बुधवार, 14 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 46॥ -----

दिवस दरसे काक जेइ, उलूक दरसे जाम । 
जे जामिन घर जोगते, धरे कुदरसन नाम ।४६१। 
भावार्थ :-- जो दिन में कौंवे के जैसे दिखाते हैं वो रात में उल्लू जैसे हैं अर्थात दोमुँहे होते हैं, बगुला ठीक है उसका एक ही मुंह होता कारण की वो रात में नहीं दीखता जो बोलना है दिन में वो भी एक ही बार बोल देता है जो सुधिजन अपना घर को हर घडी माने की रात और दिन जोगते रहते हैं वो इन कौओं को कुरूप अर्थात विचारहीन कहते हैं ॥

सकल पहर सब दिन जगत, लागी पंगत पान । 
कोए पाप मोलाए गए, कोए देइ तिन दान ।४६२। 
भावार्थ : -- समस्त पहर सभी दिवस इस जगत रूपी हाट में हटवार की पंक्तियाँ सजी  रहती हैं । कोई तो यहाँ से पाप मोल लेकर गया कोई पुण्य.....परम गति उसे मिली जो अपने पुण्य दे गया और पाप ले गया ॥ 

टूटे मैं जो न टूटे, जोड़े में जुग जाए । 
नयज्ञ नाबिक जूँ टूटी, नैया पार लगाए । ४६३। 
भावार्थ : -- टूटने पर जो हार न माने वह योग प्राप्त होने पर पुन : संयोगित जाता है । वह उस कुशल नाविक की भांति होता है जो कुशल मार्ग दर्शन से टूटी नैया को भी पार लगा दे॥  

 पत खेह बीज आखरी, चुग बिन बो भलि कान / 
जो जग मैं बोएगा सो , पावैगी संतान /४६४ /
भावार्थ : -- पत्रों के खेत में अक्षरों के बीजों को भली प्रकार से चुग बिन कर बोना चाहिए । क्योंकि जगत में जो बोया जाएगा आने वाली पीढ़ी वही प्राप्त करेगी ॥

कोउ भुवन भूखन मरे को जग ऊँचि अटार । 
बाट बाट ढूंडत फिरे कहँ वहँ की सरकार |465| 
भावार्थ : -- कोई धरती पर भूखा मर रहा है, कोई संसार की सबसे ऊंचे भवन में भूखा मर रहा है, सभी स्थानों पर ढूंड लिया, किन्तु  ऐसे देश में 'सरकार' कहीं नहीं मिली ॥ 

अर्थात : -- " जहाँ धनिक और निर्धन के मध्य गहरी खाई हो 
                  वहां शासन का कोई अस्तित्व नहीं होता"  

भयउ ईस अध्यात्मन अनभै भए बिग्यान । 
ईस अनंत भै दरसन जिग्यासित मति जान |466|  

भावार्थ : -- ईश्वर का अस्तित्व है ! यह अध्यात्म है, ईश्वर अनस्तित्व है ! यह विज्ञान है, ईश्वर अनंत है ! यह दर्शन है, ऐसा जिज्ञासु की मति कहती है ॥  

गगन चुम्बत गढ़ बाढ़े, धरनिहि के आधान ।
जे नीचे गहत गाढ़े , पल मैं होए बिहान |467|

निर्धन धन की चाह लिए, धन धन कर धनवान ।
भोग बिषय की आह लिए, निकस जाएंगे प्रान |468|

होहहिं जन्मन के मरन, को रंक हो कि राउ ।
हो थोथे कनक घुन कन, चाके सकल पिसाउ |469|

फूर फ़ूरत सोहे बन, गंधन देत सिराए ।
भव भूषन मनुज जे भल, करम करत मरि जाएँ |470|

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...