शनिवार, 31 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 65॥ -----

बसै भीतर धौर हरा, मति मत ना बिकसाए । 
पहिनै कोमली कापरा, सदजन ना कहिलाए ।६५१। 
भावार्थ : --  बहु खंडी भवन एवं अट्टालिकाओं में निवास करने से विचार वर्द्धित नहीं होते । और बहुमूल्य वस्त्र धारण कर लेने ही से कोई चरित्रवान नहीं कहलाते ॥

काया बिधि करि थर चरी, माया जर न सुहाए । 
अंत समय पर मीन सम, छाँड़त तड़पत जाए ।६५२। 
भवार्थ : --विधाता ने इस काया को थलचर स्वरूप में रचा है इसे काया( भोग विषयों की साधन स्वरूपा, अति मोह)  रूपी जल नहीं सुहाता । जब अंत समय आता है तो मछली के जैसे इस माया रूपी जल को छोड़ते हुवे यह काया तडपती हुई जाती है ॥

काल कल्पना कार  पर काल जिआ ना जाए । 
सूर चंद्र निसदिन उगैं, काल आए ना आए ।६५३। 
भावार्थ : -- और इस कल की केवल कल्पना ही की जा सकती कल में जिया नहीं जा सकता । जैसे सूर्य चंद्रमा तो प्रत्येक दिन उदय होंगे यह कल्पना है किन्तु ये आँखें कल उन्हें देख पाएं या न देख पाएं, यह यथार्थ है ॥

पाछे त बहु लेख लिखे आगिन पारत काएँ । 
पाछे लेख सुमिरत कर आगिन बाढ़त जाएँ |654| 


भावार्थ : -- जब पीछे इतने लेख लिखे हैं, तो आगे क्यों रच रहे हो ? पीछे के लेखों का स्मरण कर के ही आगे बढ़ना चाहिए ॥ 

नारी नयन पीर भरी नीर भरी उरसीज । 
दोषु धनु के तीर धरी पौरुष तन के रीझ ।655।  

भावार्थ: -- नारी की आँखों में पीड़ा और स्तनों में पीयूष भरा है । और पुरुष, दोषों के धनुष-बाण रखे केवल नारी तन के प्रेमी हैं ।। 

बरन बरन के बरन लै रचि पचि कोटि पचास । 
चित्र काब्य कर पटी पै तै चौखट दे कास | 656|

भावार्थ : -- विभन्न प्रकार के अक्षर/रंग/स्वर लेकर उन्हें पचास बारी गढ़-छोल । चित्रपटी पर चित्र रूपक काव्य कर फिर उसे चौखट में चढ़ा ॥ 

कनक कलस कटि बिराजे उदके उद के अंक ।
जहँ उदके ऊत राजे तहँ उद बिदके रंक ।657। 

भावार्थ : -- स्वर्ण कुम्भ से सुशोभित कमर, पानी के आलिंगन हो उत्साह अतिरेक से उछल रही है । जिसे देखकर जैसे ही मुर्ख राजा उछला, वैसे ही प्रजा उठ कर भाग गई ।।  

किरन पानी परसन ते भै कन कंचन धार । 
एकु गाँछ के नैया रे खेवे खेवनहार |659|

भावार्थ :-- सूर्य के स्पर्श से या किरणों द्वारा पानी के स्पर्श से बिंदु-धारा स्वर्णिम हो उठी । पेड़ के एक ही तने से बनाई गई नाँव को नाविक नाव चला रहा है ।। 

जे जल जन तप धन तरे सुथरे मुकुतिक संग । 
चढ़े गगन घमंड भरे उतरे रज कन अंग |660| 


भावार्थ : -- जो मनुष्य नीचे जल के सदृश्य  मोती  के  समान स्वच्छ चरित्र वाले सज्जन के साथ रहते हुवे ताप
रूपी धन पा जाते है वे फिर  अम्बर पर चढ़े बादल के समान  घमंड  से  भरे  धूल  से  लिपटी बूंद के सदृश्य निकृष्टता प्राप्त कर नीचे उतरते हैं ।।  



शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 64॥ -----

धन धाम रतन दीप धर, मत कर रे अभिमान । 
मनि कंचन स्यामल सर, सब पाहन की खान /६४१ /
भावार्थ : -- धन संपदा एवं रत्नों के दीपक धारण करने वाले रे धनवान , तू इन पर अहंकारमत कर । क्योंकि ये नीलम ये हीरे मणि और यह स्वर्ण सब ही पाषाण खनिज होकर पाषाण का स्वरूप ही हैं ॥

चार दिवस किए आरती, चारि दिवस बैठाए । 
माटी केरी मूरती, माटी  माहि सिराए । ६४२। 
भावार्थ : -- और इस काया का क्या अहंकार, यह तो इस संसार में चार दिन के लिए ही स्थापित हुई है जिसकी चार दिन की ही आरती है, यह पञ्च भूत से निर्मित मूर्ति है, अंत में इसका विसर्जन पञ्च भूत में ही होना है॥

धन संपद सम संखिया, सकेर धरि बिष मान । 
पर जे सोध सुधित धरि, होत औषध समान ।६४३। 
भावार्थ : -- धन संपदा संखिया ( एक अति प्रभावकारी तीक्ष्ण विष, जो एक उपधातु है) के समतूल होती है, भौतिक जगत को कष्ट पहुंचाते हुवे इसका संग्रह किया जाए तो  यह विष के समरूप कार्य करती है । यदि इसे संशोधित स्वरूप में अर्थात धर्म के मार्ग पर चलते हुवे, नीति पूर्वक कार्य करते हुवे 'केवल जीवन निर्वाह के निमित्त' चित्त में ऐसी अवधारणा की जाए तो यह औषधि का कार्य करती है ॥

धन के लाखौ गुन लखन, जग मैं रहे न थाए । 
जे पद चरे धर्म चरन, तेइ बड़ाई पाए । ६४४। 
भावार्थ : -- धन अर्जित करने के चाहे लाखों गुण या लक्षण हों इस संसार में वे स्थाई नहीं रहे । जिन चरणों ने, धर्म के मार्ग का अनुकरण किया, उनके ही गुण आचरणों ने संसार में प्रशंसा प्राप्त की ।

