देही दीपक ढारि कै , बर्तिक अंग बनाए /
भोजन तैलै डारि कै , जीवन बर बर जाए /३३१ /
भावार्थ : -- विधाता ने देह को दीपक की आकृति दी और अंगों को बाती के समरूप किया किया / और भोजन को तरल तेल का स्वरूप दिया / अब यह जीवन जल जल कर समाप्त हो रहा है //
राती भोजन खाइ जो, सो तो उदर समाए /
पुनह प्रभाति जाग कै, मति तिन कृतरत पाए /३३२/
भावार्थ : -- रात्रि में जिस भोजन-प्रसाद को पाया वह तो उदर में समा गया / जब प्रभात में पुनर्जागरण किया तो मस्तिष्क को भोजन-प्रसाद प्राप्ति के उद्देश्य में ही अनुरक्त पाया //
अर्थात : -- "जीवन को धनउद्देश्यों ( आधारभूत उद्देश्यों) के इतर परमार्थ कार्यों में भी अनुरक्त करना चाहिए"
साँस साँस संग सरीर, राखौ केतिक हेत /
छूट रही धीरहि धीर, जूँ मूठी भर रेत /३३३ /
भोजन तैलै डारि कै , जीवन बर बर जाए /३३१ /
भावार्थ : -- विधाता ने देह को दीपक की आकृति दी और अंगों को बाती के समरूप किया किया / और भोजन को तरल तेल का स्वरूप दिया / अब यह जीवन जल जल कर समाप्त हो रहा है //
राती भोजन खाइ जो, सो तो उदर समाए /
पुनह प्रभाति जाग कै, मति तिन कृतरत पाए /३३२/
भावार्थ : -- रात्रि में जिस भोजन-प्रसाद को पाया वह तो उदर में समा गया / जब प्रभात में पुनर्जागरण किया तो मस्तिष्क को भोजन-प्रसाद प्राप्ति के उद्देश्य में ही अनुरक्त पाया //
अर्थात : -- "जीवन को धनउद्देश्यों ( आधारभूत उद्देश्यों) के इतर परमार्थ कार्यों में भी अनुरक्त करना चाहिए"
साँस साँस संग सरीर, राखौ केतिक हेत /
छूट रही धीरहि धीर, जूँ मूठी भर रेत /३३३ /
भावार्थ :-- साँस से बंधा हुवा यह शरीर है, चाहे इससे कितना भी लगाव रखों / साँसे धीरे धीरे इस प्रकार छुट रही है मानो यह मुट्ठी भर रेत हो //
तापिन के भान न होए, जब रह सीत निवास /
सीतल के ज्ञान न होए, जब रह तापन बास / ३३४ /
भावार्थ : -- शीतल निवास में वास करने से तप्तकारी सूर्य के तपन का आभास नहीं होता /और स्वर्ण निवास में शीतलता का ज्ञान नहीं होता //
अर्थात :- अनुकूलित वातावरण में वास करने से सुख-दुःख में अंतर ज्ञात नहीं होता"
धरनिहि ताल समरुप है, गिन गिन के अवगाह /
अम्बर सिन्धु सरूप है, गाहन के नहि थाह / ३३५ /
भावार्थ : -- यह धरती ताल-सरोवर के समान है गिनती की ही डुबकियां लगाई जा सकती है किन्तु आकाश समुद्र के स्वरूप है जहां डुबकियों का कोई अंत ही नहीं //
अर्थात : -- "धरती का विचरण केवल तीन पदों में पूर्ण हो सकता है, किन्तु आकाश, अनंत है"
सदजन के सत्संग ते अनमोलक ना कोए ।
वाके परस प्रसंग ते लोहा सुबरन होए /336/
भावार्थ : -- सज्जनों के साथ से अनमोल कोई भी वस्तु नहीं है । सज्जन पारस के समतुल्य होते हैं, उनके साथ और स्पर्श से लोहा अर्थात अज्ञानी भी स्वर्ण अर्थात ज्ञानी हो जाते है ।।
अवनि अम्बर और अरन गतयत साधन तीन ।
बिरिधा बालपन जौबन जीउन त्रिबिध अधीन /337/
भावार्थ : -- धरती,आकाश और जल यातायात के ये तीन साधन हैं । बाल युवा और वृद्धावस्था स घिरा जीवन इन तीन विधाओं के अधीन है: -- भूत,वर्त्तमान, भविष्य
पितृ, मातृ, श्वसुर कुल
धर्म,अर्थ और काम
सत्त्व,रज और तमो गुण
व्युत्पन, जीवन और मरण
मधु पर्क मैं बोरी कै कटुक साँच कह राँच ॥
करू अर्क में घोरी कै मधु असाँच को बाँच /338/
भावार्थ : -- यदि कड़वे सत्य को मधु पर्क ( दुग्ध, दधि, घृत, जल और शर्करा का मिश्रण) में डुबो कर
