----

एक अंगुल के मुख धरे, एक खोरिहि के खोर /
चार चउर की चम्मची , बोरे बढ़ बढ़ बोर /४९१ /
भावार्थ : -- एक उंगली के नाप का तो मुँह है, एक कटोरी जितना खुलता है, केवल चावल के चार दाने रखने योग्य जीभ है, और बोल देखो ये बढे बढे बोलते हैं ॥

कहत समुझाए सीख दे, चले गये सब कोए । 
चाम पियारी होत ना, काम पियारा होए । ४९२।  
भावार्थ : -- अपने अनुभवनुसार कहते समझाते ज्ञान देते, सभी कोई चले गए । कि इस संसार में कर्म ही पूज्यनीय है, चर्म नहीं ॥

जाकी बानी पवित भइ, ते भव भूषन मान । 
जो ए भूषन कलित धरै, सोइ धरा धनवान /४९३ /
भावार्थ : -- जिसकी वाणी में पवित्रता हो वह संसार के आभूषण स्वरूप होते हैं / जो धरनी ऐसे आभूषणों से अलंकृत है वही धरनी धनवान है ॥

जल अन्न अरु सुभासितम, जे जग रतनन मान । 
जेइ धरा ए रतन धरे, तेइ धरा धनवान /४९४ /
भावार्थ : -- जल, अन्न और कवित्वमय , सुन्दर ओजपूर्ण ज्ञान सूक्तियां, ये तीन पृथ्वी के वास्तविक रत्न हैं , जिस धरा ने ऐसे रत्न धारण किये हैं, वही धरा संसार में सबसे धनवान है ॥

भवित के मूर भितोपर जथारथ थम टिकाए । 
जथारथ के कल्पन पर भावी भवन बढ़ाए |495| 

भावार्थ : -- अतीत की नीव पर वर्त्तमान का स्तम्भ स्थापित है । वर्त्तमान की कल्पना स्तम्भ पर, भविष्य के भवन का निर्माण होता है ॥  

पुनि पुनि पाहुन पाए ते आदर मान न होए । 
अधिक निकट बढ़ आए ते बिघन के बीज बोए|496|

भावार्थ : -- बार बार आतिथ्य सत्कार प्राप्त करने से, आदर नहीं होता । निकटता जब अधिक बढ़ जाती है, तो द्वेष उत्पन्न करती है ॥ 

सतत साधना सिधि साधे, जुगता जुग अभ्यास । 
एकाग्र चित लखित राधे, सफलता नित प्रयास |497|

भावार्थ : -- निरंतर साधना से सिद्धि या आविष्कारों साध्य होते हैं, योग्यता की प्राप्ति सतत अभ्यास से होती है, एकाग्रता से लक्ष्य की प्राप्ति होती है, और निरंतर प्रयासों से सफलता मिलती है ।। 

भोजन खाए क्षुधा मिटै, पयस प्यास बुझाए । 
भोग भुक के रसन रहै, सदा क्षुधित तिसनाए |498|

भावार्थ : -- भोजन करने से भूख मीट जाती है , जल पीने से प्यास बुझ जाती है । भोगवादी व्यक्तियों की जिह्वा सदैव भूखी एवं प्यासी रहती है ॥

प्रात: सम बालकताई  दुपहर जुवा समान । 
साँझ सम बय बिरधाई सोवत मरनी मान |499| 

भावार्थ : -- प्रात: का समय बचपन के समान है, दोपहर युवा अवस्था के समान है । सांझ वृद्धावस्था के समतुल्य है, सुप्तावस्था मृत्य के समरूप है ॥

अरसोपर अरस पर हो राजे अनर्हताए ।
बिना दिये उत्कोच के काज न को हो पाए |500|

भावार्थ : -- सिंहासन पर जब शक्ति-सामर्थ्य पर इतराते हुवे अयोग्य व्यक्ति काअधिकार होता है तो बिना घूस दिए कोई कार्य सिद्ध नहीं होता ॥  

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