शनिवार, 6 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 4॥ -----

कहन मैं बहु कोटि रहे रहन सोइ जनपाल ।
जाके कारे काज भए फलीभूत सब काल ॥3१ ॥
भावार्थ:-- कहने को तो करोड़ों राजा शासक हुए । संसार में अब तक जन पाल वही कहलाया जिसके किए कार्य प्रत्येक काल में फलीभूत हुए ।।

छोटे भयउ बड़े बिरध बड़े बिरध भए छोट ।
खोटी चलनी खरे को रहे न कोऊ ओट । ३२ ।
भावार्थ :-- बालक वयो वृद्ध हो चले हैं वृद्ध बालक हो चले हैं । ऐसी खोटी चलनी चल निकली कि खरे को कोई स्वीकार ही नहीं करता ॥

मैं करता मैं कारना मम सों यह संसार ।
जे रावण के दंभ है जे वाका हंकार।३३।
भावार्थ:--मैं करता हूँ मैं ही कारण हूँ मुझ से ही यह संसार है । मैं कर्त्ता हूँ रावण वाला दम्भ है मेरे कारण सब हुवा यह रावणवाला अहंकार है ॥

अन्न दाता बैर परे ,चरे चरन पथ और ।

उत्तम गति के लाहिआ,रहियो अपने ठौर ।३४ ।
भावार्थ :-चाहे अन्नदाता से बैर क्यों न हो जाएँ । और चरण किसी अन्य स्थान को न चल पड़े । यदि उत्तम गति की अभिलाषा है तो अपने मूल से सदैव संयोजित रहें, अर्थात कैसी भी परिस्थितियां क्यों न हों अपनी जड़ों को नहीं त्यागना चाहिए ॥

तृन जल नाज महँगे हुए भूषण रतन समान ।
जोउ सँजोउ का कीजिये भूखे निकसत प्रान ॥ ३५ ||
भावार्थ : -- जिसके बिना पशु-पक्षी और मनुष्यादि प्राणियों जीवन निर्वाह असंभव है वे तृण जल तथा अन्न भूषणों व् रत्नों के समतुल्य हो गए । जब जीवन का संधारण पहुँच से दूर हो तब उसके सुख जनित साधनों की निकटता व्यर्थ हैं ॥

संस्कारी हस्त भीत सबहि धर्म सब जाति ।
कलुष जात बस बाहिरी सुधरे न केहि भाँति ।३६।
भावार्थ:-- संस्कारी के हस्त से तो सभी धर्म सभी जातियां संस्कारित हो सकती हैं । यह स्वच्छंद विचार धारा वाली कलुष योनिज का संस्कार्य किसी के वश का नहीं ॥

बसति सबकी बसी रहे बसे रहे बसबास ।
ऐसो बसना बीच में मानस रहे सुपास ॥३७ ॥
भावार्थ : -जहां पशु पक्षी आदि सबकी बस्ती बसी रहें किसी का बसेरा न उजड़े।ऐसी वसुधा के मध्य में मानव सुखपूर्वक निवास करता है ॥

सुभग है सुभंकरी है प्रकृति आपन आप ।
सीत करे वरदान है पीर परे अभिसाप ।३८ ।
भावार्थ : -- यह सस्य श्यामल प्रकृति स्वमेव सुन्दर व् कल्याणकारिणी है । व्यवस्थित रूप में यह वरदानहै व्यथित रूप में अभिशाप है ॥

पियार देखे रूप जब , देखे धर्म न जात ।
पिता पियारे पूतरी, पूत पियारे मात ।३९ ।
भावार्थ : - प्यार जाति -धर्म को न देखकर जब केवल रूप देखता है तब पिता को पुत्री से और पुत्र को माता से प्यार हो जाता है ॥

रावण केरे राज में गहे ए अधम विचार ।
दाता को दुत्कारिये पाता को सत्कार ॥४०॥
भावार्थ : - वह राज रावण राज है जहाँऐसे कुत्सित विचार पनपते हों : दाता को दुत्कार दो पाता का सत्कार करो |

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रागी ह्रदय भेस भरे, बिरागी धरे केस ।
कपट तापस लूट करे, धरे केस अरु भेस । ४ १ । 
भावार्थ : -- अनुरागी ह्रदय वेश धारण कर लेता है । वैरागी  ह्रदय केश रचना रचित कर लेता है किन्तु जो बनावटी, दांडाजिनिक, पाखंडी एवं ढोंगी स्वरूप के बैरागी होते हैं वे केश भी धरते हैं और वेश भी भरते हैं ॥