मानस मनस बिचार भित, जे भए बिषय बिकार । 
साँच राँच औषधि आँच, करें सकल उपचार । ६४५। 
भावार्थ : -- रे मनुष्य  तेरे मन में उत्पन्न हो रहे विचारों के भीतर यदि विषय सम्बंधित दोष है तो उसकी भी औषधि है सत्य में लीन होकर विचारों को उसकी आंच में तपाते हुवे समस्त दोषों का उपचार कर ॥

पी प्रबसे सागर पार मैं रहि पंथ निहार । 
धार धरी ऊपर धार सखि मैं कवन अधार |646| 

भावार्थ : -- प्रियतम विदेश में प्रवासित है और मैं आगमन की प्रतीक्षा में हूँ । धारा के ऊपर धारा है, हे ! मित्र, मैं किस के आधार रहूँ ॥ 

रल बल रैन सकल रई कल दीपक के अंग।  
बर्तिक बर के मर गई यस कर धरे पतंग |647|  

भावार्थ : -- कल दीपक के साथ राग मग्न हो सारी रात लिपट कर एक में मिली वर्तिका जलकर मर गई, कीर्ति पतंगा की हुई  ॥ 

अर्थात : -- "श्रम कहीं और होता है, यश कहीं और"

कमल को मल कीच भरे मल कहँ मल नहि कोय । 
कमल कोमल नीच धरे जल महँ जल नहि धोय |648| 

भावार्थ : -- कमल का मर्दन कर कीचड़ से भरे दुष्ट कहते हैं कि यहाँ कोई दुष्ट नहीं है । कोमल कमल के ही नीचे जल में ही स्थापित है फिर भी उन्हें जल नहीं पाता ॥ 

अर्थात :--  "अपने मुख से अपनी ही प्रशंसा करना दुष्ट का स्वभाव होता है"

ज्ञान रहित का बर्तनी, जनु दीपक बिनु तेल । 
तैल दै  ते बर्ति बरी, बर्तनी ज्ञान मेल |649| 

भावार्थ : --ज्ञान रहित वर्तनी का क्या औचित्य है, तेल के बिना दीपक का क्या औचित्य है । तेल दान से दीपक की वर्तिका प्रज्वलित होती ज्ञान के मिलान से वर्तनी प्रज्वलित होती है ॥ 

चली चलत चित्रपट बनी, बनी ठनी इतराए ॥ 
दोए टका की ढेंपनी लाख टकै बिक जाए |650|  
 
भावार्थ: -- चल चित्रपट की वनस्थली में, वेश विभूषित होकर घमंड करती निम्न मुल्य की गठरी(packet) का भी अधिक मूल्य प्राप्त हो जाता है..... 

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 63॥ -----,

रोष हुँते सर्बस बरे , अहहैं औषध देर । 
जीउ हुँत जस संखिया, हत निज गुरु रुख फेर ।६३१। 
भावार्थ : -- "क्रोध की सर्वोत्तम औषधि है : -- विलंब "
                  ----- ॥ सेनेका ॥ -----
"क्रोध का क्रम आत्म गौरव हेतु घातक है, जैसे जीवन हेतु संखिया "
       ----- ॥ जे.जी. हालैण्ड ॥ -----
संखिया = एक बहुंत तीव्र एवं प्रभावकारी विष जो एक उपधातु है ।

 संचइ सदैव रहि नीच , दानी पद रह ऊँच । 
सागर सदा रहे धरा, बादर गगन पहूँच ।६३२। 

"स्थितिरुच्चै: पयोदानां पयोधीनामध: ॥ " 
   ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- संचय करने वाले का स्थान सदैव नीचे होता है और दानवान का पद ऊंचा रहता है । जिस प्रकार सागर की स्थिति अधर में होती है और बादल ऊँचे गगन पर स्थित होता है ॥

साँच सदैव भयऊ जइ, असंच अहहैं नाहि । 
ज्ञान जान बिस्तार लै, सांच के पंथ माहि । ६३३। 

"सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयान:। "
   ----- ॥ मुंडकोपनिषद,६ ॥ -----
भावार्थ : - और सत्य की सदैव जय होती है असत्य की नहीं होती, सत्य के मार्ग पर ही ज्ञान के विमान का विस्तार होता है ॥

औषधी तिन पौध कहें, एक फर फुरत सिराएँ । 
बनस्पति तिन औन रहें, बारहिं बार फराएँ । ६३४। 
      ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- औषधि उन पादपों को कहते हैं जो एक बार में फुल फल कर समाप्त हो जाते हैं जैसे : --गेहूँ चावल,दाल आदि के पौधे । और इस भूमि पर वनस्पति  वह पादप हैं जो बार बार फलीभूत होते हैं : -- जैसे विभिन्न प्रकार के फलदार वृक्ष एवं पौधे ॥

तरु धरा नद नग नद पति, सर्बस अग जग जेह । 
ससि सुर जल मलयनिलादि, सकल जोइ प्रभु देह । ६३५।  
  -----॥ भागवत कथा ॥ -----
भावार्थ : -- पृथ्वी, ये द्रुमषंड, यह नदी, यह पर्वत और नदनाथ, समस्त चर-अचर । वो शशी,सूर्य, ये जल और मलयानिल आदि सभी ईश्वर की ही देह है ॥

बारह गाँव का चौधरी तेरह गाँव नौराए । 
अपने काम न आए तो ऐसी ऐसी तैसी जाए ।636। 
      ----- ॥ अज्ञात ॥ -----              

भावार्थ -- बड़ा हुवा-तो क्या हुवा,  अपने काम का नहीं, तो व्यर्थ है.....

