शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 32॥ -----

पहले न जहँ चरन धरे, तहँहूँ सीस नवाए /
माया रसरी घार नर, बाँदर नाच नचाए /३२१  /
भावार्थ : --पहले कभी जहां चरण भी नहीं टेके, वहां अब नत मस्तक हो रहे है / मनुष्य को जब माया की रस्सी बांधती है तो फिर बन्दर नाच नचवाती है //

भव सिन्धु सब डोब रहा, तैर सके तौ तैर /
तबही पार लगे जब हो, सदगुन के कर पैर /३२२/
भावार्थ : -- यह संसार रूपी सागर सब को डूबा रहा है यदि तैरने में समर्थ हो तो तैरो  / इसके पार तब ही लगा जा सकता है जब सन्मार्ग का आचरण किये हुवे चरण हों और सद्कार्य किये हुवे हाथ हों //

कोटिक कलुषित कार किए, बयस  सकल दिए काट /
पलक बिछाए जोह  रहा, मूढ़ सुरग की बाट / ३२३ /
भावार्थ  : -- अनगिनत पाप कर्म करते हुवे, सारी आयु यूं ही व्यतीत कर दी / अब पलक पाँवड़े बिछाए उत्तम गति की प्रतीक्षा कर रहा है //

अर्थात : -- "कुकर्म से उत्तम पद प्राप्त हो सकता है, किन्तु परमगति सत्कर्म से ही प्राप्त होती है"
 
जबलग सूर सीस लगे, तबलग जलज सुहाए /
ज्यूँहि पछ पछाँह पगे, त्यूँहि नैन मिचाए /३२४/   
 भावार्थ :-- जब तक सूर्य शीर्षोपर होता है तब तक वह कमल फूल को अच्छा लगता है / जैसे ही वह पश्चिम में अस्त हो जाता है , वैसे ही कमल पुष्प भी उसकी ओर से अपनी नयन मूंद लेता है //

अर्थात : --" स्वार्थी केवल धन-प्रसिद्धि स्वरूप प्रकाश के ही अभिलाषी होते हैं, मित्र के नहीं "   

बरे सरलतम आचरन, राखत सत के राख /
सुख दुख दोनौ में मगन, ते जन लाखन लाख /३२५ /
भावार्थ : -- सरलतम आचरण को वरण करते हुवे जो सत्य की रक्षा करता हो , और सुख -दुःख दोनों ही अवस्था में प्रसन्नचित रहता हो वह मनुष्य लाखों में दर्शनीय है //

पयस रुधिर दोउ रसाल माई देह सँजोय । 
जे जात गह पय कलाल हंस कहे सब कोय /326/ 

भावार्थ : -- माता अपनी देह में दुग्ध और रक्त दोनों रस रखती है । जो संतति केवल अमृत रस समान केवल दुग्ध ग्रहण करते हैं उनको सब कोई हंस कहते हैं ॥ 

भए सब जगजन आँधरे कलिजुग जब जग छाए । 
नीर छीर भेद न धरें चेत रहे उरगाए /327/ 

भावार्थ : --  जब संसार में समय विपरीत होता है, तो लोग अंधे हो जाते हैं । फिर उनका चित, अचेतन हो जाता है और वह  सत्य-असत्य में अन्तर नहीं कर पाता ॥ 

पयस रुधिर दोउ रसाल माई देह सँजोय । 
जे जात गह पय कलाल हंस कहे सब कोय /328/ 

भावार्थ : -- माता अपनी देह में दुग्ध और रक्त दोनों रस रखती है । जो संतति केवल अमृत रस समान केवल दुग्ध ग्रहण करते हैं उनको सब कोई हंस कहते हैं ॥ 

भए सब जगजन आँधरे कलिजुग जब जग छाए । 
नीर छीर भेद न धरें चेत रहे उरगाए /329/ 

भावार्थ : --  जब संसार में समय विपरीत होता है, तो लोग अंधे हो जाते हैं । फिर उनका चित, अचेतन हो जाता है और वह सत्य-असत्य में अन्तर नहीं कर पाता ॥ 

मो सम कोउ ना धनिक, प्रभु सम को ना दीन । 
भरे मुठ भीत पून अधिक करूँ प्रभु चरन अधीन /330/ 
भावार्थ : -- मुझसा कोई धनवान नहीं, और ईश्वर जैसा कोई निर्धन नहीं । मुट्ठी में पुण्य कुछ अधिक भरे हैं, उन्हें ईश्वर के चरणों में अर्पण करना चाहिए ॥  

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