शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा- दशम 2॥ -----

हर  कौ  दिये  नीर  हार, आप  करे निर्हार । 
प्रलय कारन कार करै, कवन सिरु स्वीकार  । 11। 
निर्हार = स्वयं हेतु पृथक धन एकत्र करना
भावार्थ = महादेव को जल का हार पहनाए, और स्वयं हेतु पृथक धन एकत्र किये । प्रलय के कारण और पुनर्स्थापन कार्य अब किसका शीश स्वीकार करे ॥

मन में कामिनी काँचनि , बाँध लिये गठ जोड़ । 
ते साधौ का कीजिये , जे जग कँह दिए छोड़ । १ २ । 
भावार्थ : --  मन में तो सुन्दर स्त्री स्वरूप धन की माया है जिसके साथ गठबंधन किए जो कहते हैं हमने विषयासक्ति त्याग दी है ऐसे साधुता से कोई लाभ नहीं ॥

नाहि काया मोह तजा, नाही कांचन गेह । 
त्याज् बरन सब एक भए, कामिनि काँचन नेह । १ ३ । 
भावार्थ : -- न तो इस काया के मोह का त्याग किया, ना ही विलास से परिपूर्ण घर का ॥ अब तो स्त्री और धन के स्नेह का त्याग और वरण सब एक ही है ॥  

शब्द सनेही तेहि ते, सार गहे कर सोए । 
जिनके श्री मुख साँच रहे , अरु चित निर्मल होए । १ ४ । 
भावार्थ : -- शब्द उन्ही से स्नेह करते हैं, सार उन्हीं के हाथ ग्रहण करते हैं । जिनके श्री मुख पर सदा सत्य का वास होता है और चित्त सदैव निर्मल होता है ॥

नरक निरखन नयन चले , कार कलेवर मीन । 
एक काग के उदर घले, होत फाँक कुल तीन । १ ५ । 
भावार्थ : -- नर्क देखने के लिए ये नेत्र उत्सुक हुवे तो मछली की देह आकृति कर ली । एक कौंवे ने उस मछली के तीन फांकी करके उनसे अपने उदर की पूर्ति ली  ये हैं नर्क ॥

गुरु गुन चित्त उतारी कै, सार सकल लै सोख । 
गुरु दिठाए पथ हरि मिलै, हरि दिठाए पथ मोख । १ ६। 

भावार्थ : -- गुरु के गुणों को चित्त में अंतरस्थ कर उनके सार तत्व को शोषित कर लेना चाहिए । क्योंकि गुरु के दिखाए मार्ग ही से भगवान् की प्राप्ति होती है और भगवान् के दिखाए मार्ग से मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥ 

एहि जगत सतगुरु सरूप , पारस नाहीं कोए । 
पारस परसै पुरट भए, गुरु परसै तौ सोए । १ ७ ।  

भावार्थ : -- इस संसार में सच्चे गुरु के सदृश्य कोई पारस नहीं है । पारस के स्पर्श से तो सोना होते हैं किन्तु गुरु के स्पर्श से स्वयं गुरु सदृश्य अर्थात पारस ही हो जाते हैं ॥ 

रूप उरेखत जगत के, रे दरसत एहि दीठ । 
ओछी करनी कारि कै, कर ले ऊँची पीठ । १ ८ । 
भावार्थ : -- इस संसार स्वरूप का चित्र खींच कर यह दृष्टि यही दृश्य देखती है कि "ओछे कर्म करो-ऊंचा पद पाओ"॥ 

बाह लहियात लाग कौ, चाह गहियात राग ।
बूँद ठहिरात खेह के बाँह हरियात साग /1 9 /

भावार्थ : -- हवा से अग्नी धधकती है, चाह लगाने ही से अनुराग गहरा होता है । बूंदों के ढहराने ही से क्षेत्र की
भुजाओं में हरियाली लहलहाती है॥

भावन ही ते भावना, भावन ही ते नेह ।
भावन के बीज उपजै, भावन ही के खेह | 2 0 | 

भावार्थ : -- अनुसंधान,  कल्पनाओं  पर  ही आधारित होते है, भावनाओं से ही प्रेम होता है । इस प्रकार विचारों के बीज चिंतन की भूमि पर हीअंकुरित होते हैं ॥





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