शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 48 ॥ -----

पावत पीरा अति गहन, जनी जने जन जात । 
जे तौ जल के बुलबुले, कौनो हाथ न साथ /४८१ /
भावार्थ : -- अतिशय पीड़ा को वरण कर जननी ने इस मानव जाति को उत्पन्न तो कर दिया ।  किन्तु ये मानव की जाति, क्षणभंगुरी जल के बुलबुलों के सदृश्य होती है जो अब किसी योग्य नहीं है, ॥

माया ही मैं राँच कै, काया की ले आँच । 
कंचन मानिक परिहरै, धर ली बटियाँ काँच । ४८२। 

" वह धन जो जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के पश्चात भोग विषय हेतु अर्जित किया जाता हो 'माया' कहलाता है । "

भावार्थ : -- माया में अनुरक्त होकर काया ही का सुख लिया । औउर इस संसार मानव हो के भी ज्ञान के स्वर्ण मणियों को त्याग कर अज्ञानता के कंचे धारण कर लिए ॥

अर्थात :-- "मनुष्य का जीवन इस हेतु है कि वह उत्तम कार्य करते हुवे स्वयं पशु न बन कर, पशुओं को मनुष्य बनाए एवं ज्ञान वरण कर उत्तम गति को प्राप्त करे"

बाहिर मरे  जग दरसे, अंतर दरसे कोए । 
कार पलीता बापुरे, जिउता जगता होए । ४८३ । 
भावार्थ : --बाहरी शरीर को मरता हुवा तो सभी देखते हैं किन्तु किसी की आत्मा मरती हुई कोई देखे । आत्मा की मृत्यु के पश्चात बापरे ! जीता जागता मनुष्य भी ,  भूत आकृति का हो जाता है ॥

पलीता जहाँ देख ले, ठा ले आसन थान । 
वासे तो भयभीत हो, दूर बसे भगवान ।४८४। 
भावार्थ : -- दुष्ट भूतों को जहाँ भी देखों वहां से अपना आसन स्थान हटा लेना चाहिए । क्योंकि उनसे तो भगवान भी भयभीत होकर दूर जा बसते हैं ॥

सुमिरत सीस पाठ पढ़े लिख लिख पात गठाए । 
ज्युँ गह सार बेलि चढ़े त्युँही ज्ञान बढ़ाए |485| 

भावार्थ : -- छात्र को स्मरण करते हुवे पाठ पढ़ना चाहिए, और पृष्ठ में लिख लिख कर अभ्यास करना चाहिए,
जैसे लता सार ग्रहण कर विकसित होती है, वैसे ही छात्र को भी तत्व ज्ञान ग्रहण कर अपने  सत्व का विकास करना चाहिए ॥ 

तरुबर गुरु को चाहिए सीस बेलि लपटाए । 
ज्ञान के सार सार दै  बढ़तै बहु बिकसाए |486|

भावार्थ : -- वृक्ष स्वरूप शिक्षक को चाहिए कि, वह छात्र को लता के समान  वलयित कर  उसे ज्ञान तत्व से पोषित करे, एवं बुद्धि वर्द्धन करते हुवे उसके सत्व का विकास करे ॥   

गुरु माली शाला कुँजे  पोथी पौध सरूप । 
पाठ पुहुप ऊपर गुँजे सार रस सिस मधूप |487| 

भावार्थ : -- पाठ शाला एक उद्यान है, शिक्षक उद्यान के रक्षक हैं,पुस्तकें पौधे के समतुल्य हैं,  पुष्प  स्वरूप पाठ पर छात्र मधुप रूप में, मुखरित होकर सार ग्रहण करते हैं ॥  

सरस खेतन खेतिहार सींचे निरस उसार । 
तसहि गुन के खेत सार अवगुन देउ उपार |488| 

भावार्थ : --खरपतवार को उखाड़ के, किसान केवल फसल को सींचता है । उसी प्रकार, अवगुणों के खरपतवार को उखाड़ कर हमें केवल गुणों को ही बढ़ाना चाहिए ॥ 

साहु सनेहू दिवस कर चौरन रयनी रास ॥ 
साहु काल अँधेर नगर चौरान समझ उजास | 489|

भावार्थ : -- साहूकार को दिवस भाता है, चोर को रात अच्छी लगती है । नीति-नियम रहित शासन से साहूकार का अंत हो जाता है, स्वस्थ नीति एवं निर्मल विचार से, चोरों का अंत होता है ।।  

बिन रूदन ना माई भी बालक पयस पियाए । 
श्रम रहित भोजन भी ना तन पोषित कर पाए |490| 

भावार्थ : -- बिना रोए तो माता भी, बालक को दूध नहीं पिलाती । श्रम रहित भोजन भी, शरीर को पोषित नहीं करता ॥ 

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