मालन चाहे मालिके मालक भुरहर फूल ।
फूल चाह अलि आ लखे अलि सार ब्याकूल ।441- क।
पालक चाहे बालके बालक केलिक केर ।
हाथी घोरे पालिके बेली हेली हेर | 441-ख।
अधिक मधुरअन खाए ते रसना चाहे खार ।
तीत रस मुख धराए ते जारक जल की धार । 442-क।
निर्धन धन चातक सुधा बिरहन चाह मिलाप ।
भाँति भाँति की चाह से प्राणी जगत बियाप । 442-ख।
भावार्थ : -- वनरक्षिता को माला की चाह है, माला को सुकोमल फूलो की चाह है । फूल को मधुकर की चाहत की चाह है, मधुकर मधुरस की चाह से व्याकुल है । 1 ।
माता-पिता, बालक को चाहते है, बालक अपने साथियों को पुकार कर उनके साथ, हाथी घोड़ा पालकी खेलने की चाह है । 2 ।
अधिक मिष्ठान खाने से जीभ को कुछ चटपटे की चाह होती है । और मीर्च खा से मुख की ज्वाला को जल की चाह होती है । 3 ।
निर्धन को धन की, चातक को अमृत की, विरहन को मिलन की चाह है । यह संसार,विभिन्न प्रकार की लालसाओं से युक्त जीवो से व्याप्त है । 4 ।
उदयै सूर भए दिन जब, पलक नयन उदयाए ।
सूर उयत पलक उदाएँ, चाहे देर सबेर /
राखे जे नैन मिचाए, तौ जग लागै हेर /४३३-ख /
भावार्थ : -- सूर्योदय हुवा , किन्तु दिवस तभी होता है जब नयनों से पलकें उदित हों । उसी प्रकार कोई उल्लेखन , ज्ञान तभी कहलाता हैं, जब वह आत्मसात किया जाए ॥
सूर्योदय होते ही देर सबेर जागृत होना ही पड़ता है अन्यथा लोग जांच-पड़ताल करने लगते हैं कि यह जीवित है, या मर मरा गया ॥
दिनकर बरत दिवस करे, दीपक बरत अँधेर /
तेरी सेवा में लगे , पल पल आठों बेर /४४४ -क /
आदर सेवक सों करें, राखे सरल सुभाए /
सेवापन बर कर धरे, चलत भलाई पाएँ /४४४-ख /
भावार्थ : -- सूर्य जल कर दिवस कर रहा है, और रात होती है तो दीपक जलता है । इस प्रकार हे मनुष्य ! ये समय तेरी ही सेवा में लगा हुवा है ॥
अत अपना स्वभाव सरल रखते हुवे सेवक का आदर करें, इस प्रकार श्रेष्ठ परिचर्या भी प्राप्त करें और सेवक की भलाई भी लें ,॥
मैं मैं कर घर्घरारै मूँ मैं धरे निसान ।
दै दै कह मुठ पसारै घर घर माँगे दान । 445-क ।
कैसे बोल निभाए कै को बिध मांगे भीख ।
अगहुन सीस झुकाए कै भीखू से लै सीख । 445-ख।
भावार्थ : -- मैं मैं करते मुख में नगाड़ा रख कर घोर शब्द निकाल रहा है ।दे दे कहते हुवे हथेली फैला कर अरे! मूर्ख, घर घर दान मांग रहा है । 1 ।
कैसे बोल बोलने चाहिए, किस प्रकार भीख मांगना चाहिए । भिखारी के आगे श्रद्धा पूर्वक सिर झुका अर्थात उसे गुरु मान कर, पहले भीख माँगने की विशेषज्ञता प्राप्त कर, इसके पश्चात भीख मांग । 2 ।
एक कोट एक पाल फिरै धरे बान मुख धार ।
बत्तीस पहरि तै घिरे दौ पटी के दुआर ? । 446-क।
उत्तर = मुख
एक कोट एक पाल फिरै लपटे झूठे लार ।
बत्तीस पहरि ते घिरे फिर भी मारे मार ? ।446-ख।
उत्तर = नेता-मंत्री, शतरंज
भावार्थ : -- एक किले में एक राजा तेज नोक वाले बाण लेकर भ्रमण कर रहा हैं ।वह बत्तीस रक्षकों से घिरा है और किले के दो पाट के द्वार है । 1 ।
एक किले में एक राजा झूठ बोल बोल के घूम रहा है । वह बत्तीस रक्षको से घिरा है, फिर भी मर जाता है ॥
दीपक दीपक करी कै सकल भजैं अँधेर ।
ज्यौंहि दिनकर दिन करै परै लैजाएँ गेर |447-क|
भवन भवन बिजुरि आई जरी बढ़े आराम ।
धूम धरी न कलुषाई करी दीप के काम ।447-ख।
भावार्थ : -- अधेरे में ही सब दीपक, दीपक भजतें हैं । जैसे ही सूर्य उदय हो जाता है उसे उठा कर फेंक देते हैं | 1 |
घर-घर बिजली आई बड़े आराम से जली । इसमे धुवां है और न ही कालिख है यह दीपक का भी काम करती है । 2 ।
