लोह धारे लौहारे, अकारे दुइ सलाख ।
एक घात के राख करे, एक घात करे राख ।४११ ।
भावार्थ : -- लौहार ने लोहा लेकर उसे दो सलाखों की आकृति दी । एक सलाख ने चोट से रक्षा की और एक ने फार करते हुवे हत्या का कारण बना॥
सचिव धरम सेवा करम, करतब कारे येह ।
खाया पिया पूर उदर, पहनी ओढ़ी देह । ४१२।
भावार्थ : -- मंत्री का धर्म है कि वह केवल सेवा कार्य करे, किन्तु उसने करतब ये किये । पूरा उदार भर कर तो खाया -पिया और देह को पहना ओढ़ा कर बना -ठना के रखा ॥
दुर्जन ते दूरी भली, सदजन ते सत्संग ।
धवल माटिका धौलिया, कलुखे कोइल रंग । ४१३।
भावार्थ : -- दुर्जनों से अंतर रखना उत्तम है,और सद्चरित्र ,ज्ञान वानों से ज्ञान-गोष्टी उत्तम है । धवल मिटटी धौला कर देती है, और कोयले की कालिख कलुषित कारित करती है अर्थात सद्गुण व्यक्ति को गुणवान बनाते हैं और दुर्गुण गुणहीन कारित कर देते हैं ॥
शब्द रतन हरुबर भया, भर भर झोरी धार ।
क़तर छाँट के कारू कर, दै बहुमुला कार /४१४ /
भावार्थ : -- शब्द रत्न घटीदरों में उपलब्ध है , जिसे झोलियों में भरें । फिर काट-छाँट कर शिल्प कारी करते हुवे उसे बहुमूल्य आकृति देवें ॥
सांचे ते जग पतियाए झूठन दूर धराए ।
चाहे बोल केस धर चाहे काछ कसाए | 415|
भावार्थ : -- संसार को सत्य ही से प्रेम है, झूठ से नहीं ॥ केश धारण करके या लंगोट धारण करके बोलो अर्थात कैसी भी वेश भूषा में बोला जाए सत्य,सत्य स्वरूप में एवं असत्य, असत्य रूप में ही रहेगा ।।
काचे कुम्भी ते करे कारूँक बहुत सनेह ।
जीवन भयउ छिनु भंगुर काहे नेहत देह |416|
भावार्थ : -- शरीर कच्चा घडा है, और कंजूस धनी को इससे बहुत ही प्रेम है । यह जीवन तो पल भर में समाप्त हो वाला है, फिर इस शरीर से मोह क्यूँ है ॥
ज्वाल जलज सुखाए कभु जलज ज्वाल बुझाए ।
दुःख सुख सोख मिटाए कभु सुख दुःख सोख मिटाए |417|
भावार्थ -- ज्वाला जल को सोखती है, कभी जल ज्वाला को बुझाता है । दुःख सुख को शोषित कर लेता है, कभी सुख दुखों को दूर कर देता है ॥
राई ते परबत बढ़े तिल ते बाढ़े ताड़ ।
बूँद बूँद सागर गढ़े तस लघुत बड़े बाड़ |418|
भावार्थ -- राई से ही पर्वत बढ़ता है, तिल का ही ताड़ बनता है । बूँद बूँद से सागर की रचना होती है, वैसे ही प्रत्येक छोटा स्वरूप, बड़ा होता है ॥
अगन के लपट लिपटाए ते लोहा भी गर जाए ।
दहन गर्भ के झपटाए ते सकल बुद्धि जराए |419|
भावार्थ : -- आग की लपट से लिपट के लोहा भी गल जाता है । उसी प्रकार, क्रोध अग्नि के लपेटे में आकर, समस्त बुद्धि नष्ट हो जाती है ॥
दूध अगनी चड़ाए ते उफनत बाहिर आए ।
रोष अगनी जराए ते दुर बादन निकसाए | 420|
भावार्थ -- आग के पर दूध चढ़ाने से, वह उफन कर बाहर आता है । उसी प्रकार क्रोध की आग से युक्त होकर, निन्दित-वचन बाहर आते हैं ।।