करें न पतन आपन हुँत, करें आप उद्धाप । 
मानस आपन मित आप, अरु रिपु आपहि आप । ६३७। 
 ----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ६ /५॥ -----   
भावार्थ : -- अपने द्वारा अपना उद्धार करें, अपना पतन न करें । क्योंकि ( मनुष्य) आप ही अपना मित्र है, और आप ही अपना शत्रु है ॥ 
 ----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ६ /५॥ -----   
भावार्थ : -- मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करें, पतन न करें । क्योंकि वह ( मनुष्य) आप ही अपना मित्र है, और आप ही अपना शत्रु है ॥ 

पञ्च बदन दस बाहु दल, एक उदर दोइ पाद । 
भगवद गीता के पाठ, मूरत प्रभु संवाद । ६३८। 
      ----- ||पद्म। उत्तर १७१/२७-२८ ॥ -----
भावार्थ : -- पांच अध्याय पञ्च मुख के सदृश्य हैं, दस अध्याय दस भुजाओं का समूह है , एक अध्याय क्रमश: उदर है  दो अध्याय चरणाकृति होते हुवे श्रीमद्भगवद्गीता के अष्टादस अध्याय ईश्वर की वाङ्ग्मयी मूर्ति है ॥ 

भावावेस भयभीते, रुग्नाल्प बय काल । 
अबूझ उन्मत जड़बुद्धि, निषिद्ध देवन दान । ६३९ । 
 ----- ॥ गौतम धर्म सूत्र  ५/२ ॥ -----
भावार्थ : -- भावावेश, भय भीत होकर, रुग्णावस्था में, अल्पावस्था में, मुर्खता वश, उन्मत्त या अचेतन स्थिति में,
दान देना निषिद्ध होता है ॥ 

जस पुरातन बास तजत, गहत मनुज नउ बास । 
तेसेइ अंतरात्मन, गह नउ देह निवास । ६४० । 
 ----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता २ /२२ ॥ -----
भावार्थ : -- जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है । उसी प्रकार यह अंत:करण भी पुराना शरीर त्याग कर नयाशरीर धारण करता है ॥  

----- ॥ दोहा-दशम 62॥ -----

धृति छम दम सौच संयम, अचौर बिधा बिबेक । 
सत अरुख दस लखन धर्म करि मनु स्मृति उलेख ।६२१। 
भावार्थ : -- धृति, क्षमा , दुराग्रह का दमन ,पवित्रता, इन्द्रियों का संयम , विवेक , सत्य और अक्रोध  ये धर्म के दस लक्षण हैं मनु स्मृति  (अध्याय ६, श्लोक ९२) में जिसका उल्लेख मिलता है ॥

किन्ह बरनत दीन कहें, किन्ह धनिक परिभाख। 
भए सब भिखिन भव भोगन, भूखे  निज अभिलाख । ६२२।  
भावार्थ : -- दीन रूप में किसका वर्णन करें, किसको धनिक स्वरूप में परिभाषित करें, लोकिन सुखों को प्राप्त करने हेतु यहाँ सभी भिक्षुक हो गए हैं, जो अपनी अपनी अभिलाषाओं के भूखे हैं ॥

धरा धरे फुहारी जूँ, अर्थ औषध सार । 
जूँ धरि धाराबिष त्यूँ, धारे बिष अनुहार । ६२३।   
भावार्थ : -- जिस प्रकार धरती वर्षा की फुहारों को धारण कर जीव धारियों का संरक्षण करती है उसी प्रकार हमें अर्थ को औषधि स्वरूप में ही ग्रहण करना चाहिए । और जिस प्रकार अति वृष्टि विष बनकर धरती के जन जीवन को नष्ट कर देता है,  उसी प्रकार अति अर्थ को भी विष के समान ही समझना चाहिए ॥

भोग बिषय को परिहरत,खेवाई करत खटाव |
भव सिन्धु खे पार चरें, चढ़त जीउ की नाव । ६२४। 

भावार्थ : -- सांसारिक भोगों का परित्याग कर संचालन कर्म से प्राप्त पारिश्रमिक का केवल जीवन निर्वाह हेतु प्रयोग करते हुवे हमें इस आत्म तत्त्व को प्राप्त जीवन रूपी नौका को संचालित करते हुवे इस संसार से पार पाना चाहिए अर्थात परम गति प्राप्त करना चाहिए । 

कर सोंहें कारत करम, धरम चरण पद चार । 
लाहे परिफल कर कलस, चित दें सोंह उदार । ६२५। 
भावार्थ : --  हाथ कर्म करते हुवे शोभायमान होते हैं। चरण, धर्म लक्षणों ( मनु स्मृति के अनुसार दस : -- धृति,क्षमा,दुराग्रह का दमन,अचौर्य,पवित्रता,इन्द्रिय का संयम,विवेक,विद्या,सत्य,और अक्रोध)  के मार्ग पर चलते हुवे शोभायमान होते हैं । उक्त आचरण से करतल में जो प्रतिफल प्राप्त हो, चित्त उसे उदारता पूर्वक दान देते हुवे शोभायमान होता है ॥ 

निरख तरी के कमल सुम आलबाल तरिआए । 
निरखे गहन घुमर घूम कीच तरी महँ पाए |626| 
भावार्थ : -- धरती के कमल-पुष्पों को देखकर बादल गहरा गए  । घुमते हुवे जब गहराई में जाकर देखा तो कीचड़ ही पाया ॥ 

अर्थात : --"प्रत्येक चमकती हुई वस्तु, सोना नहीं होती" 

दाना दाना खोय कै सोचे चिरी मुँडेर । 
जों पहुंची मैं नीड पै चुन चुन लेंगे घेर |627|  

भावार्थ -- दाने खो कर चिड़िया छत पर बैठी चिड़िया सोच रही है । जैसे ही मैं अपने घोंसले में जाउंगी,  तो भूखे बच्चे मुझे घेर लेंगे ।। 

सूरज फेरे फेर लै, धरनी रोली गोल । 
तू भी तेरह घेर लै, ता फिर रद पटि खोल |628|  
 
भावार्थ: -- बार-बार सूर्य के चक्कर लगा कर पृथ्वी ने गोल आकृति धारित की है । तू भी जीभ कि परीक्षा कर, तत पश्चात वाचन कर ।। 

अर्थात : -- "संतुलित पृथ्वी के जैसे, वाणी भी संतुलित होनी चाहिए" 

कारे कारज कारि कै धवलित दधि जे सार । 
कारी मटुकी धारि के लटकी देस बहार |629| 

भावार्थ : -- कलुषित कर्म के द्वारा , श्वेत मक्खन निकाला । काले कुम्भ में भर कर देश के बाहर लटका दिया ॥ 

अर्थात : -- "संचयित कलुषित धन,  देश वासियों का ही श्रम धन है"

