----- ॥ सूफ़ी-दोहे ॥ -----
आबे-दस्त चश्म खिज़र, शीशी भर भर लाए ।
बिला बकूफ़ हयात कह, गट गट हलक समाए ।६१।
भावार्थ : -- शौच आदि स्त्रोतों के जल से बोतलें भरी हुई हैं, और मूर्ख लोग उसे ही अमृत मान कर गले के नीचे उतार लेते हैं ।।
ज़रे-निगाराँ आशियाँ, बुलंदो आसमान ।
पल्क की तो ख़बर नहीं, सौ बरस का समान /६२।
भावार्थ : -- सोने चांदी के गगनचुम्बी भवन हैं एक पल का ठिकाना नहीं कि कब फूंक निकल जाए और सौ साल का सामान संजो रखा है ॥
घर की नारि परदा दिए, तन की दिये न कोए ।
पाप सुमिरत राह चले, आगिन आगिन होए /६३/
भावार्थ : -- घर की नारी को तो पर्दा दिए, देह की नाड़ी को कोई पर्दा नहीं किया । राह चलते जब पाप याद आए तो देह की नाड़ी तेज होकर आगे आगे चलने लगी ॥
अलह मसीत घंटाघर, देहर गुरु दुआर ।
चारो धाम सुनाइ दै, भगवन के गुन सार । ६ ४ ।
भावार्थ : -- अल्ला की मस्जिद, गिराजाघर, मंदीर या हो गुरुद्वार । चारो स्थान पर ईश्वरीय सत्व ही की वंदना होती है ॥
शाह शानो-गुमान में, समुझावै जा कोए ।
पर्दा दिया पारस को, कंचन लोहा होए । ६ ५ ।
भावार्थ : -- शासक अपने ही घमंड में है कोई उसे जाकर समझाए कि ज्ञानीयों का अनादर किये हैं जिससे लोहा कंचन तो क्या, कंचन भी लोहा हुवा जा रहा है ॥
आए ख्याल दिमाग मैं, शाह के सरोकार ।
हर्फ़-ब-हर्फ़ हदीस चहुँ मुख से निकसे गार | 6 6 |
भावार्थ : -- शासक से सम्बंधित कोई विचार मष्तिष्क उभरता है। जिसे अक्षरश: वर्णन करना चाहूँ तो मुख से अपशब्द ही निकलते हैं ॥
अपनी तो परदा किये, परदा दै दीदार।
तेरी बेपरदा किये, मत मांगे सरकार /67/
भावार्थ : -- अपने कुकर्म ढाँक लिए, तिम्हारे उद्धृत कर दिए । और दूरदर्शन में सजे खड़े सत्ता के लिए 'मत' मांग रहे हैं ॥
"मत देना"
हाथ पाँव ना मति चले, दौड़े मुँहू पसार ।
लै भराई लार गिरे, जै जै री सरकार | 6 8 |
मुँह पसारकर दौड़ना = कोई चीज/पद/सत्ता पाने के लिए लपलपाना
मुँह भराई = घूस /घोटाले की राशि
भावार्थ : -- काम तो कोई होता नहीं न ही बुद्धि चलती किन्तु चीज/पद/सत्ता के लिए लपलपा रहे हैं घुस घोटाले की राशि पाने के लिए लालायित हैं ऐसी सरकार की तो बस 'जय राम जी की' ही हो ॥
रख्ता सजे सारँगी , नज्म नफ़ीरी तूर ।
वाके सोंहे सोंहती, जाके सुर में नूर। 69 /
भावार्थ : -- गीत,गज़ल सारंगी पर सजती है, नज्म शहनाई और तुरही पर सजती है । और उनके रूबरू फ़ैज पाती है, जिनके सुर में नूर बसता हो ॥
ऊँच दिवारी बैस के, कागा करता काउँ ।
कहता खातिर जीन्गी, जीउ लगाया दाउँ ।70।
भावार्थ : -- एक तो ऊंची दीवार उस पर कौंवा जा बैठा और करता है काउँ, पूछने पर कहता है कि जीविका हेतु जीवन को दाँव लगा रखा है, एतदर्थ बैठा हूँ ॥
