शिवम् स्वरूपं आदि है, सुन्दर रूप अनंत /
सत्य सदैव अंतस में, कहि गए साधौ संत /३५१ /
भावार्थ : -शिव आदि सवरुप में है, सुन्दर का रूप अनंत है / सत्य अंतसर्थात ब्रम्ह स्वरूप में है ऐसा अनुमान साधू संतों ने किया है //
माया ऐसी मोहनी, चित चेतस कर सेल /
अच्छे भले मानख कौ, कारे गदहे बैल /३५२ /
भावार्थ : -- माया का ऐसा धूर्त चरित्र है, कि वह बुद्धि-विवेक को जड़ अर्थात च्रेतना रहित करते हुवे अच्छे भले मनुष्य को गधा, बेल और न जाने क्या -क्या बना देती है,फिर तो ऐसे बैल और गधे जो मायाराम धोबी कहता है ,वही देखते/मानते हैं, वही सुनते हैं, और वही बोलते है //
जनम लहे तँह मारी गए, जाने केतक लोग /
उरले जेइ भोगे जग , अब ते जग रह भोग /३५३ /
भावार्थ : -- इस संसार में न जाने कितने ही लोग जन्म लिए और कितने ही मर गए / जिन लोगों ने पहले इस संसार को ( भरपूर ) भोगा था / अब यह संसार उन्हें भुगत रहा है //
ज्ञानवान गंध सरूप, पिपासु रस गहि बेल /
सेष सकल बलयित रूप, कारत तन अहि मेल /३५४/
भावार्थ : -- ज्ञान वान चन्दन के सदृश्य है, और जिज्ञासु रस ग्रहण करने वाली बेल के समान है / शेष सभी ने अपना तन लिपटे हुवे विषधर की आकृति का कर लिया है जो गंध-अमृत ग्रहण नहीं करते //
आखर जननी के सपुत, सब्द सूर समराट /
जोइ तापर आन चढ़े, सोइ उतारै घाट /३५५ /
भावार्थ : -- लेखनी का सुपुत्र है सम्राट शब्दवीर / जो भी उस वीर पर चढ़ाई करता है, उसे वह घाट उतार देता है //
अर्थात : -- "शब्द में ऐसी शक्ति होती है कि अज्ञानी को घाट उतार देता है और ज्ञानी को पार लगा देता है"
अरथ समरथ चाह करे तौ बन ब्यय कंजूस ।
हथ मैं लखि गहि रहे कर अपब्यय पर अँकूस /356/
भावार्थ : -- आर्थिक सामर्थ्य की अभिलाषा तभी पूर्ण होती है जब अर्थ का व्यय न्यूनतम हो, और अपव्यय किंचित भी न हो ॥
सागर सोहत घन करे घन जल कन बरसाए ।
खलिहन अन्नोपज धरे मनुज असन अन खाए /357/
भावार्थ : -- सागर मेघ देते हुवे ही सुशोभित होता है, मेघ जल के कण की वर्षा करता हुवा, सुशोभित होता है ॥
खेत, अन्न का उत्पादन करके सुशोभित होता है, और मनुष्य के भोजन में अन्न ही शोभनीय है ॥
बारिधि लहत बह बर्नसि नील बरन बर्नाए ।
तीर चलती एक युवती लहर चरन परसाए ।358।
भावार्थ : -- सागर में बहता लहराता जल, नीले रंग से चित्रित है । किनारे पर चलती एक युवती के चरणों को, उसकी लहरें स्पर्श कर रही हैं ।।
सैनी भै कि असैन भै मरता हो मरि जाए ।
जे गति उदन्त साधन पाए तेहि बीर कहलाए ।359।
भावार्थ : -- सैनिक हो या असैनिक हो कहीं मरता हो तो मर जाए । जिसकी पहुँच समाचार माध्यम तक है, वही वीरगति को प्राप्त होता है ।।
ऊपर गगन चित्र छितराए सरुवर दिस प्रतिबिंब ।
पिया मिलन बहुत मिठाए बिरहन करुबर निंब /360/
भावार्थ : -- गगन ऊपर चित्र प्रस्तारित है, सरोवर पर उसका प्रतिबिम्ब दर्शित हो रहा है । प्रियतम-मिलाप मधुर होता है, किन्तु विरह कड़वे नीम के तुल्य होता है ॥
