बुधवार, 7 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 38॥ -----

आया चुनाउ चेटकू ,पलीत चयनइ कोए /
पर परमम् मन आपनै , कहु जग मैं को होए /३८१ /
चेटकू = ठग्गू , जादू दिखाने वाला
पलीत = धूर्त, दुष्ट,गंदा
भावार्थ : -- ठग्गू चुनाव आने ही वाला है और कोई धूर्तों को, दुष्टों को,गंदों को चयनित कर रहा है / किन्तु अपने मन से भी बड़ा धूर्त, दुष्ट, गंदा संसार में कोई है क्या ?

अर्थात : -- "यदि दुर्जनों को ही चयनित करना हो, तो सर्वप्रथम स्वयं का चयन करें"

माया बाँधे पग घुँघरु , दूजन ताल अधीन /
माया बंधन परिहरैं, भै अपने लयलीन /३८२ /
भावार्थ : -- माया ने पैर में ऐसे घुंघरू बाँध दिए कि,  दुसरे की तालों के अधीन हो गए / माया के इस बंधन को त्यागें और अपनी ही धुन में मग्न हो जाएँ //

काया कलित आकारित , अंतर निर्गुन कार /
जैसे बरते आचरन, तैसे सरुपाधार /३८३ /
भावार्थ : --काया आकार ग्रहण किये हुवे है किन्तु अंतर आत्मा निर्गुण एवं निराकार है / जिस प्रकार का आचरण व्यवहार में लाया जाता है , अंतर आत्मा उसी स्वरूप के आधार हो जाती है मृत्यु के पश्चात आचरणों के सह आत्मा अदृश्य हो जाती है और देह विघटित हो जाती है //

पाँच परत का भूतना, चाल चलत इतराए /
काल गहत नसमरे अरु , पाथर अमर कुहाए /३८४ /
भावार्थ : -- यह शरीर पञ्चतत्व का भूत है, जो बड़े ही इतरा-इतरा के चलता है / समय आने पर यह नष्ट हो जाता है और पत्थर को अमर कहलवा जाता है //

पर जीउ के जीवन ले मारे एक ही वार । 
पीर पड़े जब आप ते हरि हरि करे पुकार ।385। 

भावार्थ : -- पराए जीव का जीवन को एक प्रहार से ही हरण कर लेते हो । किन्तु जब स्वयं पर पीड़ा आती है, तो भगवान को पुकारते हो,ऐसी अवस्था में भगवान, क्यों किसी की सुनेंगे ।।  


साधू खड़ा दुआरि पै करके बहु पाखंड । 
अपनी सिया की रक्षा कर सिर पे दे दो दंड /386/ 

भावार्थ : -- कपट वेश धारण किये यह बना हुवा साधू तेरे द्वार खड़ा है, जो की रावण है रावण इसके सिर पे दो डंडे मार के ( बाकी छ: और दुसरे दल के रावणों  को मारना इसके लिए दो ही पर्याप्त  है )  अपनी सीता की रक्षा कर ॥

रोष परसत बचन होत अंधड़ अंध अमंद । 
मधुर जस परस सुमन दै मंद समीरन गंध /387/ 
भावार्थ : -- क्रोध का स्पर्श प्राप्त करते ही मुख वचन, आंधी के स्वरूप, औचित्य हीन एवं उग्र होते हैं । मधुर वचन,  कुसुम को स्पर्श कर सुखद एवं सुगन्धित वायु के समान शीतल होते है ॥ 

एक बाँबी भीत लांबी कुंडलिनि कुंडलाए । 
बांबी सोवत ही भली जागत काल कराए /388/

भावार्थ : -- एक दीमक के टीले मन एक सांप णी  कुंडली करे हुवे है । उस टीले में वह सुप्तावस्था में ही ठीक है, ये जाग गयी तो मृत्यु कारित कर देती है ॥ 
उत्तर = जिह्वा 

जहाँ धरम बिटप सिराए सुखत दया के मूर । 
तहाँ भगति सलिल सिंचाए एहि मानस के धूर /389/ 

भावार्थ : -- जहाँ दया की जड़ शुष्क होने से धर्म का वृक्ष गिरने वाला हो । मनुष्य का यह कर्त्तव्य है कि वहाँ भक्ति का जल प्रवाहित कर उसे हराभरा करे ॥ 

एक कुल दीप जनाए ते कुल के मान बढ़ाए । 
एक कुल दीप कमाए ते सकल दरिदता जाए /390/ 

भावार्थ : -- एक उत्तम संतान के जन्म लेने से समस्त कुल का मान बढ़ता है । एक योग्य संतान के धनार्जन से समस्त कुल की दरिद्रता दूर हो जाती है ॥ 

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