अर्थात : -- आवश्यकता के आधार पर ही वस्तु की उपयोगिता रहती है । आवश्यकता सिद्ध होने या अन्य कोई विकल्प उपलब्ध होने पर वांछित वस्तु अनुपयोगी हो जाती है ॥
मानस देह बयस बले जों कापर की थान ।
काटि काटि निज भोग किए न कहुँ कर दान |448-क|
जे मनु बयस दान करे घड़े पून संचाए ।
आपन देहि पीर परै दान एहि काम आए |448-ख |
भावार्थ : -- मनुष्य ने आयु , ऐसे लपेटे है जैसे कोई कपडे का गट्ठर हो । काट काट के स्वयं ही उपभोग किया, किसी को दान नहीं दिया
जो मनुष्य आयु का, अर्थात जीवन का, अर्थात रक्त का दान करता है वह बहुत ही पुण्य का संचय करता है । जब स्वयं को कष्ट होता है, तो वही दान उसके काम आता है ॥
" रक्त दान -जीवन दान "
रे पंथी गठ बंधन की गठरी कस कै गाँठ ।
परिहर निद्रा नयनन की चौरी दैखे बाट । 449-क।
ले रसरी चंदिनी की बट दै दै के कास ।
मूरध मूर चौरन की आँटि साँटि के फाँस ।449-ख।
भावार्थ : -- हे पथिक ! तू अपने संचित धन में बंधी गाँठ को और अधिक कस कर अवगुंठित कर
आखों की नींद को त्याग दे, देख चोरी तेरी बाट जोह रही है । 1 ।
चांदी की रस्सी ले उसे बल दे दे कर कड़क कर ।और चोर के गले को षडयंत्र पूर्वक फाँस ले | 2 ।
काल कलुषित धन भर घट माया पास गढाए ।
मरनि पर कुटुंब मरहट काया दै बिठाय । 450 -क।
मानस प्रीत कुटुंब कै कहु कर काम न आए ।
काया के मोह परिहर माया पास हटाएँ ।450-ख।
भावार्थ : -- काले और पापयुक्त धन का मटका भरकर उस पर, संसार आसक्ति की बंधन गाँठ तो लगा दी ।
किन्तु मृत्योपरांत कुटुम्बी तेरी काया को मरघट में बैठा देंगे । 1 ।
हे मनुष्य ! कुटुंब का प्रेम, कुछ भी काम नहीं आता । काया का मोह त्याग दे, और संसार आसक्ति के बंधन को हटा कर मटके का मुख खोल दे । 2 ।
फूल चाह अलि आ लखे अलि सार ब्याकूल ।441- क।
पालक चाहे बालके बालक केलिक केर ।
हाथी घोरे पालिके बेली हेली हेर | 441-ख।
अधिक मधुरअन खाए ते रसना चाहे खार ।
तीत रस मुख धराए ते जारक जल की धार । 442-क।
निर्धन धन चातक सुधा बिरहन चाह मिलाप ।
भाँति भाँति की चाह से प्राणी जगत बियाप । 442-ख।
भावार्थ : -- वनरक्षिता को माला की चाह है, माला को सुकोमल फूलो की चाह है । फूल को मधुकर की चाहत की चाह है, मधुकर मधुरस की चाह से व्याकुल है । 1 ।
माता-पिता, बालक को चाहते है, बालक अपने साथियों को पुकार कर उनके साथ, हाथी घोड़ा पालकी खेलने की चाह है । 2 ।
अधिक मिष्ठान खाने से जीभ को कुछ चटपटे की चाह होती है । और मीर्च खा से मुख की ज्वाला को जल की चाह होती है । 3 ।
निर्धन को धन की, चातक को अमृत की, विरहन को मिलन की चाह है । यह संसार,विभिन्न प्रकार की लालसाओं से युक्त जीवो से व्याप्त है । 4 ।
उदयै सूर भए दिन जब, पलक नयन उदयाए ।
उलखित ज्ञान कहत तबय , चित के भीत समाए /४४३ -क /
सूर उयत पलक उदाएँ, चाहे देर सबेर /
राखे जे नैन मिचाए, तौ जग लागै हेर /४३३-ख /
भावार्थ : -- सूर्योदय हुवा , किन्तु दिवस तभी होता है जब नयनों से पलकें उदित हों । उसी प्रकार कोई उल्लेखन , ज्ञान तभी कहलाता हैं, जब वह आत्मसात किया जाए ॥
दिनकर बरत दिवस करे, दीपक बरत अँधेर /
तेरी सेवा में लगे , पल पल आठों बेर /४४४ -क /
आदर सेवक सों करें, राखे सरल सुभाए /
सेवापन बर कर धरे, चलत भलाई पाएँ /४४४-ख /
भावार्थ : -- सूर्य जल कर दिवस कर रहा है, और रात होती है तो दीपक जलता है । इस प्रकार हे मनुष्य ! ये समय तेरी ही सेवा में लगा हुवा है ॥
