झूठा पुतरा कलुख मुख, धारे नाम प्रधान /
एक खाट मैं खटक रहा, दूजा सब्द संधान /३६१ /
भावार्थ : --झूठ का पूतला अर्थात बहुंत झूठ बोलने वाला +काला मुंह वाला ऊपर से नाम रख लिया प्रधान माने की मंत्री /एक तो खटिया में पडा खटक रहा है (जाने कब उठेगा )दूसरा शब्द संधि में खटक रहा है //
सुनेगी मीच पापिनी, धीरहि धीरे बोल /
धरम तराजू आपनै, पाप पून को तौल /३६२ /
भावार्थ : -- मृत्यु बड़ी ही पापनि है वह तेरी सारी बातें सुन लेगी और तुझे ले जाएगी इस लिए धीरे-धीरे बोल /और धर्म कांटें में अपने पाप पुण्य तौलना प्रारम्भ कर दे //
कंठ लग जग भोग लिया, देखे किसकी बाट /
खाट बिछाई मरघटी, अटबाटी खटबाट /३६३/
अटबाटी -खटबाती = बोरिया-बाँधना
भावार्थ : -- गले तक भर भर के इस संसार को भोग लिया, अब किस भोग की प्रतीक्षा है / तेरी खटिया मरघटी में बिछ गई है / अब बिछौने बाँधना प्रारम्भ कर दे //
धन धन ईस बसे रहे, जग मैं केतिक केत /
ते मूरख छाँड़ गए तू, लै जा आपन सेत /३६४/
भावार्थ :-- इस संसार में जाने कितने ही कितने धन कुबेर और धराधीश हुवे वे तो मुर्ख थे जो यह निगम, निकुंज, निकेत यहीं छोड़ कर चले गए, तू बुद्धिमान है तू अपने साथ ले जाना //
धुनी चयन कर खाँड जस करुबर सत्य बिचार ।
अर्थ उपजै लावन तस कहत कसाउत ढार /365/
भावार्थ : -- मीठे मीठे शब्द चयनित करके, उसमे कड़वे सत्य विचार का संयोजन कर,लावण्यता युक्त अर्थों को उत्पन्न कर, एक कसी हुई कहावत की रचना होती है ।।
अवनि रूसे अम्बर रूसे, रूसे नदीस पहार ।
रूसे चाहे सकल जगत न रूसे प्रानाधार /366/
भावार्थ : -- धरती-आकाश रूठ जाएँ, पर्वत-सागर रूठ जाएं । चाहे समस्त संसार ही रूठ जाए, किन्तु प्रियतम रूठना नहीं चाहिए ॥
सर पर जब संकट आए बर जन के एहि भाख ॥
धरा धरी कि धरी रहे सुबरन बचाए साख /367/
भावार्थ : -- श्रेष्ठ जनों की यह वाणी है कि जब सिर पर संकट आता है । तो भूमि आदि सम्पद धरी की धरी रह जाती है,सोना घर का सम्मान बचाता है ॥ ( क्योकि स्वर्ण को आधी रात में भी मुद्रा में परिवर्तित किया जा सकता है )
एक मूढ़ पूछे साहिब गोल कौन आकार ।
साहिब गोल घुमाए के बोले गोलाकार /368/
भावार्थ : -- एक मूर्ख प्रश्न पूछ रहा है, साहेब ! गोले का क्या आकार है ?। साहेब ! ने उसे गोल गोल घुमाया, फिर कहा गोलाकार ॥
माया के एक फूँक ते धुर ऊपर उडियाए ।
काल के एकहि धूँक ते धरती नीच धसाए /369/
भावार्थ : -- धन-संपत्ति के सहारे घमंड में भरकर ऊपर उड़ने वाले मृत्यु के एक ही धक्के से धरती के नीचे समा जाते हैं ॥
छोट बोल कार बढ़े अस कर जिउ आकार ।
देकर भले भूल पड़े भुले कभु न उधार /370/
भावार्थ : -- कथनी छोटी हो और कार्य बड़े हो, जीव का ऐसा ही आकार होना चाहिए । देकर भले ही भूल जाएं, किन्तु लेकर भुलना नहीं चाहिए ॥
