राजू : -- मास्टर जी ! आप इ साड़ियाँ क्यूँ कट्ठी कर रहे हो ??
" राजू ! कल फिर वजीरे-आजम की ख़ामोशी की मौसी मरने वाली है"
राजू : -- हाँ तो, मास्टर जी !
" राजू ! हा तो का, कल फिर जाने केतने प्रश्नों का चीर हरन होएगा "
राजू : -- हाँ तो उनकी मैया ने नाम रखा है ना 'मोहन'….. लाज बचाने के लिए ही तो रखा है न मास्टर जी !
"राजू ! उ तो आँखी के अंधे औउर नाम नयन सुख हैं, इ सामान्य जनता ही जनार्दन है, इ ही लाज बचाती आई है और इ ही बचाती रहेगी"
राजू : -- मास्टर जी ! हम तो कहते हैं कल उ मौसी न ही मरे तो अच्छा है.....पड़ोसी देखते हैं तो बहुंत लाज आती है.....
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