दिया बर्ति प्रिया प्रीतम प्रीत घीउ की धार । 
बारे सार सकले तम जीवन जोत उजार ।630|

भावार्थ : -- दीपक प्रियतम रूप और वर्तिका प्रियतमा स्वरूप  है  प्रेम घृत की धारा के सरिस है प्रज्वलित करने पर जीवन ज्योति का उजाला, फैले हुवे अँधेरे को समेट लेता है ॥ 

अर्थात : -- "प्रेम में ही जीवन की संकुलता है" 



बुधवार, 28 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 61॥ -----

दान देई किन्ह देस , अरु देई किमि काल । 
जँह भूरि भूत सुभ करे, परि बस्तु के अकाल । ६११ । 
भावार्थ : --  शास्त्रों में यह प्रश्न किया गया है कि दान किस स्थान में, किस समय, और किसको दें  कि वह दायन पश्चात अतिशय फलीभूत हो ।  जिस स्थान में पञ्च भूत( अवनी, अग्नी, अनिल, अंबु, अम्बर) एवं उसके यौगिक का अधिकाधिक कल्याण हो, और जहां किए गए दान की विषय-वस्तु का अभाव हो, दान देना वहीँ उपयुक्त होता है ॥

सुख-दुःख अरु भाउ अभाउ, पाप पुण्य दय दान  । 
प्रसंगासंग के रंग, मानख धर्म अधान ।612|  
भावार्थ : -- सुख -दुःख और भाव-अभाव, पाप-पुण्य, और दया-दान प्रसंग-वियोग आदि विषय मनुष्य के प्रकृति अथवा उसके स्वभाव पर धारित होते हैं ॥

झीनी रेल बिठाइ के, कालीकट पहुँचाए । 
सिहासन लिपटाई के, मोटी माया भाए |613| 

भावार्थ : -- मन की आसक्ति स्वरूप सूक्ष्म माया से नाता तोड़ लिया । और धन-संपत्ति, पुत्र, घर-द्वार आदि स्वरूपी मोटी माया को सिंहासन के लोभ में ह्रदय में रखा ॥ 

आसा श्रद्धा साम छम, धरम चरन गुण शील । 
जँह जे रासि तँहहि कासि, करीषिनी कर कील ।६१४। 
भावार्थ : -- आशा,श्रद्धा, शान्ति, क्षमा, धरम के चार चरण ( रा.च.मा. अनुसार : -- सत्य ,शौच,दया और दान ) सद्गुण एवं सदाचार । जहां ये राशि स्थित हो वहीं लक्ष्मी का रश्मि-स्तंभ प्रकाशित होता है ॥

मानस भूइ भव सागर कैसे आवत जाए । 
जैसे दीपक तैल धर बर्तिक जरत सिधाए ।615। 

भावार्थ : -- मनुष्यजाति, धरती के सांसारिक सागर में जन्म ले कर कैसे मरता है । जैसे दीपक के तेल में वर्तिका जल कर मर जाती है ।।
    
अर्थात: -- "जीवन नश्वर है" 

सिर पर धारे चौतनि देख रही का झाँक ।
तन पे ऐतक जोबनी जोर लगा के ढांक ।616। 

भावार्थ: -- सिर पर टोपी रख कर, मत झांको । तुम इतने युवा हो, जोर लगा के कूद जाओ ।। 

कँधे ढारि लाली चुनर गोरी केस नियास । 
सोन नदी के तट खड़ी पिया मिलन की आस ।617।  

भावार्थ : -- कंधे पर लाल ओढ़नी डाल कर, केश विन्यासित कर । स्वर्ण नदी के तट पर प्रियतमा, प्रियवर के मिलन की आस में खड़ी है ॥ 

गगन नगन नख नग धरै अनगन जन धरनि धर । 
तमोध्न ही तमस हरै तमोगुन तेजस हर |618| 

भावार्थ : -- गगन में अनगिनत तारे हैं, धरती पर अत्यधिक मनुष्य हैं । एक सूर्य और एक चन्द्रमा, अन्धकार को नष्ट कर देते है अज्ञानता को नष्ट करने के लिए भी,  एक ओजस्वी पर्याप्त है ॥  

काल कलुषित करनी कर जोड़ी कलुष कमाए । 
कमाए दुज धर मरन पर करनी सागे जाए |619| 

भावार्थ:-- पापयुक्त, निकृष्ट कर्म कर काले धन का संचय किया मृत्यु पश्चात धन किसी दुसरे के पास चला जाता है, किन्तु करतूतें स्वयं  के साथ जाते हैं ॥ 

अर्थात :-- "व्यक्ति के कर्म ही उसके जीवन एवं मृत्यु की दशा तय करते हैं"  

बैठ भंडिरा चौंक पै सजन सँदेस सुनाए । 
गोरी घूँघट औंट कै होरी होरी गाए |620|    
 
भावार्थ : -- पत्रवाहक चौराहे पर बैठ कर प्रियतम का सन्देश सुना रहा है । और प्रियतमा घूँघट कर होली है! होली है! कह रही है ॥   






मंगलवार, 27 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 60॥ -----

नयन देव संत दरसन, करनन हुँत श्रुत साँच । 
चितबन हुँत चिंतन मनन, मुख हरी बरनन बाँच ।६०१। 
                          ( दानमहिमा -अंक से साभार ) 
भावार्थ : -- नयन देव एवं संतों के दर्शन हेतु है, दोष दर्शन हेतु नहीं, कर्ण  सत्य श्रवण हेतु है कामुक वार्ता हेतु नहीं । चित्त चिंतन मनन हेतु है अचिंत हेतु नहीं, और मुख ईश्वर की वर्ण-व्याख्या हेतु है व्यर्थ प्रलाप हेतु नहीं ॥

भोगरत हुँत बिषय दमन, हिंसक दय आचार । 
सँजोइ हुँत दानाचरन, भए सुख के आधार ।६०२।
                            ( दानमहिमा -अंक से साभार )  
भावार्थ : -- भोगों में अनुरक्त मनुष्य हेतु इन्द्रियों इन्द्रियों का दमन, हिंसक मनुष्य हेतु दया का आचरण संग्रही मनुष्य हेतु दान व्यवहार सुख प्राप्ति  के आधार होते हैं ॥