एक खाट मैं खटक रहा, दूजा सब्द संधान /३६१ /
भावार्थ : --झूठ का पूतला अर्थात बहुंत झूठ बोलने वाला +काला मुंह वाला ऊपर से नाम रख लिया प्रधान माने की मंत्री /एक तो खटिया में पडा खटक रहा है (जाने कब उठेगा )दूसरा शब्द संधि में खटक रहा है //
सुनेगी मीच पापिनी, धीरहि धीरे बोल /
धरम तराजू आपनै, पाप पून को तौल /३६२ /
भावार्थ : -- मृत्यु बड़ी ही पापनि है वह तेरी सारी बातें सुन लेगी और तुझे ले जाएगी इस लिए धीरे-धीरे बोल /और धर्म कांटें में अपने पाप पुण्य तौलना प्रारम्भ कर दे //
कंठ लग जग भोग लिया, देखे किसकी बाट /
खाट बिछाई मरघटी, अटबाटी खटबाट /३६३/
अटबाटी -खटबाती = बोरिया-बाँधना
भावार्थ : -- गले तक भर भर के इस संसार को भोग लिया, अब किस भोग की प्रतीक्षा है / तेरी खटिया मरघटी में बिछ गई है / अब बिछौने बाँधना प्रारम्भ कर दे //
धन धन ईस बसे रहे, जग मैं केतिक केत /
ते मूरख छाँड़ गए तू, लै जा आपन सेत /३६४/
भावार्थ :-- इस संसार में जाने कितने ही कितने धन कुबेर और धराधीश हुवे वे तो मुर्ख थे जो यह निगम, निकुंज, निकेत यहीं छोड़ कर चले गए, तू बुद्धिमान है तू अपने साथ ले जाना //
धुनी चयन कर खाँड जस करुबर सत्य बिचार ।
अर्थ उपजै लावन तस कहत कसाउत ढार /365/
भावार्थ : -- मीठे मीठे शब्द चयनित करके, उसमे कड़वे सत्य विचार का संयोजन कर,लावण्यता युक्त अर्थों को उत्पन्न कर, एक कसी हुई कहावत की रचना होती है ।।
अवनि रूसे अम्बर रूसे, रूसे नदीस पहार ।
रूसे चाहे सकल जगत न रूसे प्रानाधार /366/
भावार्थ : -- धरती-आकाश रूठ जाएँ, पर्वत-सागर रूठ जाएं । चाहे समस्त संसार ही रूठ जाए, किन्तु प्रियतम रूठना नहीं चाहिए ॥
सर पर जब संकट आए बर जन के एहि भाख ॥
धरा धरी कि धरी रहे सुबरन बचाए साख /367/
भावार्थ : -- श्रेष्ठ जनों की यह वाणी है कि जब सिर पर संकट आता है । तो भूमि आदि सम्पद धरी की धरी रह जाती है,सोना घर का सम्मान बचाता है ॥ ( क्योकि स्वर्ण को आधी रात में भी मुद्रा में परिवर्तित किया जा सकता है )
एक मूढ़ पूछे साहिब गोल कौन आकार ।
साहिब गोल घुमाए के बोले गोलाकार /368/
भावार्थ : -- एक मूर्ख प्रश्न पूछ रहा है, साहेब ! गोले का क्या आकार है ?। साहेब ! ने उसे गोल गोल घुमाया, फिर कहा गोलाकार ॥
माया के एक फूँक ते धुर ऊपर उडियाए ।
काल के एकहि धूँक ते धरती नीच धसाए /369/
भावार्थ : -- धन-संपत्ति के सहारे घमंड में भरकर ऊपर उड़ने वाले मृत्यु के एक ही धक्के से धरती के नीचे समा जाते हैं ॥
छोट बोल कार बढ़े अस कर जिउ आकार ।
देकर भले भूल पड़े भुले कभु न उधार /370/
भावार्थ : -- कथनी छोटी हो और कार्य बड़े हो, जीव का ऐसा ही आकार होना चाहिए । देकर भले ही भूल जाएं, किन्तु लेकर भुलना नहीं चाहिए ॥
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