सत्य सदैव अंतस में, कहि गए साधौ संत /३५१ /
भावार्थ : -शिव आदि सवरुप में है, सुन्दर का रूप अनंत है / सत्य अंतसर्थात ब्रम्ह स्वरूप में है ऐसा अनुमान साधू संतों ने किया है //
माया ऐसी मोहनी, चित चेतस कर सेल /
अच्छे भले मानख कौ, कारे गदहे बैल /३५२ /
भावार्थ : -- माया का ऐसा धूर्त चरित्र है, कि वह बुद्धि-विवेक को जड़ अर्थात च्रेतना रहित करते हुवे अच्छे भले मनुष्य को गधा, बेल और न जाने क्या -क्या बना देती है,फिर तो ऐसे बैल और गधे जो मायाराम धोबी कहता है ,वही देखते/मानते हैं, वही सुनते हैं, और वही बोलते है //
जनम लहे तँह मारी गए, जाने केतक लोग /
उरले जेइ भोगे जग , अब ते जग रह भोग /३५३ /
भावार्थ : -- इस संसार में न जाने कितने ही लोग जन्म लिए और कितने ही मर गए / जिन लोगों ने पहले इस संसार को ( भरपूर ) भोगा था / अब यह संसार उन्हें भुगत रहा है //
ज्ञानवान गंध सरूप, पिपासु रस गहि बेल /
सेष सकल बलयित रूप, कारत तन अहि मेल /३५४/
भावार्थ : -- ज्ञान वान चन्दन के सदृश्य है, और जिज्ञासु रस ग्रहण करने वाली बेल के समान है / शेष सभी ने अपना तन लिपटे हुवे विषधर की आकृति का कर लिया है जो गंध-अमृत ग्रहण नहीं करते //
आखर जननी के सपुत, सब्द सूर समराट /
जोइ तापर आन चढ़े, सोइ उतारै घाट /३५५ /
भावार्थ : -- लेखनी का सुपुत्र है सम्राट शब्दवीर / जो भी उस वीर पर चढ़ाई करता है, उसे वह घाट उतार देता है //
अर्थात : -- "शब्द में ऐसी शक्ति होती है कि अज्ञानी को घाट उतार देता है और ज्ञानी को पार लगा देता है"
अरथ समरथ चाह करे तौ बन ब्यय कंजूस ।
हथ मैं लखि गहि रहे कर अपब्यय पर अँकूस /356/
भावार्थ : -- आर्थिक सामर्थ्य की अभिलाषा तभी पूर्ण होती है जब अर्थ का व्यय न्यूनतम हो, और अपव्यय किंचित भी न हो ॥
सागर सोहत घन करे घन जल कन बरसाए ।
खलिहन अन्नोपज धरे मनुज असन अन खाए /357/
भावार्थ : -- सागर मेघ देते हुवे ही सुशोभित होता है, मेघ जल के कण की वर्षा करता हुवा, सुशोभित होता है ॥
खेत, अन्न का उत्पादन करके सुशोभित होता है, और मनुष्य के भोजन में अन्न ही शोभनीय है ॥
बारिधि लहत बह बर्नसि नील बरन बर्नाए ।
तीर चलती एक युवती लहर चरन परसाए ।358।
भावार्थ : -- सागर में बहता लहराता जल, नीले रंग से चित्रित है । किनारे पर चलती एक युवती के चरणों को, उसकी लहरें स्पर्श कर रही हैं ।।
सैनी भै कि असैन भै मरता हो मरि जाए ।
जे गति उदन्त साधन पाए तेहि बीर कहलाए ।359।
भावार्थ : -- सैनिक हो या असैनिक हो कहीं मरता हो तो मर जाए । जिसकी पहुँच समाचार माध्यम तक है, वही वीरगति को प्राप्त होता है ।।
ऊपर गगन चित्र छितराए सरुवर दिस प्रतिबिंब ।
पिया मिलन बहुत मिठाए बिरहन करुबर निंब /360/
भावार्थ : -- गगन ऊपर चित्र प्रस्तारित है, सरोवर पर उसका प्रतिबिम्ब दर्शित हो रहा है । प्रियतम-मिलाप मधुर होता है, किन्तु विरह कड़वे नीम के तुल्य होता है ॥
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