सोह सासन सेवाजन , सोहत मुख भगवान । 
सोह सरीर सील चरन ,हाथ आचरन दान ।६०३।  
                           ( दानमहिमा -अंक से साभार )  
भावार्थ : -- शासन, जनसेवा करता सुशोभित होता है, दान-फान नहीं, मुख पर ईश्वर का श्री नाम ही सुशोभित होता है नेताओं-अभिनेताओं का नहीं, शरीर पर शील आचरण ही शोभा देते हैं टाई-फाई नहीं, और मनुष्य के हाथ दान देते हुवे सुशोभित होते हैं,दान लेते हुवे नहीं ।


तापस चरन दोष रहित, तोखित श्रमी उदारि । 
जेइ जन चिद गगन गहित, तेइ दान अधिकारि ।६०४।   
    ----- ॥ दान की महिमा -अंक से साभार ॥ -----
भावार्थ : --  दान का सुपात्र कौन है ? : -- जो व्यक्ति तपस्वी हो, दोष अर्थात अपराधिक कृत्यों से रहित हो,संतोषी हो,परिश्रमी हो, उदार आचरण वरण किये हो, और जो आत्म ज्ञानी हो वही दान हेतु सुपात्र है,अपात्र  के अभाव में दान नहीं करना ही श्रेयष्कर है ॥

टीका : -- "असमर्थ को केवल रक्षा मात्र के लिए आवश्यक वस्तु देनी चाहिए"

बिथुरन को कँह परिहरन, बियवन को कह दान । 
जे बिषय असुभ असुन्दर, जे सुन्दर कल्यान ।605।  
----- ॥ दान की महिमा -अंक से साभार ॥ -----

भावार्थ : --  बिखराने अथवा फेंकने को त्याग कहते हैं, बोने को दान कहते हैं ॥ अशुभ एवं असुंदर का त्याग की विषय वस्तुएं हैं, शुभ एवं सुन्दर दान की विषय वस्तुएं हैं  जैसे : --माया ( भोग विषयों की साधन स्वरूपा) कुरूप एवं अकल्याणकारी है, अत: उसका त्याग करना ही श्रेष्ठ है ।  श्री अर्थात लक्ष्मी सुन्दर है अत: उसका दान करना श्रष्ट है ॥

अज्ञानी दे ज्ञान भला संचय धन दै दीन । 
कल कल जल भए निरमला रोके भयउ मलीन  |606| 
भावार्थ: -- विपन्न को संचयित ज्ञान और धन का दान करना ही अच्छा है ।क्योंकि बहता हुवा पानी सदैव शुद्ध रहता है, और रोकनेसे वह अशुद्ध हो जाता है ॥ 

पवन पावत पाँख उरे जल पाए तिरे मीन । 
थल धावत सिंग दूरे मानस साधन तीन |607| 

भावार्थ  -- पक्षी,वायु की में गमन करते हैं, मछली पानी में । शेर, स्थल पर गमन करता है, मनुष्य इन तीनों 
साधनो से गमन करता है ॥ 

अर्थात -- "बुद्धिमता के बल से दुर्गम मार्ग भी सुगम हो जाता है"

पवन पावत पाँख उरे जल पाए तिरे मीन । 
थल धावत सिंग दूरे मानस साधन तीन |608| 

भावार्थ  -- पक्षी,वायु की में गमन करते हैं, मछली पानी में । शेर, स्थल पर गमन करता है, मनुष्य इन तीनों 
साधनो से गमन करता है ॥ 

अर्थात -- "बुद्धिमता के बल से दुर्गम मार्ग भी सुगम हो जाता है"

चोर चारन रैन भली, माँग भली रह बैन । 
प्रीति प्रतीति नैन भली लाग भली रह सैन |609| 

भावार्थ: -- चोरी के लिए रात्रि की आवश्यकता होती है, मागने के लिए वाणी की आवश्यकता है । प्रेम के लिए आखों  में  विश्वास  की  आवश्यकता है,लड़ाई के लिए सेना की आवश्यकता होती है ॥ 

आलू सब साक साजे बैगन बेगुनी गिन । 
आम कहँ सब फलराजे पर मिलत दिवस तीन |610| 

भावार्थ: --आलू सभी शाक में लगता है बैगन में कोई गुन नहीं है(फिर भी इस के सिर पर ताज सजा है ) आम को सब फल का राजा कहते है, किन्तु तीन मास ही फलता है ॥ 

अर्थात : -- "गुणों की गणना स्वरूप से नहीं, अपितु चरित्र से होती है"






सोमवार, 26 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 59॥ -----

अन धन भू गौ जल अंग, जीवन छम श्रम ज्ञान /
दाता तेइ कर देइए, लेइ जोग जे दान /५९१ /
भावार्थ : -- अन्न दान, धनदान , भूदान, गोदान, जलदान , अंगदान, जीवनदान ,क्षमादान , श्रमदान ,ज्ञानदान,
आदि दान दाता को उसी के हाथ में देना चाहिए जो इन्हें लेने के योग्य हों ॥

 कहि गए बिरध दान महिम, कनिआ मुकुती सीप ।
जेइ दान माटी मिले, लेइ चुल्हा लीप । ५९२ । 
भावार्थ : -- बड़े वृद्ध दान की महिमा का वर्णन इस प्रकार कर गए कि कन्या घर में मोती रूप है जो  दान देने पर सीप स्वरूप हो जाती है । यदि दान में मिट्टी भी मिले तो वह चुल्हा लीपने के काम आती है अर्थात दान में मिली कोई भी वस्तु व्यर्थ नहीं जाती ॥

भरत देस जे संस्कृति, कनिआ लाकह्मी रूप ।  
पालक करत पानि दान, मान बर हरि सरूप ।५९३। 
                  ( दानमहिमा -अंक से साभार )  
भावार्थ : --भारत देश की यह संस्कृति है कि यहाँ कन्या को लक्ष्मी का रूप माना जाता है । माता-पिता अथवा अभिभावक , वर को विष्णु का स्वरूप मान कर ही कन्या का पाणि-दान करते हैं ॥