एक घात के राख करे, एक घात करे राख ।४११ ।
भावार्थ : -- लौहार ने लोहा लेकर उसे दो सलाखों की आकृति दी । एक सलाख ने चोट से रक्षा की और एक ने फार करते हुवे हत्या का कारण बना॥
सचिव धरम सेवा करम, करतब कारे येह ।
खाया पिया पूर उदर, पहनी ओढ़ी देह । ४१२।
भावार्थ : -- मंत्री का धर्म है कि वह केवल सेवा कार्य करे, किन्तु उसने करतब ये किये । पूरा उदार भर कर तो खाया -पिया और देह को पहना ओढ़ा कर बना -ठना के रखा ॥
दुर्जन ते दूरी भली, सदजन ते सत्संग ।
धवल माटिका धौलिया, कलुखे कोइल रंग । ४१३।
भावार्थ : -- दुर्जनों से अंतर रखना उत्तम है,और सद्चरित्र ,ज्ञान वानों से ज्ञान-गोष्टी उत्तम है । धवल मिटटी धौला कर देती है, और कोयले की कालिख कलुषित कारित करती है अर्थात सद्गुण व्यक्ति को गुणवान बनाते हैं और दुर्गुण गुणहीन कारित कर देते हैं ॥
शब्द रतन हरुबर भया, भर भर झोरी धार ।
क़तर छाँट के कारू कर, दै बहुमुला कार /४१४ /
भावार्थ : -- शब्द रत्न घटीदरों में उपलब्ध है , जिसे झोलियों में भरें । फिर काट-छाँट कर शिल्प कारी करते हुवे उसे बहुमूल्य आकृति देवें ॥
सांचे ते जग पतियाए झूठन दूर धराए ।
चाहे बोल केस धर चाहे काछ कसाए | 415|
भावार्थ : -- संसार को सत्य ही से प्रेम है, झूठ से नहीं ॥ केश धारण करके या लंगोट धारण करके बोलो अर्थात कैसी भी वेश भूषा में बोला जाए सत्य,सत्य स्वरूप में एवं असत्य, असत्य रूप में ही रहेगा ।।
काचे कुम्भी ते करे कारूँक बहुत सनेह ।
जीवन भयउ छिनु भंगुर काहे नेहत देह |416|
भावार्थ : -- शरीर कच्चा घडा है, और कंजूस धनी को इससे बहुत ही प्रेम है । यह जीवन तो पल भर में समाप्त हो वाला है, फिर इस शरीर से मोह क्यूँ है ॥
ज्वाल जलज सुखाए कभु जलज ज्वाल बुझाए ।
दुःख सुख सोख मिटाए कभु सुख दुःख सोख मिटाए |417|
भावार्थ -- ज्वाला जल को सोखती है, कभी जल ज्वाला को बुझाता है । दुःख सुख को शोषित कर लेता है, कभी सुख दुखों को दूर कर देता है ॥
राई ते परबत बढ़े तिल ते बाढ़े ताड़ ।
बूँद बूँद सागर गढ़े तस लघुत बड़े बाड़ |418|
भावार्थ -- राई से ही पर्वत बढ़ता है, तिल का ही ताड़ बनता है । बूँद बूँद से सागर की रचना होती है, वैसे ही प्रत्येक छोटा स्वरूप, बड़ा होता है ॥
अगन के लपट लिपटाए ते लोहा भी गर जाए ।
दहन गर्भ के झपटाए ते सकल बुद्धि जराए |419|
भावार्थ : -- आग की लपट से लिपट के लोहा भी गल जाता है । उसी प्रकार, क्रोध अग्नि के लपेटे में आकर, समस्त बुद्धि नष्ट हो जाती है ॥
दूध अगनी चड़ाए ते उफनत बाहिर आए ।
रोष अगनी जराए ते दुर बादन निकसाए | 420|
भावार्थ -- आग के पर दूध चढ़ाने से, वह उफन कर बाहर आता है । उसी प्रकार क्रोध की आग से युक्त होकर, निन्दित-वचन बाहर आते हैं ।।
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