बिटिया बटियाँ काँच की, घरि घरि खेरी खेल /
चारे धरती नाच की, बोले लइ सुर टेर /४०१ /
भावार्थ : -- बिटियाएँ तो कांच की बट्टियों के समान होती है जो देश के घर घर की खिलौना होती हैं / जिनके चलने से धरती भी नाच करी, और बोलने से सुर बांधने लगी //
माया ही कौ धर्म किए, काया को कर जात /
उदक निंदक कर्म किए, पुरखन कौ धर लात /४०२/
भावार्थ : -- पाप कर्म द्वारा जनित धन ही जिनका धर्म होता है , यह क्षणभंगुर काया ही उनकी जाति होती है॥ वे अपने पुरखों को अर्थात माँ-बाप, दादा परदादाओं को लात मारते हुवे, निन्दित कर्म को वह उचक उचक कर अर्थात बड़े उत्साह पूर्वक करते हैं॥
फिरै उरन खटोल मैं, पहिर बहुमूल चोल /
मंते मंत्री दीनहुँत, घिरे धनमनी टोल /४०३/
भावार्थ : -- उड़न खटोले में अर्थात जहाज़ों में तो ये फिरते हैं, और पहनते हैं बहुमूल्य वस्त्र । और धनवानों के समूह में अथवा उनकी पाठशाला में, मंत्रीजी निर्धनों की मंत्रणा करते हैं
अर्थात : -- "निर्धनों की मंत्रणा दूरदर्शन पर प्रदर्शन किये बिना निर्धनों के बीच ही की जाती है"
उपरोपरइ तरै सचिव, करम करें सो नीच /
बाज झपट्टा मारि जूँ, मत मछरी मुख भीच /४०४/
भावार्थ : -- मंत्रीगण तैरते तो ऊपर ही ऊपर हैं और काम नीचता के करते हैं । जैसे बाज झपट्टा मार कर मछली मुख में दबाए रखता है वैसे ही ये भोली जनता की सम्मति को देखते हैं //
मंजुल फुल बिकसाए प्रमद बन मंजरी छाए ।
भँवर भँवर भरमाए मुख मंद्र गुंजार करे |405|
भावार्थ : -- सुन्दर पुष्प प्रफुलित हुवे प्रमोदवन पुष्प गुच्छ से परिपूर्ण हो गया भ्रमण करते भ्रमर भ्रमित होकर मुख से गंभीर ध्वनि गुंजारित करने लगे ॥
मंद्र = संगीत के तीन स्वर सप्तकों ( मंद्र, मध्य, तार) में से पहला
वह रूप सकल जग सुन्दर जे एक प्राणाधार ।
वह सरूप नर नागर कर एक कनी स्वीकार /406/
भावार्थ : -- वह रूप विश्व का सबसे सुन्दर रूप है जिसका एक ही प्राणाधार हो । वह नर हरि स्वरूप है जिसने एक ही कन्या पत्नी रूप में स्वीकार की हो ॥
भल मन साहत के कोउ अवसर नहीं गवाएँ ।
भल करे जनु सुफलाए मरनु सरल हो जाए /407/
भावार्थ : -- भलाई करने का कोई भी अवसर नहीं गंवाना चाहिए । भलाई जन्म को सफल करती है, और मृत्यु को सरल करती है ॥
सद चरित मैं कदाचरन ज्यूँ दन्त पर जीव ।
तुरत सुधि कराए नहि तौ पल में डोलै नीव /408/
भावार्थ : -- सच्चरित्र में कदाचरण का होना वैसे ही है, जैसे दांत में परजीव का होना । इन्हें तत्काल शुद्ध करना चाहिए, अन्यथा सच्चरित्र और दांत, दोनों की नींव हिलने लगेगी ॥
भूखन रोग समान है, भोजन भेषज रूप ।
प्यास पास प्रभाव है पय प्रतिरोध सरूप /409/
भावार्थ : -- भूख रोग के समान है, इसकी औषधि भोजन है । प्यास पार्श्व-प्रभाव है, पानी इसका प्रतिरोधक है ॥
यह तन काचा कुम्भ है तामें पयस विचार ।
सोषे सीत बीर धरै नहि ते ताप अधार /410/
भावार्थ -- यह देह मिटटी के घड़े के समान है, और इसमें विचार पानी स्वरूप हैं । यदि यह घड़े द्वारा शोषित होगा तभी ठंडक उत्पन्न करेगा अन्यथा यह ताप के अधीन ही रहेगा ॥