तजन वंत की दीनता, दानी के दिए दान । 
बास बसन तापस चरन, के न करै अपमान ।५९४। 
भावार्थ : -- त्यागवान  की दीनता और दानी के दिए हुवे दान का, तपस्वी के वेश-भूषा का अपमान नहीं करना चाहिए ॥

पाहुन को तौ हरि कहें, अमृत कहँत नद नीर । 
कैसे जे जन भारती, सागर को कँह छीर ।५९५। 
भावार्थ : -- अतिथि को तो भगवान कहते हैं, नदी के जल को अमृत कहते हैं । ये भारतीय लोग कैसे नमूने हैं जो सागर को क्षीर कहते हैं ॥

टिप्पणी : -- भारत वर्ष के आदि पुराणों में सागर को क्षीर कहा गया । क्यों कहा गया ? .....तब के लोग अंधे तो थे नहीं.....क्षीर जैसा दिखता होगा जभी तो कहा गया..... विधमान में कैसा दिखता है?.....नीला.....फिर ऐसा क्या भौगोलिक परिवर्तन हुवा कि सागर नीला दिखाई देने लगा.....

दिए धूम काल दरस पर, लेखे उजबल लीख । 
दिरिस रंजन अंजन किए, दरस जोत करि तीख ।५९६। 
भावार्थ : --  धुआँ काला दिखाई देता है किन्तु, वह लेख बहुँत उज्जवल लिखता है । यदि उसका अंजन बना कर दृष्टि को रंजित कर दें तो फिर वह दर्शन ज्योति को तीक्ष्ण कर देता है ॥

जान बूझ के गढ गिरे दूज अबूझ खुदाए । 
अजान के अंधेर घिरे निकसे कौन उपाय |597| 

भावार्थ : -- ज्ञानी होकर, अज्ञानी के खोदे हुवे गड्ढे में गिरने का अर्थ  अज्ञान  के  अँधेरे  में  घिरना  है फिर ऐसे व्यक्ति के बाहर निकलने का कोई उपाय नहीं है ॥ 

सोए अँख मुँदी रैन भर मानुज मरनि समान । 
चरन मुख आछादन कर ओड़ी चादर तान |598| 

भावार्थ : --आँखे बंद कर रात भर सोया हुवा मनुष्य मृतक के समान और सिर से पाँव तक आच्छादित चादर उसका शव आच्छादन है ॥ 

अर्थात : -- "सुषुप्ति जड़ एवं जागृति चैतन्यता के चिन्ह है"  

चले पवन बहु जोर  छाई घटा घनी घोर ॥ 
पोत पति भरी भोर बहनु दै बहनु आदेस |599|

भावार्थ : -- वायु बहुत ही तीव्रता से प्रवाहित हो रही है, घनघोर घटा छाई हुई है । जहाज के  स्वामी ने पौ फटते ही, पोत के चालक को प्रस्थान करने का आदेश दिया॥

चोर मांगे रैन मिले, बैनी निंदन चैन । 
जहँ दुनौ के नैन मिले, मिले न कहुँ कर सैन |600| 

भावार्थ : -- चोर; रात मांग रहा है, और धनिक चैन की नींद मांग रहा है । जैसे ही दोनों के आँखे मिलती है, पुलिस कही नहीं मिलती ॥    

अर्थात : -- "समय पर काम आने से ही वस्तु की उपयोगिता है'   







रविवार, 25 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 58॥ -----

जन पद के परिचै नहीं, परिचै  लाहन चाह । 
धरम करम खरिचै नहीं, खरिचै चाहन लाह /581 /
भावार्थ : -- जनता के चरणों से परिचय भी  नहीं है और अभिलाषाएं लाखों संगृहीत कर ली । सामजिक कर्त्तव्य नहीं निभाए , कर्मों की लागत लगाई नहीं ,प्राप्य लाभों के सुख प्राप्ति की कामना है ॥ 

समरथ हुँते ज्ञान रचे, असमरथ हुँते दान । 
दीन हुँत बिध दया रचे, धरम चरनि हुँत मान ।५८२। 
भावार्थ : -- विधाता ने समर्थ हेतु ही ज्ञान की रचना की, असमर्थ हेतु दान की रचना की, दुर्दशाग्रस्त हेतु दया की रचना की इस प्रकार धर्म के चार चरण : -- सत्य, शौच, दया व दान पर चलने वाले के लिए सम्मान को रचा ॥ 
टिप्पणी : -- सत्य शौच, ज्ञान के ही लक्षण हैं ॥ 

रुधिर चरन तन संचरै , हियरा के करि काम । 
कर करत रत कार भला, अनभल नाम बिश्राम । ५८३।  
भावार्थ : -- ह्रदय के कार्य वश रुधिर के संचरण ही से यह शरीर चलायमान है, इस प्रकार हाथ भी कार्यशील रहे तो अच्छा है, विश्राम का नाम काल का सूचक है ॥ 

धरनी भँवरे चंदु भँवरे, भँवरे मंडल सौर । 
बहोरि बिनु परिश्रम किये, तू काहे एक ठौर ।५८४। 
भावार्थ : -- जब धरती भ्रमण कर रही, चन्दा भ्रमण कर रहा है नौ गृह और सत्ताईस उपग्रह भ्रमण कर रहे हैं । रे मनुष्य !  फिर तू बिना परिश्रम के एक ही स्थान पर क्यूँ बैठा है ॥ 

गहनहि गर्त खोरी कै जोट गोट गोड़ाए। 
काल अलकतर जोरि के पंथ बिछावत जाए |585| 

भावार्थ : -- गहरे गड़े खोद के,  गिट्टी जोड़कर एक सार करके,काला चारकोल मिलाकर यह युवा, सुन्दर मार्ग बना रहा है  ॥  

घट की पूँजी भै पयस घट की पूँजी साँस । 
जब दुनौ के घटे बयस गये घाट के पास ।586। 

भावार्थ : --  मटके की पूँजी पानी है, और देह की पूंजी, सांस है । जब दोनों की पूँजी की शक्ति घटी  , तो एक शमशान  में गया,  दूसरा नदी तट पर || 

बैनी मति के भेद दे बैनी दे मत भेद । 
बैनी मुख मत तेज दे बैनी दे सब छेद ।587। 

भावार्थ : -- वाणी मन के भेद देती है, वाणी मतभेद करवा देती है । वाणी के शब्द अधिक तीव्र नहीं होने चाहिए,
अन्यथा वह बाण के जैसे अपने लक्ष्य को प्राप्त करके ही रहती है ।।  

