शनिवार, 6 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा- दशम ३॥ -----


 ----- ॥ दोहड़- दोहे ॥ -----

पञ्च भूत सँजुत ए देहि , पुनि त्रिगुन ते मेलि  ।
हरिदै कुतुकि केलि रहा, चारि दिवस का केलि । २ १ ।
मानस जे जग जीउना, चारि दिवस के खेल ।
दौ दिन हिलमिल प्रीति करि, दौ दिन कारे हेल । २ २।

भावार्थ : -- पञ्च तत्व के संघटन पश्चात यह देह माया के तीन गुणों  (अर्थात सत, रज, तम ये तीन गुण ) से संयुग्मित होकर रचित हुई । जिसके अंतर में एक हृदय है जो कौतुहल कर चार दिवस के इस जीवन के कौतुक को प्रस्तुत कर रहा है । १ ।मानव की सांसारिक जीवनी केवल चार दिवस की है, दो दिवस राग किया दो दिवस द्वेष । २ । 


ऊँचे पद पैसत कहे, में हूँ पालन हार । 
पल मैं जल मैं जल बहे, दरसे सब संसार ।२ ३।  
राख राखत लाख कहे, में हूँ राखन हार । 
ताहि राख सहुँ राख भए , दरसे सब संसार ।२ ४। 
भावार्थ : --  ऊंचे पद पर बैठते ही मनुष्य स्वयं को राजा भगवान और न जाने क्या क्या संज्ञान करने लगता है  । ( उच्च पदासीन) पल भर में ही जल कर जो  जल में ही बह गए उन तथाकथित राजाओं और भगवानों को भी सारे संसार ने देखा । 2 3 |स्वयं के लाखों अंग रक्षक रखते हुवे जो कहते हैं कि हम ही चराचर के जनसामान्य के रक्षक हैं । ऐसे रक्षकों को, उनके अंग रक्षकों के ही हाथों जनता ने राख होते देखा है  | 2 4 |

ऊँच सिहासन बैस  के, खाए घरहि का खेत । 
मुदरा भई अवमूली, कन कंचन भए रेत । 2 5 । 
पढ़ अरथ शास्त्र सत्तर, कारे दूषित नीति । 
राउ गौरव चिंतन कर, छोड़ भाउ की प्रीति । 2 6। 

भावार्थ : -- उंचा सिंहासन पर भी बैठे ( शासक) अपने घर का ही खेत खा रहा है । मुद्रा का अवमूल्यन हो गया,
अन्न/स्वर्ण के कण रेत हो गए । 1 । अर्थ  के तो  सत्तर  शास्त्र पढ़ लिए तथापि दोष पूर्ण नीतियाँ कारित की, रे शासक ! देश हेतु तनिक गंभीरता पूर्वक अर्थ उपार्जन का उपाय सोच और सत्ता का मोह छोड़ ॥ 

बैसे राउ धानी मै  , दूषक करे प्रबंध । 
गाँव गाँव गिरह घेरे, नगरी नगरी अंध । 2 7 । 
बीर बसे बिरानी मै , कायर भए बर जोध । 
ज्ञानी गए पानीहि मै, भोंदु भए मह बोध । 2 8 । 

भावार्थ : -- शासक तो धानी में बैठ विश्राम कर रहे  हैं .....विधि-विधान का उलंघन करने वाले शासन तंत्र का संचालन कर रहे हैं । गाँव-गाँव में समस्याएँ व्याप्त हैं, नगरों में नियम नीतियों के अभाव से ग्रस्त हैं || 

पहले मुँह भराई लिए, तँह दिए समाचार । 
सिर लकीर खैंच के इक, बोलें बारम्बार | 29|
अज्ञानी के कपोल दे, ज्ञान के दोइ धौंक । 

बहुरी भँभर भँवर फिरे, भँवरी सा वो चौंक |30|  
भावार्थ : -- पहले तो घूस लेते हैं उत्कोच लेते हैं तत्पश्चात समाचार प्रदान करते हैं ....  मात्र एक पंक्ति को मुख्य मानकर वारंवार जपते हैं | अज्ञानी के गाल पर ज्ञान की दो चपत देने से ही तब वह भंवर से भवँर कर अपने अज्ञान से भिज्ञ होगा और ज्ञान को प्राप्त होगा 

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