अर्थात : -- "विचारों का अनुशरण स्वयं न करने से, वह सारहीन हो जाते है"
माया ही कौ धर्म किए, काया को कर जात /
उदक निंदक कर्म किए, पुरखन कौ धर लात /४०२/
भावार्थ : -- पाप कर्म द्वारा जनित धन ही जिनका धर्म होता है , यह क्षणभंगुर काया ही उनकी जाति होती है॥ वे अपने पुरखों को अर्थात माँ-बाप, दादा परदादाओं को लात मारते हुवे, निन्दित कर्म को वह उचक उचक कर अर्थात बड़े उत्साह पूर्वक करते हैं॥
फिरै उरन खटोल मैं, पहिर बहुमूल चोल /
मंते मंत्री दीनहुँत, घिरे धनमनी टोल /४०३/
भावार्थ : -- उड़न खटोले में अर्थात जहाज़ों में तो ये फिरते हैं, और पहनते हैं बहुमूल्य वस्त्र । और धनवानों के समूह में अथवा उनकी पाठशाला में, मंत्रीजी निर्धनों की मंत्रणा करते हैं
अर्थात : -- "निर्धनों की मंत्रणा दूरदर्शन पर प्रदर्शन किये बिना निर्धनों के बीच ही की जाती है"
उपरोपरइ तरै सचिव, करम करें सो नीच /
बाज झपट्टा मारि जूँ, मत मछरी मुख भीच /४०४/
भावार्थ : -- मंत्रीगण तैरते तो ऊपर ही ऊपर हैं और काम नीचता के करते हैं । जैसे बाज झपट्टा मार कर मछली मुख में दबाए रखता है वैसे ही ये भोली जनता की सम्मति को देखते हैं //
मंजुल फुल बिकसाए प्रमद बन मंजरी छाए ।
भँवर भँवर भरमाए मुख मंद्र गुंजार करे |405|
भावार्थ : -- सुन्दर पुष्प प्रफुलित हुवे प्रमोदवन पुष्प गुच्छ से परिपूर्ण हो गया भ्रमण करते भ्रमर भ्रमित होकर मुख से गंभीर ध्वनि गुंजारित करने लगे ॥
मंद्र = संगीत के तीन स्वर सप्तकों ( मंद्र, मध्य, तार) में से पहला
वह रूप सकल जग सुन्दर जे एक प्राणाधार ।
वह सरूप नर नागर कर एक कनी स्वीकार /406/
भावार्थ : -- वह रूप विश्व का सबसे सुन्दर रूप है जिसका एक ही प्राणाधार हो । वह नर हरि स्वरूप है जिसने एक ही कन्या पत्नी रूप में स्वीकार की हो ॥
भल मन साहत के कोउ अवसर नहीं गवाएँ ।
भल करे जनु सुफलाए मरनु सरल हो जाए /407/
भावार्थ : -- भलाई करने का कोई भी अवसर नहीं गंवाना चाहिए । भलाई जन्म को सफल करती है, और मृत्यु को सरल करती है ॥
सद चरित मैं कदाचरन ज्यूँ दन्त पर जीव ।
तुरत सुधि कराए नहि तौ पल में डोलै नीव /408/
भावार्थ : -- सच्चरित्र में कदाचरण का होना वैसे ही है, जैसे दांत में परजीव का होना । इन्हें तत्काल शुद्ध करना चाहिए, अन्यथा सच्चरित्र और दांत, दोनों की नींव हिलने लगेगी ॥
भूखन रोग समान है, भोजन भेषज रूप ।
प्यास पास प्रभाव है पय प्रतिरोध सरूप /409/
भावार्थ : -- भूख रोग के समान है, इसकी औषधि भोजन है । प्यास पार्श्व-प्रभाव है, पानी इसका प्रतिरोधक है ॥
यह तन काचा कुम्भ है तामें पयस विचार ।
सोषे सीत बीर धरै नहि ते ताप अधार /410/
भावार्थ -- यह देह मिटटी के घड़े के समान है, और इसमें विचार पानी स्वरूप हैं । यदि यह घड़े द्वारा शोषित होगा तभी ठंडक उत्पन्न करेगा अन्यथा यह ताप के अधीन ही रहेगा ॥
अर्थात : -- "विचारों का अनुशरण स्वयं न करने से, वह सारहीन हो जाते है"
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