अर्थात : -- " तोल मोल के बोल" 

बरे बरे भाखा थरी , बरे भेस परिधान । 
सिद्ध करे ते नउ नवल, होए न पंथ पुरान |588| 

भावार्थ : -- वैश्विक भाषा  एवं उत्तम वेश-भूषा  एवं उत्तम स्थान ग्रहण कर,प्राचीन विचार आधुनिक सिद्ध नहीं होते ॥ 
अर्थात : --"भौतिकवाद एवं विचारवाद में मूलभूत अंतर होता है"  

निर्धन के सत गुन रतन गिनते उपल समान । 
जे भए धनिक ते सब गन उपलहु रतनन मान |589| 

भावार्थ: --निर्धन के सत्य रूपी रत्न को असत्य के पत्थर स्वरूप  गिना जाता है । जब वह धनवान हो जाता है तो उसके असत्य  के पत्थरों को भी रत्नमाना जाता है ॥ 

अर्थात:-- "धन की चकाचौंध, मनुष्य को दिग्भ्रमित कर देती है" 

बोली है भइ बहु बली, बोली है बहु मोल । 
बोली  की गोली चली, खोली सबकी पोल |590|
  
भावार्थ : -- बोल में अत्यधिक बल होता है, बोल मूल्यवान भी हैं | बोल के अस्त्र रहस्य को भेद देते है॥  

अर्थात : -- " संयमित वाणी, रहस्यों की रक्षा कवच है" 

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

----- ॥ दोहा-दशम 57॥ -----

दै फुहारी सकल रंग चुनरी मोरी घार । 
कहो लला तोरे अंग रंगू को रँगधार ॥|450|

भावार्थ : -- सारे रंग तो फुहार देकर मेरी चुनरी में भर दिए गोरी कहती है रे! लला, अब तेरे अंग मैं कौन सा रंग लगाऊ  ॥ 

चित भीति एक कूप खनी तामैं हरि दइ बोर । 
ते रँगेजल भरि लिखनी लिखै भगति रस खोर |572| 

भावार्थ : -- ह्रदय के अन्दर एक कुवां खोद कर, उस में श्रीहरि( ईश्वर)  को डुबो दिया । ऐसे रंग के जल को अर्थात नीले जल में भर कर लिखनी ने भक्ति रस उकेरा ।। 

हरि हरिता गौ ग्रास  वेनु का अधरोपर वास  । 
सुर सरगम सर साँस जल जमुना के तीर |573|

भावार्थ : -- गायों का हरा हरा आहार है, बाँसुरी कर अधरों पर अधिवास है । साँसों में सुरों की सरगम माला है, कहाँ??  जमुना के किनारे ॥

              " बांसुरी की खोज भगवान कृष्ण की है" 

अरन बरन बर्निक मिले मिले बरनन न बैन ।
पढ़न न को पर्निक मिले तेरे रुप के सैन |574| 

भावार्थ : -- लेखक को अक्षर के भेद तो मिल गए, किन्तु वर्णन हेतु भाषा नहीं मिली । तेरे रूप चिन्ह को पढ़ने के लिए कोई भी पृष्ठ नहीं मिला ॥ 

अर्थात: --  "सुन्दरता अनुभूति की विषय वस्तु है" 




----- ॥ दोहा-दशम 56॥ -----

अधरोपर धरे बाँसुरी साँवरिया सुर संग । 
राधा नगरि ढूँड रही चाह मलूँ मुख रंग । 561-क।  

नहि मिलै तो सोचि खड़ी रँग खेलूं किस संग । 
झाँक कर देखि बावरी चित मैं रसिया रंग ।561-ख। 

भावार्थ : -- अधरों पर बांसुरी रखे, श्याम सुरों के साथ हैं । राधे ने मुख में रंग लगाने की चाह में उन्हें सारा नगर ढूंड लिया ।1। 

जब नहीं मिले तो खड़ी होकर सोचने लगी अब मैं किस के साथ होली खेलूं । जब ह्रदय में झांक कर देखा, कृष्ण तो यहाँ सुशोभित हैं  | 2 । 

घिर बन कलि कलियाइ नीर नुपूर चरन धरे  ।                                            
भँवर भँवर भरमाए जोग रहि दिखावन नाच |562-क|

राग रंग बरनाए  पत रुर सुर सरगम भरे  । 
जोबन के बलियाए अंग अंग कंचन काँच |562-ख| 

आवनु कहि, नहि आए जोगत नैन हरिद बरे । 
रोचन मुख मुरझाए करि बड़बड़ कह कछु बाँच |562-ग|


 लालि चुनर कँध ढारि  कर गोरी केस नियास । 

 जोगि पथ खड़ी कठारि धर पिय दर्सन अभिलाख  ।562-घ।  

भावार्थ -- वन में घिर कर कलियाँ प्रस्फुटित हुई,  पैर को बूंदों के  घुंघरू सेसुसज्जित  कर भ्रमर के भ्रम में भ्रमण करती, नाच दिखाने हेतु उसकी राह देख रही हैं ॥

अद्भुत राग को वरण किये सुदर पत्र सुरमयी हो उठे । यौवन सेपरिपूर्ण पुष्प के अंग प्रत्यंग स्वर्णमयी एवं कांच के जैसे कोमल हैं ॥

आने को तो कहे थे पर नहीं आए, प्रतीक्षा में नयन भी पीले पड़ गए ॥ मुख की शोभा जाती रही और कलि मुख से  कुछ प्रलाप रही है ॥ 

कंधे पर लाल ओढ़नी डाल कर, केश विन्यासित कर । नदी के तट पर प्रियतमा, प्रियवर के मिलन की अभिलाषा में खड़ी है॥  

घट घट समतल घाटि गिरि जे घट मेढ़ किसान । 
बरसे बदरा ज्ञान घिरि ठारे नीर निपान । 563 -क। 

जे बिय बोए मेढ़ बँधे उपजै ते फल फूल ।
मंद मंद सुरभित गँधे गँधे न झाड़ी बबूल ।563-ख। 

