शनिवार, 6 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 6॥ -----

                   ----- ॥ सूफ़ी-दोहे ॥ ----- 

आबे-दस्त चश्म खिज़र, शीशी भर भर लाए । 
बिला बकूफ़ हयात कह, गट गट हलक समाए ।६१।  
भावार्थ : -- शौच आदि स्त्रोतों के जल से बोतलें भरी हुई हैं, और मूर्ख लोग उसे ही अमृत मान  कर गले के नीचे उतार लेते हैं ।। 

ज़रे-निगाराँ आशियाँ, बुलंदो आसमान । 
पल्क की तो ख़बर नहीं, सौ बरस का समान /६२।  

भावार्थ : -- सोने चांदी के गगनचुम्बी भवन हैं एक पल का ठिकाना नहीं कि कब फूंक निकल जाए और सौ साल का सामान संजो रखा है ॥  

घर की नारि परदा दिए, तन की दिये न कोए ।
पाप सुमिरत राह चले, आगिन आगिन होए /६३/ 
भावार्थ : -- घर की नारी को तो पर्दा दिए, देह की नाड़ी को कोई पर्दा नहीं किया । राह चलते जब पाप याद आए तो देह की नाड़ी  तेज होकर आगे आगे चलने लगी 

अलह मसीत घंटाघर, देहर गुरु दुआर । 
चारो धाम सुनाइ दै, भगवन के गुन सार । ६ ४ । 
भावार्थ : -- अल्ला की मस्जिद, गिराजाघर, मंदीर या हो गुरुद्वार । चारो स्थान पर ईश्वरीय सत्व ही की वंदना होती है ॥  

शाह शानो-गुमान में, समुझावै जा कोए ।
पर्दा दिया पारस को, कंचन लोहा होए । ६ ५ । 

भावार्थ : -- शासक  अपने ही  घमंड  में है कोई उसे जाकर समझाए कि ज्ञानीयों का अनादर किये हैं जिससे लोहा कंचन तो क्या, कंचन भी लोहा हुवा जा रहा है ॥ 

आए ख्याल दिमाग मैं, शाह के सरोकार । 
हर्फ़-ब-हर्फ़ हदीस चहुँ मुख से निकसे गार | 6 6 | 

भावार्थ : -- शासक से  सम्बंधित  कोई विचार मष्तिष्क उभरता है। जिसे अक्षरश: वर्णन करना चाहूँ तो मुख से अपशब्द ही निकलते हैं ॥ 

अपनी तो परदा किये, परदा दै दीदार।
तेरी बेपरदा किये, मत मांगे सरकार /67/

भावार्थ : -- अपने कुकर्म ढाँक लिए, तिम्हारे उद्धृत कर दिए । और दूरदर्शन में सजे खड़े सत्ता के लिए 'मत' मांग रहे हैं ॥ 
                 "मत देना"

हाथ पाँव ना मति चले, दौड़े मुँहू पसार । 
लै भराई लार गिरे, जै जै री  सरकार | 6 8 |  

मुँह पसारकर दौड़ना = कोई चीज/पद/सत्ता पाने के लिए लपलपाना 
मुँह भराई = घूस /घोटाले की राशि 

भावार्थ : --  काम  तो कोई  होता नहीं  न ही बुद्धि चलती किन्तु चीज/पद/सत्ता के लिए लपलपा रहे हैं घुस घोटाले की राशि पाने के लिए लालायित हैं ऐसी सरकार की तो बस 'जय राम जी की' ही हो ॥ 

रख्ता सजे सारँगी , नज्म नफ़ीरी तूर । 
वाके सोंहे सोंहती, जाके सुर में नूर। 69 /
भावार्थ : -- गीत,गज़ल सारंगी पर सजती है, नज्म शहनाई और तुरही पर सजती है । और उनके रूबरू फ़ैज पाती है, जिनके सुर में नूर बसता हो ॥

ऊँच दिवारी बैस के, कागा करता काउँ । 
कहता खातिर जीन्गी, जीउ लगाया दाउँ ।70। 
भावार्थ : -- एक तो ऊंची दीवार उस पर कौंवा जा बैठा और करता है काउँ, पूछने पर कहता है कि  जीविका हेतु जीवन को दाँव लगा रखा है, एतदर्थ बैठा हूँ ॥ 

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