कपट तापस भेस ज्यूँ, केचुलि काल भुजंग ।
लाग लगत छाँड़ी दिये, लाग लगत दिए अंग। ४ २ । 
भावार्थ : -- ढोंगी, पाखंडी, दांडाजिनिक  बैरागी का वेश सर्प की केंचुली के सदृश्य है कोई प्रीत किया तो छोड़ दिया कोई वैर पड़ा पुन: धार लिया ॥

ते साधौ का कीजिये, जाके मन धन काम ।
काँखि कटारी करि रखे  मुख पे राखे राम । ४ ३ । 
भावार्थ : -- उन सज्जनों के संग का क्या लाभ, जिनके मन में धन का लालच है । उनकी वाणी में राम नाम की मधुरता होती किन्तु ह्रदय में छुरी सा कपट होता है | 

कपटी चारु चैल पहन, नाम धरे गुरुदेव ।
आपन पौ त अधो गिरे, संग गिरायउ सेव । ४ ४ । 
भावार्थ : -- ढोंगी,पाखंडी,दांडाजिनिक वैरागी ने सुन्दर  यति वस्त्र धारण किए और नाम रखा गुरु देव । किन्तु कप व्यवहार से वह स्वयं तो पतन को प्राप्त हुवा ही साथ में उसने सेवकों को भी पतित कर दिया ॥

कपट तापस फनीस रुप, बिषकर वाके गोठ ।
मत मति गति बिभ्रांत करे, मारे धन की चोट । ४ ५ । 

भावार्थ : -- ढोंगी,पाखंडी,दांडाजिनिक बैरागी, सर्प के तुल्य होते हैं उनकी वाणी विषाक्त होती है, इस वाणी के अर्थ अभिमत बुद्धि को विभ्रमित करते ही हैं साथ ही धन को व्यपहरित कर लेते हैं ॥ 

काल ऊपर काल करै, गगन घटा घनघोर। 

वा गरजै तौ रोर है, वा बरसै तौ रोर । ४ ६ । 
भावार्थ : -- आकाश गृह में घनी काली घटाओं के ऊपर घनी काली घटाएं छा रही हैं । उसके गरजने से भी कोलाहल है उसके वर्षने से भी कोलाहल है ॥ 
अर्थात : -स्त्री के क्रोध पर क्रोध करने से भी कोलाहल होता है उसके रुदन करने पर भी कोलाहल होता है | 
विपत्ति की सुचना प्राप्त होने पर भी जीवन चर्या कष्टकारी हो जाती है,किन्तु विपदा ऊपर विपदा आने पर उस कष्ट से परिचय हो जाता है और जीवन चर्या उन कष्टों की अभ्यस्त हो जाती है ॥ 

एक मुख भित एक बोतरी, दोनौ बंधन बास । 
बानी पै बिस्वास नहि, पानी पै बिस्वास ।47/   
भावार्थ : -- एक मुख के भीतर है एक बोतली के भीतर है दोनॊ ही कारावास में है। स्वयं की वाणी पर तो विश्वास नहीं है, और दुसरे के पानी पर विश्वास है ।। 

पानी   काटै   पाषान,  बानी   काटै     बान ।  
ज्ञान काटै अज्ञान कौ, पाप को काटे  दान ।4 8 /

भावार्थ : --  पानी, पाषण को काटता है; वाणी, वाण को काटती है । ज्ञान, अज्ञान को काटता है; और पाप कन्यादान ( अपनी भी और पराई भी ) से कटते हैं।। 


पाप कल्पत पाप करे, तिस पर ढोल बजाए । 
कर काल के कान खड़े, कहता कौनु बचाए ।४९। 
भावार्थ : -- मनुष्य पापों की कल्पना कर कर के पापकृत्य में प्रवृत रहता है साथ ही उनका प्रचार करके अपनी मृत्यु को सचेत करता है इस प्रकार वह पाप स्वयं करके उसके परिणामों से रक्षा हेतु अन्य के आश्रय रहता है ।।

तन माटी के ढेलुआ, काल बरस गरि जाए । 

रतन अटारी ढारि कै, चाहे जित ढपनाए ।५०।  
भावार्थ : -- यह शरीर मिटटी का कच्चा ढेला है रत्नजड़ित ऊंचे प्रासादों को रचकर इसे चाहे जहां छुपा लो काल रूपी वर्षा से इसका गलना निश्चित है । 

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