शनिवार, 3 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 34॥ -----

महल महल्ले छाँड़ कै साहन साह सिधाए । 
ता पर ठल्ले चाढ़ कै फतह निसान दिखाए /341/ 

फ़तह निशान = जीत का झंडा 
भावार्थ : -- चौंक प्रासाद छोड़ के सम्राट तो चल बसे । और निठल्ले उस पर चढ़ कर अपनी वीरता का प्रदर्शन करते हुवे  विजय पताका फहरा रहे है ॥ 

अर्थात : -- "आज की उपलब्धियों का कल कोई मूर्ख दुरुपयोग करेगा"   

 दाहिन मुगलइ बागिचा , बाएँ क़ुतुब की लाट /
किला चढ़ देखे बजीर, पिछ चोरों की हाट /३४२ /
भावार्थ  : -- दाहिने मुग़ल का बागीचा है, और बाएँ क़ुतुब ( किताब का बहु वचन ) की लाट लगी है //
पर वजीर (आजम ), किले पे चढ़ के पीछे के चोर-बाजार को ही देखते हैं //


सोए महला खाए भोज , फिरै उड़न खटोल /
सचिव लुचे लुठे जन फिर, तिन आदर दै बोल /३४३/
भावार्थ : -- महलों में सोते हैं और पकवानों का स्वाद लेते हैं, फिरते हैं जहाज़ों में /अवाम को नोचते हैं खसोटते हैं फिर इनको आदर दे दे को बोलो/ माने की 'श्रीमान मंत्री जी' और इनकी 'मति' जी //

कान काइदा तोरी कै, बादें जोरइ ज़ोर /
जाके बातिल बातिनै, वाके दौरा दौर /३४४  /
बादना = लड़ना
बातिल = झूठ
बातिन = अंतस
दौरा दौर = बोलबाला
भावार्थ : -- समस्त नियम निबंधों एवं सारी मर्यादा का उलंघन करके जो लड़ते बड़ी ज़ोर से हैं । और
जिनके अंतस में मिथ्या विराजित है वर्त्तमान में उसी का ही फैसन है ,अर्थात "झूठे का बोलबाला है और सच्चे का मुँह काला है"


महले यहँ महल्ले यहाँ, यहँहीं किला मनार । 
सो फ़नकारु चले गए, जो दिए तिन्ह निगार  /३४५ । 
भावार्थ : -- महल भी यहीं है, मोहल्ले भी यहीं है , क़िले और मीनार भी यहीं है । नहीं हैं तो वे फ़नकार जिन्होंने इन्हें सँवारा था ॥

अकिल पठाई खेह मैं , वाँ जा चरती घास /
बिना जिनावरि कोठरी, बाजैं शब्द समास  /३४६ /
भावार्थ : -- अक्ल  की गांय  को खेत भेज दिया वहां जाकर वह घास चर रही है  । अब बिना पशु की कोठरी अर्थात बिना बुद्धि का सिर भया यहाँ अब शब्द समूह आपस में लड़ रहे हैं //

बाला मजहब धता किये, पावन जाह जहान /
जीउत लग सौ सौ बरे, लिखे काइदा कान /३४७ /
भावार्थ : --संसार में पद-प्रतिष्ठा को प्राप्त करने हेतु , अपने कुल के धर्म का त्याग कर दिया । और अपने जीवन काल में  अनेकों धर्म का वरण कर फिर धर्मवालों के नियम कानून लिख रहा है ॥

हिंदी अरबी फ़ारसी, थोर थोर लै चूर । 
बना गुलाबी चूरमा, कह उर्दु मशहूर ।३४८। 
भावार्थ : -- हिन्दी, अरबी और फ़ारसी भाषा को थोड़ा तोड़ा ले कर उसे चूरा । जो भुरभुरा गुलाबी चूरमा बना उसे उर्दू-ए-मशहूर नाम दिया गया ॥

गराँ बार ज़रे पहरन, महले महल चुनाए । 
एक कफ़न सोइ महल्ले, मरे जनाज़ा जाए ।३४९।
भावार्थ : -- भारी भरी बहुमूल्य परिधान और और घर बनवाया सो वो महलों का महल । जब मर गए और जनाजा निकला  तो फिर एक कफ़न होकर, और महल्ला कौन सा? उही महलों का महल बाला ॥

काइदे  की किताब में, लिख्खा साफहि साफ । 
बिलग रहे हुकुमरानी, बिलग रहे इंसाफ ।३५०।  
भावार्थ : -- हिंदुस्तान के मौजूदा कानून की किताब में यह साफ़ साफ़ लिखा गया है, कि हुकूमत और इन्साफ जुदा रहें ॥  

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