सोमवार, 12 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 43॥ -----

विदु विदुर विद्वानौ को जोइ  देस दै पीर । 
ते विपद ग्रह यूँ गाहें, भंग बहनि जूँ नीर /४३१ /
 ----- || अथर्ववेद || -----
भावार्थ : --विद्वान, चातुर्य एवं बुद्धिमान जिस राष्ट्र में सताए जाते हैं, वह विपत्तिग्रस्त होकर वैसे ही नष्ट हो जाता है।  जैसे टूटी नौका जल में डूबकर नष्ट हो जाती है ॥

भइ मलिनइ जब आपनी, पौरी पौरन पौर। 
तब निंदा मत कीजिये, देखत मल छत और ।४३२/
----- ॥ कन्फ्यूशियस ॥ -----
"भावार्थ : -- जब आपके अपने द्वार पुर की सीडियां मैली हों, तो अपने पड़ोसी की छत पर की गंदगी की निंदा मत करिए"

जड़मति जन भयउ बिदवन सज्जन के सत संग । 
लखित लाल मनि श्री लवन कांच कंचन अंग |433| 
       -----॥ हितोपदेश ॥ -----

भावार्थ : -- सज्जनों की संगति से मुर्ख व्यक्ति भी विद्वान हो जाता है । जैसे कंचन के साथ कांच भी,लाल मणि के समान अत्यधिक सुन्दर दिखाई देता है॥ 

माया रत ज्ञान कहानि, बिरति बात सन लाहि /
कामिन सोंहें हरिकथा, ऊसर बीज बियाहि /४३४ /
----- ||गोस्वामी तुलसी दास  || -----
भावार्थ : -- माया में अनुरक्त व्यक्ति को ज्ञान की कहानी सुनाना, लोभी व्यक्ति से त्याग की बातें करना , कामयुक्त व्यक्ति के सम्मुख भगवान की कथा बाँचना , ऊसर भूमि में बीज बोना है  अर्थात भैंस के आगे बीन बजाने के जैसा है || 

सोवत केसर ना घरे, मृग मुख आपन आप । 
तस ही बिनु मंगल करे, मिले न पून प्रताप /४३५ /
भावार्थ : -- पंचतंत्र के अनुसार : -- "सोए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं घुसते " 
उसी प्रकार बिना कल्याण किये पुण्यों का सत्व प्राप्त नहीं होता ॥ 

मानख बिषई बासना, दूराए सत श्लोक । 
जे जन परि मन कामना , भूर परे परलोक । ४३६ । 
 ----- ॥ हज़रत मोहम्मद ।। -----
भावार्थ : -- "विषय वासना मनुष्य को सत्य से दूर कर देती है । जो मनुष्य महत्वाकांक्षा में पड़ता है,वह परलोक को भूल जाता है " अर्थात मृतु के पश्चात की गति को भूल जाता है ॥ 

परे अचेतन छादन जे ऊपर तुहरे ज्ञान । 
तेइ दारन तव नियती, देइ वेदना दान । ४३७ । 
   ----- ॥ खलील जिब्रान ॥ -----
भावार्थ : -- तुम्हारे ज्ञान के ऊपर पड़े हुवे जड़ता के आवरण  को विदारित करने के लिए प्रकृति ने तुम्हें वेदना दी है ॥ 

श्रम के महिमा महा महि, मुख मंडल कर कंत । 
नयन जोत तीख कारत, नारी रोग नियंत /४३८। 
       ----- ॥ ओरीसन स्वेट मार्डेन ॥ -----
भावार्थ : -- श्रम की महिमा अपरम्पार है, श्रम से मुख मंडल पर तेज आता है, नेत्र ज्योति तीक्ष्ण होती है, और श्रम स्नायु रोगों को नियंत्रित करता है ॥ 

गुरुदेव दान न चाइए, चाइए केवल दात । 
मूठी बधि मुद्रा धारिए , पसारिये ना हाथ /४३९। 

'दान न चाइ चाइए दाता '
----- ॥ गरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ॥ -----

भावार्थ: -- गुरुदेव कहते हैं  'दान नहीं चाहिए दाता चाहिए '। 
इस हाथ की मुद्रा बंद मुट्ठी के रूप में हो न कि पसारा स्वरूप में ॥ 

अर्थात  -- हमारे देश की सरकार स्वयं तो भिखारी है, और अपने साथ जनता को भी भिखारी बना रही है । देश को भिखारियों की नहीं दाताओं की आवश्यकता है ॥ 

ऊसर भूमि बिय बियाए, भंग पात्र धरि दूध । 
भसम हवि घिउ न फले जूँ , असफल दाने बूध ।४०० । 
 ----- ॥ व्यास संहिता ॥ -----
भावार्थ : --  जिस प्रकार ऊषर भूमि में बोया हुवा बीज, भग्न पात्र में स्थित दुग्ध, और भस्म में हवन किया हुवा घृत निष्फल होता है, उसी प्रकार बुद्धिहीन को दिया हुवा दान भी हुवा करता है ॥ 



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