अत अपना स्वभाव सरल रखते हुवे सेवक का आदर करें, इस प्रकार श्रेष्ठ परिचर्या भी प्राप्त करें और सेवक की भलाई भी लें ,॥
मैं मैं कर घर्घरारै मूँ मैं धरे निसान ।
दै दै कह मुठ पसारै घर घर माँगे दान । 445-क ।
कैसे बोल निभाए कै को बिध मांगे भीख ।
अगहुन सीस झुकाए कै भीखू से लै सीख । 445-ख।
भावार्थ : -- मैं मैं करते मुख में नगाड़ा रख कर घोर शब्द निकाल रहा है ।दे दे कहते हुवे हथेली फैला कर अरे! मूर्ख, घर घर दान मांग रहा है । 1 ।
कैसे बोल बोलने चाहिए, किस प्रकार भीख मांगना चाहिए । भिखारी के आगे श्रद्धा पूर्वक सिर झुका अर्थात उसे गुरु मान कर, पहले भीख माँगने की विशेषज्ञता प्राप्त कर, इसके पश्चात भीख मांग । 2 ।
एक कोट एक पाल फिरै धरे बान मुख धार ।
बत्तीस पहरि तै घिरे दौ पटी के दुआर ? । 446-क।
उत्तर = मुख
एक कोट एक पाल फिरै लपटे झूठे लार ।
बत्तीस पहरि ते घिरे फिर भी मारे मार ? ।446-ख।
उत्तर = नेता-मंत्री, शतरंज
भावार्थ : -- एक किले में एक राजा तेज नोक वाले बाण लेकर भ्रमण कर रहा हैं ।वह बत्तीस रक्षकों से घिरा है और किले के दो पाट के द्वार है । 1 ।
एक किले में एक राजा झूठ बोल बोल के घूम रहा है । वह बत्तीस रक्षको से घिरा है, फिर भी मर जाता है ॥
दीपक दीपक करी कै सकल भजैं अँधेर ।
ज्यौंहि दिनकर दिन करै परै लैजाएँ गेर |447-क|
भवन भवन बिजुरि आई जरी बढ़े आराम ।
धूम धरी न कलुषाई करी दीप के काम ।447-ख।
भावार्थ : -- अधेरे में ही सब दीपक, दीपक भजतें हैं । जैसे ही सूर्य उदय हो जाता है उसे उठा कर फेंक देते हैं | 1 |
घर-घर बिजली आई बड़े आराम से जली । इसमे धुवां है और न ही कालिख है यह दीपक का भी काम करती है । 2 ।
अर्थात : -- आवश्यकता के आधार पर ही वस्तु की उपयोगिता रहती है । आवश्यकता सिद्ध होने या अन्य कोई विकल्प उपलब्ध होने पर वांछित वस्तु अनुपयोगी हो जाती है ॥
मानस देह बयस बले जों कापर की थान ।
काटि काटि निज भोग किए न कहुँ कर दान |448-क|
जे मनु बयस दान करे घड़े पून संचाए ।
आपन देहि पीर परै दान एहि काम आए |448-ख |
भावार्थ : -- मनुष्य ने आयु , ऐसे लपेटे है जैसे कोई कपडे का गट्ठर हो । काट काट के स्वयं ही उपभोग किया, किसी को दान नहीं दिया
जो मनुष्य आयु का, अर्थात जीवन का, अर्थात रक्त का दान करता है वह बहुत ही पुण्य का संचय करता है । जब स्वयं को कष्ट होता है, तो वही दान उसके काम आता है ॥
" रक्त दान -जीवन दान "
रे पंथी गठ बंधन की गठरी कस कै गाँठ ।
परिहर निद्रा नयनन की चौरी दैखे बाट । 449-क।
ले रसरी चंदिनी की बट दै दै के कास ।
मूरध मूर चौरन की आँटि साँटि के फाँस ।449-ख।
भावार्थ : -- हे पथिक ! तू अपने संचित धन में बंधी गाँठ को और अधिक कस कर अवगुंठित कर
आखों की नींद को त्याग दे, देख चोरी तेरी बाट जोह रही है । 1 ।
चांदी की रस्सी ले उसे बल दे दे कर कड़क कर ।और चोर के गले को षडयंत्र पूर्वक फाँस ले | 2 ।
काल कलुषित धन भर घट माया पास गढाए ।
मरनि पर कुटुंब मरहट काया दै बिठाय । 450 -क।
मानस प्रीत कुटुंब कै कहु कर काम न आए ।
काया के मोह परिहर माया पास हटाएँ ।450-ख।
भावार्थ : -- काले और पापयुक्त धन का मटका भरकर उस पर, संसार आसक्ति की बंधन गाँठ तो लगा दी ।
किन्तु मृत्योपरांत कुटुम्बी तेरी काया को मरघट में बैठा देंगे । 1 ।
हे मनुष्य ! कुटुंब का प्रेम, कुछ भी काम नहीं आता । काया का मोह त्याग दे, और संसार आसक्ति के बंधन को हटा कर मटके का मुख खोल दे । 2 ।
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