काव्यात्मक शैली में कहें कहें तो वह प्रभाव छोड़ता है । यदि मधुर असत्य को व्यंगात्मक शैली में कहें तो वह अधिक प्रभावित करता है ॥
अनवसर पर मूक रहें, अवसर पर धुनि मान ।
बैनि भेद अचूक रहे, धरे तीख मुख सान /339/
भावार्थ : -- बिना अवसर के मौन रहना ही उचित है, अवसर पर मुखरित होना श्रेष्ठ है ॥ बाण के नोक को धार करे वाले पत्थर पर धार करके, एवं वाणी को सोच समझ कर बोला जाए तो बाण, बिना चुके लक्ष्य को प्राप्त होता है, और वाणी प्रभाव छोड़ देती है ॥
अकरमन की जात यही बिनु श्रम भोजन पाए ।
कोउ अवसर न बिसराए मरनी पर भी खाए /340/
भावार्थ : -- अकर्मण्य की यही पह्चान है कि वह, बिना श्रम के ही भोजन पाता है । कोई भी उत्सव, अवसर नहीं छोड़ता, मृत्यु भोज में भी खाने के लिए खडा रहता है ॥
तापिन के भान न होए, जब रह सीत निवास /
सीतल के ज्ञान न होए, जब रह तापन बास / ३३४ /
भावार्थ : -- शीतल निवास में वास करने से तप्तकारी सूर्य के तपन का आभास नहीं होता /और स्वर्ण निवास में शीतलता का ज्ञान नहीं होता //
अर्थात :- अनुकूलित वातावरण में वास करने से सुख-दुःख में अंतर ज्ञात नहीं होता"
धरनिहि ताल समरुप है, गिन गिन के अवगाह /
अम्बर सिन्धु सरूप है, गाहन के नहि थाह / ३३५ /
भावार्थ : -- यह धरती ताल-सरोवर के समान है गिनती की ही डुबकियां लगाई जा सकती है किन्तु आकाश समुद्र के स्वरूप है जहां डुबकियों का कोई अंत ही नहीं //
अर्थात : -- "धरती का विचरण केवल तीन पदों में पूर्ण हो सकता है, किन्तु आकाश, अनंत है"
सदजन के सत्संग ते अनमोलक ना कोए ।
वाके परस प्रसंग ते लोहा सुबरन होए /336/
भावार्थ : -- सज्जनों के साथ से अनमोल कोई भी वस्तु नहीं है । सज्जन पारस के समतुल्य होते हैं, उनके साथ और स्पर्श से लोहा अर्थात अज्ञानी भी स्वर्ण अर्थात ज्ञानी हो जाते है ।।
अवनि अम्बर और अरन गतयत साधन तीन ।
बिरिधा बालपन जौबन जीउन त्रिबिध अधीन /337/
भावार्थ : -- धरती,आकाश और जल यातायात के ये तीन साधन हैं । बाल युवा और वृद्धावस्था स घिरा जीवन इन तीन विधाओं के अधीन है: -- भूत,वर्त्तमान, भविष्य
पितृ, मातृ, श्वसुर कुल
धर्म,अर्थ और काम
सत्त्व,रज और तमो गुण
व्युत्पन, जीवन और मरण
मधु पर्क मैं बोरी कै कटुक साँच कह राँच ॥
करू अर्क में घोरी कै मधु असाँच को बाँच /338/
भावार्थ : -- यदि कड़वे सत्य को मधु पर्क ( दुग्ध, दधि, घृत, जल और शर्करा का मिश्रण) में डुबो कर
काव्यात्मक शैली में कहें कहें तो वह प्रभाव छोड़ता है । यदि मधुर असत्य को व्यंगात्मक शैली में कहें तो वह अधिक प्रभावित करता है ॥
अनवसर पर मूक रहें, अवसर पर धुनि मान ।
बैनि भेद अचूक रहे, धरे तीख मुख सान /339/
भावार्थ : -- बिना अवसर के मौन रहना ही उचित है, अवसर पर मुखरित होना श्रेष्ठ है ॥ बाण के नोक को धार करे वाले पत्थर पर धार करके, एवं वाणी को सोच समझ कर बोला जाए तो बाण, बिना चुके लक्ष्य को प्राप्त होता है, और वाणी प्रभाव छोड़ देती है ॥
अकरमन की जात यही बिनु श्रम भोजन पाए ।
कोउ अवसर न बिसराए मरनी पर भी खाए /340/
भावार्थ : -- अकर्मण्य की यही पह्चान है कि वह, बिना श्रम के ही भोजन पाता है । कोई भी उत्सव, अवसर नहीं छोड़ता, मृत्यु भोज में भी खाने के लिए खडा रहता है ॥
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