गुरुवार, 8 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 39॥ -----

डाह दाह निंदा धुँआ , कलुखे मति आकास /
वाके अंजन नयन दिए, राखे दूर प्रकास /३९१ /
भावार्थ :-- ईर्ष्या यदि अग्नि है, तो निंदा धुँवा है , जो मस्तिष्क के आकाश को कलुषित कर देता है / यदि इस कलुषाई के काजल को दृष्टि-पलक में लगाया जाए तो वह काजल व्यक्ति को सत्य रूपी प्रकाश से दूर करते हुवे उसे अंधा अर्थात विचारहीन घोषित कर देता है //

राजे थे सो सिधा गए, रहि गए काले भूत /
नीति नियम जाने नहीं, लड़ने में मजबूत /३९२/
भावार्थ : -- जो वास्तव में राजा थे वे तो चले गए और काले भूतों को यहाँ छोड़ गए / न ये नीति जानते, न कायदा-कानून जानते, हाँ लड़ने के लिए कह दो तो सारे तगड़े हैं //

प्रस्तुत पंक्तियाँ संत कबीर के दोहे से अभिप्रेरित हैं वह निम्न है : -- 
दाता दाता चलि गये, रहि गए मक्खी चूस /
दान मान समुझै नहीं, लड़ने को मजबूत //

संचित जल धन एक धर्म, दोनों ही बिगड़ोल /
बहता जल भै निर्मला, रोलै धन घन मोल /३९३ /
भावार्थ : -- संचित धन चाहे धर्म का हो या पाप का और जल चाहे नदी का हो या नाले का दोनों ही की प्रकृति एक जैसी होती है, संचित स्वरूप में दोनों ही सड़ जाते हैं / बहता हुवा जल ही निर्मल होता है और रुलता हुवे धन का घना मोल होता है अन्यथा वह दुसरे के धन से हल्का हो जाता है //

संचइ संपद सारिये, तापर मोह उठाएँ /
ऐतक संचइ कारिये, जेतक धरी ढकाए /३९४/
भावार्थ :-- संचित की हुई धन -सपति परसे मोह का त्याग करते हुवे उसे बाहर निकालें / इतना ही धन संचित करें जितना की अवसर विशेष पर काम में लाया जा सके //

धन संपद अस पद पाए जस भोजन लोनाए ।
अल्प ते अधर मधुराए खार धरे अधिकाए /395/ 

भावार्थ : -- जीवन में धन-संपत्ति का वही स्थान होना चाहिए, जो स्थान भोजन में लवण का है । जिस प्रकार लवण की न्यूनता अधरों में मधुरता भर देती है, और अधिकता खार उत्पन्न कराती है उसी प्रकार धन संपत्ति की न्यूनता से जीवन सुखमय हो जाता है और अधिकता से कष्ट उत्पन्न हो जाते हैं ॥ 

साधू भेस लहे और धनके मनके फेर ।
ऐसन  जे जन पग गहे ते लै अवगुन  घेर ।396।   

भावार्थ : -- जिसने साधू का वेश धरा है, और धन के माणिक फेर रहा है । जो मनुष्य ऐसे साधुओं के चरण पकड़ते हैं, उन्हें अवगुण घेर लेते हैं । 3 ।  

साधू खड़ा दुआरि पै करके बहु पाखंड । 
अपनी सिया की रक्षा कर सिर पे दे दो दंड /397/ 

भावार्थ : -- कपट वेश धारण किये यह बना हुवा साधू तेरे द्वार खड़ा है, जो की रावण है रावण इसके सिर पे दो डंडे मार के ( बाकी छ: और दुसरे दल के रावणों  को मारना इसके लिए दो ही पर्याप्त है )  अपनी सीता की रक्षा कर ॥ 

निर्दय ह्रदय की गति गहि मूरखता आधार ।
मनसा बाचा कर्मना भगति पूर्वक सार /398/ 

भावार्थ : -- जब ह्रदय निर्दयता धारण कर मुर्खता के आधार हो जाता है । फिर उसे मन से वाचा से और कर्म से भक्ति में लगा कर उद्धरित करना चाहिए ॥ 

सागर लाख रतन धरे धरनि चरन गहियाए । 
मनुज घमंड पवन उरे एक मुठ में इतराए /399/ 

भावार्थ : -- समुद्र लाखों रत्न धारण किये हुवे हैं,फिर भी वह धरती के चरण  पकडे हुवे है । मनुष्य और बादल, एक मुट्ठी में ही घमंड और ऐंठ करते हुवे हवा में उड़ते हैं॥ 

धूरि रुंदी चरन तले फूरि सीर्ष सिधाए । 
फूर उपबन सोह करे धूरिहि मै बिकसाए /400/

भावार्थ : -- धूल, चरणों के नीचे मर्दित होती है, पुष्प, शिरोधार्य किया जाता है । पुष्प,  धूल में विकसित होकर ही उपवन को सुशोभित करता  है ॥ 
                   
अर्थात  -- " कार्य कहीं और होता है, और कीर्ति( ख्याति) कहीं और होती है" 


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