भावार्थ : -- प्रत्येक शरीर  समतल धरा, पहाड़ी एवं पर्वत के समान है, ज्ञान का पानी उस शरीर में ठहरता है जो शरीर किसान के खेत के समान है  ।1। 

जो बिज खेत में बोये हुवे है उनमें हुई फल फुल की उपज होती है और वे ही भीने भीने मधुर गंध देते है जो झाडी बबूल होते है वे नहीं गंधाते | 2 । 

कारे कारे करज कर सारी कुम्भी कार । 
गोरे घर धरे भर भर कारे गौरस सार |564-क|

अंक तंत्र के मंत्र पढ़ गुणा भाग कर जोर  । 

काँधे उपर काँधे चढ़ लटकी मटकी फोर |564-ख|  
भावार्थ : -- मटकीकार ने अपनी हाथो की उंगलियों से कला कर मटकी बनाई श्यामा गाय के दूध से बने मक्खन को उस मटकी में भर कर गोरे के घर में रख दी । 

अंक एवं बिज गणित के मंत्र को पढ़ कर तू गुणा भाग कर और फिर जोड़ लगा । इसके पश्चात कंधे के ऊपर कंभे पर चढ़ कर उस मटकी को फोड़ दे ॥  

जाउँ नदिया पार कहे अलबेली सी नाँव । 
कमल कर पतवार गहे रे सखि तू किस गाँव |565-क| 

बोली सखि सुन बतलाउँ जहँ बेली की छाँव । 
धारे धारे बहि जाउँ दूर पिया के गाँव |565-ख|

भावार्थ : -- एक अनूठी सी नाव कह रही है कि में नदी के पार जा रही हूँ । हे! मित्र  कमल जैसे हाथों में पतवार लिए, तुम कहाँ जा रही हो??॥ 

मित्र बोली सुनो बतलाती हूँ, कोमल शाखाओं से युक्त, उद्यान से घिरा हुवा,पहाड़ के किनारे दूर जो प्रियतम का गाँव दिखाई दे रहा है, में वहीं जा रही हूँ ॥  

मति कोस तूल तारि कै मत के डोरे बाँट  । 
बाटे कोर पिरोए दे आखर आखर छाँट |566-क| 

आँट आँट के गाँठ  घर गीर के घुँघरु घाल । 
पत्र पंगत के काँठ कर मंजु मनोहर माल |566-ख| 

भावार्थ: -- बुद्धि के कोष से कपास के तार बनाकर  फिर विचारों की डोरी बना वलयित छोर से अक्षर अक्षर का चयन कर उसमें पिरो दे॥ 

गहरी गाँठ लगा कर उसमें भाषा के घुंघरू डाल यह सुन्दर मन को हरने वाली माला पत्र पंक्तियों के कंठ में उतार कर ||

फूर फर खाट खोर दे लाख लखन गुन धार। 
तोड़ ताड़ के जोर दे फिर दै घाट उतार ।५६७-क ।  

फूर फर खाट खोर दे लकरी बहु गुन धार 
तोड़ ताड़ के जोर दे फिर दै घाट उतार । ५६७-ख । 

भावार्थ : -- फुल,फल, सय्या और आच्छादन देती है, इसमें अत्यधिक लक्षणों से युक्त एवं अति गुण कारी है । यदि इसे तोड़ कर पुन: जोड़ दें तो यह घाट भी उतार देती है ॥

फुल,फल, सय्या और आच्छादन देती है, लकड़ी अत्यधिक लक्षणों से युक्त एवं अति गुण कारी है । यदि इसे तोड़ कर पुन: जोड़ दें तो यह घाट भी उतार देती है ॥

घाट उतार = नदी, समुद्र आदि के पार, अंतिम संस्कार  

भरत देस राउ नगरी चारू चौंक निबास । 
बाट बीथि बिच हाट भरे  नीम पेड़ के पास |568-क| 

टनटना कर पोर पँवर मटुकी लई बिसाए । 
तापे जल सीतल करे थापे तान सुनाए |568-ख| 


भावार्थ :-- भारत देश  की एक राजधानी सुन्दर चौराहा बसा है । जहांमार्ग ऊपर गली के बिच एक क्रय-विक्रय केंद्र है 

उस केंद्र के एक द्वार के पास ठोक बजा के एक मटकी क्रय की, जो तिप्त जल को शीतल तो करती ही है थपथपाने से मीठी तान भी सुनाती है ॥ 

अपनी सुध बिसराए के चित सँवरे सुध धार ।
नयन पलक पथराए के जोग रही हरकार ।५६९ -क।

सँवरे सँवरे दिन रैन सँवरे सँवरे नैन ।
बिनु सँवरे सँवरे नैन सँवरे दिन अरु रैन ।५६९-ख।   

भावार्थ : -- अपना ध्यान न करते हुवे चित्त में प्रियतम का ध्यान करते हुवे, डाकिये की प्रतीक्षा करते करते प्रियतमा की आँखें पथरा गईं

दिन और रात तो सजे हुवे हैं नयन भी सज ही गए किन्तु बिना प्रियतम के नयन, दिवस तथा रयन सज के भी साँवले से हो गए ॥ 

बन भेस बदल रितु राजन राजे..,
सखी राजुं में किस भेस..,
पिय बिनु सोला सिंगार न साजे..,
पिय प्रबसे पराये देस.....

समरथ आपन आप कँह, भाव पद धनाधार । 
जेइ मंतर की जपनी ले, आपन भाव सुधार ।५७०-क। 

को भाव कोउ धाम धन, को पद पदक अधीन । 
तेइ मुक्ति पत आपनै, समरथ तिन्ह कहीन ।५७०-ख। 

भावार्थ : - जो पद एवं धन स्थिति के अनुसार स्वयं को समर्थ समझते हैं । उन्हें इस मंत्र की जपनी धारण करके अपनी समझ में सुधार कर लेना चाहिए ॥

कोई सत्ता, कोई धन संपत्ति, कोई पद, कोई उपाधि, पुरस्कारों के अधीन व्यक्ति समर्थ नहीं कहलाता । जो  इन समस्त साधनों से स्वतन्त्र होकर स्वयं  स्वामी  है वही  समर्थ है ॥





----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...