मंगलवार, 6 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 37॥ -----

आसन देह सजाइ कै , बाँचे कोरा ज्ञान /
डूबे भोग बिलास में, मति मत दान धियान /३७१ /
भावार्थ : - आसंदी पर देह को तो सजा लिए , और बाँच रहे हैं अनुभवहीन ज्ञान ( कोरा ज्ञान =जिस ज्ञान का अनुभव न किया गया हो ) । सारे भोग-विलास में दुबे हुवे हैं, और मस्तिष्क की विचार सरणी में केवल 'दान 'ही का ध्यान है ॥

पीठ पदक पद पाए तौ, मिला बुआई खेत /
बेढ़ मेढ़ बुड़ाई कै, बैसे भवन  निचेत /३७२ /
भावार्थ : -- उंची आसंदी उंचा स्थान उंचा पद प्राप्त होता है तो खेत को भी बोना पड़ता है, उपज उत्पादित करनी पड़ती है, अर्थात श्रम करना पड़ता है । किन्तु जिन्हें ये ऊँचा-ऊँचा मिला है उन्होंने तो सारे अंकुर सारे मेढ़े सब कुछ डुबो दिया और निश्चिंत होकर भवन में बैठे हैं //

तन तौ कुल चारी चरन भँवरत धरनिहि हार ॥ 
कुलाँचे भरत मन हिरन ढूँडे दुज संसार /373/ 
भावार्थ : -- यह तन तो कुल चार चरण चल कर धरती का भ्रमण करता थक जाता है । किन्तु यह मन तो हिरण है, जो कुलांचे भरता हुवा दुसरा संसार ढूंड लेता है ॥ 

पर जीउ के जीवन ले मारे एक ही वार । 
पीर पड़े जब आप ते हरि हरि करे पुकार ।374। 

भावार्थ : -- पराए जीव का जीवन को एक प्रहार से ही हरण कर लेते हो । किन्तु जब स्वयं पर पीड़ा आती है, तो भगवान को पुकारते हो,ऐसी अवस्था में भगवान, क्यों किसी की सुनेंगे ।।  

कल कल करत छलकत जल नहरन नादत जाए । 
नहरी गहरी सींच कै कन कन दै हरियाए ।375/।

 भावार्थ  -- कल कल की ध्वनि करता और छलकता हुवा,जल नहर में  गुंजारित हो रहा  है । नहर से सींची जाने वाली धरती को बहुंत ही गहनता पूर्वक सींच कर, दानों में हरियाली भर रहा है ॥  

सागर सीमा पार कर धरनि जलमयी कार । 
तरंगोपर तरंग धर पूछे कहाँ कगार /376/

 भावार्थ :-- सागर अपनी सीमाओं को तोड़ते हुवे धरती को जलमय कर दिया । उछाल  पर उछाल भर  कर अब किनारे का पता पूछ रहा है ॥ 

अर्थात : --" सीमाएं विस्मृत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि विस्मृति विस्त्रंस( पतन) का कारण बनती है " 

आखर आखर भेंट कर पोथे लाख लिखाए । 
भाव गति ना उपजे ते कछू काम ना आए ।377/ 

भावार्थ :-- सुशिक्षित होकर, ग्रन्थ बहुत लिखे ।  यदि उनमें वैचारिकी उत्पन्न नहीं हुई, तो वह किसी काम के नहीं ।।

पल पल पहर, पहर दिवस, दिवस दिवस करि साल । 
जग करतब्य कब सुरते अंत भयौ जब काल /378/ 

भावार्थ : -- क्षण, पहर में, पहर दिवस में, दिवस दिवस वर्ष में परिवर्तित हो रहे है । हे मनुष्य ! तुझे संसार के कर्तव्य करने का ध्यान कब होगा ? जब तेरा अंत  हो जाएगा ? 

जे मन पूछ उपजे ते  रह कहुँ बूझ निशंक । 
रहे जे कहुँ काल बिषम मिलहिं तेहि सम अंक /379/ 

भावार्थ : -- यदि मस्तिष्क में कोई प्रश्न उत्पन्न होता है, तो उसका उत्तर भी अवश्य होगा । यदि परिस्थितियाँ विषम हों, तो उसके अनुकूल स्थिति भी अवश्य ही होगी ॥ 

हरि चाप गगन बरे जब बूँद किरन करि पार । 
कबित बहु अर्थ धरे जब हो लस रस लंकार /380/

भावार्थ : -- गगन तब इन्द्रधनुष का वरण करता है, जब किरणें बूंदों के पार जाती हैं उसी प्रकार काव्य भी बहुत अर्थ धरा करता है, जब उसमे रस और अलंकार की चमक होती है ॥ 

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