आबे-दस्त चश्म खिज़र, शीशी भर भर लाए ।
बिला बकूफ़ हयात कह, गट गट हलक समाए ।६१।
भावार्थ : -- शौच आदि स्त्रोतों के जल से बोतलें भरी हुई हैं, और मूर्ख लोग उसे ही अमृत मान कर गले के नीचे उतार लेते हैं ।।
ज़रे-निगाराँ आशियाँ, बुलंदो आसमान ।
पल्क की तो ख़बर नहीं, सौ बरस का समान /६२।
भावार्थ : -- सोने चांदी के गगनचुम्बी भवन हैं एक पल का ठिकाना नहीं कि कब फूंक निकल जाए और सौ साल का सामान संजो रखा है ॥
घर की नारि परदा दिए, तन की दिये न कोए ।
पाप सुमिरत राह चले, आगिन आगिन होए /६३/
भावार्थ : -- घर की नारी को तो पर्दा दिए, देह की नाड़ी को कोई पर्दा नहीं किया । राह चलते जब पाप याद आए तो देह की नाड़ी तेज होकर आगे आगे चलने लगी ॥
अलह मसीत घंटाघर, देहर गुरु दुआर ।
चारो धाम सुनाइ दै, भगवन के गुन सार । ६ ४ ।
भावार्थ : -- अल्ला की मस्जिद, गिराजाघर, मंदीर या हो गुरुद्वार । चारो स्थान पर ईश्वरीय सत्व ही की वंदना होती है ॥
शाह शानो-गुमान में, समुझावै जा कोए ।
पर्दा दिया पारस को, कंचन लोहा होए । ६ ५ ।
भावार्थ : -- शासक अपने ही घमंड में है कोई उसे जाकर समझाए कि ज्ञानीयों का अनादर किये हैं जिससे लोहा कंचन तो क्या, कंचन भी लोहा हुवा जा रहा है ॥
आए ख्याल दिमाग मैं, शाह के सरोकार ।
हर्फ़-ब-हर्फ़ हदीस चहुँ मुख से निकसे गार | 6 6 |
भावार्थ : -- शासक से सम्बंधित कोई विचार मष्तिष्क उभरता है। जिसे अक्षरश: वर्णन करना चाहूँ तो मुख से अपशब्द ही निकलते हैं ॥
अपनी तो परदा किये, परदा दै दीदार।
तेरी बेपरदा किये, मत मांगे सरकार /67/
भावार्थ : -- अपने कुकर्म ढाँक लिए, तिम्हारे उद्धृत कर दिए । और दूरदर्शन में सजे खड़े सत्ता के लिए 'मत' मांग रहे हैं ॥
"मत देना"
हाथ पाँव ना मति चले, दौड़े मुँहू पसार ।
लै भराई लार गिरे, जै जै री सरकार | 6 8 |
मुँह पसारकर दौड़ना = कोई चीज/पद/सत्ता पाने के लिए लपलपाना
मुँह भराई = घूस /घोटाले की राशि
भावार्थ : -- काम तो कोई होता नहीं न ही बुद्धि चलती किन्तु चीज/पद/सत्ता के लिए लपलपा रहे हैं घुस घोटाले की राशि पाने के लिए लालायित हैं ऐसी सरकार की तो बस 'जय राम जी की' ही हो ॥
रख्ता सजे सारँगी , नज्म नफ़ीरी तूर ।
वाके सोंहे सोंहती, जाके सुर में नूर। 69 /
भावार्थ : -- गीत,गज़ल सारंगी पर सजती है, नज्म शहनाई और तुरही पर सजती है । और उनके रूबरू फ़ैज पाती है, जिनके सुर में नूर बसता हो ॥
ऊँच दिवारी बैस के, कागा करता काउँ ।
कहता खातिर जीन्गी, जीउ लगाया दाउँ ।70।
भावार्थ : -- एक तो ऊंची दीवार उस पर कौंवा जा बैठा और करता है काउँ, पूछने पर कहता है कि जीविका हेतु जीवन को दाँव लगा रखा है, एतदर्थ बैठा हूँ ॥
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