रविवार, 11 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 42॥ -----

धरम धरम रटता रहा, ध केहु नाही ज्ञान /
जात न जतनी आपनी, लिखे काइदा कान /४२१ /
भावार्थ : -- धर्म-धर्म को रटता रहा और 'ध ' का भी ज्ञान नहीं । अपनी जाति की तो राख करी नहीं और लिख रहा है दूसरों के जाति के नियम-कानून //

जग में धर्म जाति बरन, भए पुरखन परिचाए /
जे उदहारी आपनी , आपण सीस उठाए /४२२ /
भावार्थ : -- संसार में धर्म,जाति एवं वर्ण, वंशजों की परिचायक होती हैं (अर्थात धर्म जाती वर्ण से जीवों की उत्पत्ति का रहस्य भी प्राप्त किया जा सकता है ) । धर्म, जाति एवं वर्ण का भार या उधार अपना ही होता है तथा यह अपने ही सिर पर उठाया जाता है, स्वयं ऊपर उठ कर दूसरों के धर्म जाति या वर्ण के सिर से नहीं उठाया जाता॥

पूरब बखत बिताए ते, धारत मंथन सार । 
बोले बात अजहुँत की, अगहुँड़ कल्पन कार /४२३ /
भावार्थ : -- पूर्व में व्यतीत किये हुवे समय के मंथन सार-सत्य को धारण कर, फिर भविष्यकाल की कल्पना करते हुवे, वर्त्तमान हेतु कथन करना चाहिए ॥

जात जतन यूँ आपनी, कारैं धर्मन कार । 
खोटे  करम परिहरत, चारैं धर्म अचार ।४२४। 
भावार्थ : -- अपनी जाति इस प्रकार सँवारें कि धार्मिक तो कार्य करें । कलुषित कर्मों का त्याग करें, और धरम आचरण के अनुसार ही चलें जैसे महापुरुष चलते आए हैं ॥

कारे नीचक पदक पद, धारें ऊंच बिचार । 
दानै ज्ञान धन सम्पद, धर्म जाति उद्धार।४२५। 
भावार्थ : -- अपना पद एवं स्थान नीचा रख कर विचार ऊँचे रखते हुवे, ज्ञान, धन और सेवा आदि सम्पतियों का दान करने से धर्म एवं जातियों, राष्ट्रों का उद्धार होता है । अर्थात सादा जीवन- उच्च विचार के सूत्र में  सम्पूर्ण जीव-जगत का उद्धार निहित है ॥

जड़हिन जाति धर्म बरन, जैसे बेल बलियाए । 
तरु तुल जाके जड़ गहन, सत्य सार गहनाए । ४२५। 
भावार्थ : -- जड़हीन धर्म,जाति वर्ण आदि वलयित वेल के सदृश्य हैं । और जद ग्रहण किये हुवे धर्म, जाति, वर्ण इत्यादि वृक्ष के समान हैं जिनके सार-सत्य को बेलि ग्रहण कर सकती हैं ॥

लिये बिचारे बानिया, को लै पाथर तोल  । 
राम रतन तुल दानिया, जो जाने निज मोल ।४२६। 
भावार्थ : -- वाणिज्यक , विचारों को लिए हुवे है और कोई उसे पत्थरों में तोल रहा है । जो अपना मूल्य जानते हैं वे इन्हें ईश्वर रूप रत्न में ही तौल कर देते हैं ,क्योंकि  ईश्वर का प्रत्येक जीव में वास होता है ॥

रोष कथन जे कहुँ कहें सोचे दस दस बार । 
ताके कहत मनुख रहे मति भ्रम के आधार |427| 

भावार्थ : -- क्रोध युक्त वाक्य यदि कहीं कहना हो,तो बहुत सोच विचार कर कहना चाहिए । क्योंकि ऐसे कथन कहते समय मनुष्य की बुद्धि भ्रमित रहती है ॥ 

साम उपजै सीतल चित कलह रोष अंगार । 
साम चित के सदैव जित रोषी सदैव हार |428| 

भावार्थ : -- शान्ति, मन: स्थिति की शीतलता से उत्पन्न होती है, और कलह, क्रोध के अंगार से उत्पन्न होती है । शांत चित्त की सदैव जीत होती है, और क्रोधी की, सदैव हार ॥ 

पौधन मूर सींचे ते फूर फूर बिकसाए । 
बल पूर्वक खींचे ते समूर बाहिर आए |429|

भावार्थ :-- पौधे की जड़ को सींचने से वह फूल ही फूल उत्पादित करता है । बल पूर्वक खिंचने से वह मूल सहित बाहर आ जाता है ॥ 

अर्थात  : -- " अधिक लोभ, फलहीन होता है" 

एक बिदित के कर संभव सहस मूढ़ के अंत ।
सहसह मूरख के विभव, असक एक बुध नियंत ।430।

भावार्थ : -- एक पंडित के हाथ से सहस्त्र मूर्खों का अंत हो सकता है।सहस्त्रों मूर्खो की शक्ति, धन और प्रभाव, एक पंडित को नियंत्रित करने में, असमर्थ होती है ॥ 







कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...