मंगलवार, 30 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 30॥ -----

एक मूँठ जल एकहि धूल एकहि मूठिक अँजोर। 
बने बिटप लह लघुत मूल लाहन दे ना थोर | 301| 
    ----- ॥ स्वेट मार्डेन ॥ ----- 

भावार्थ : --एक मुट्ठी जल, एक मुट्ठी धूल और एक ही मुट्ठी प्रकाश लेकर छोटी सी जड़, वृक्ष में रूपांतरित होकर, फल फूल छाया वायु आदि स्वरूप में बहुत से लाभ देती है ॥ 

धन के साध धरम रखे, बिद्या रखे अभ्यास । 
कोमलता राजन रखे कुलीन नारी बास |302| 
 ----- ॥ चाणक्य ॥ -----

भावार्थ : -- धर्म की रक्षा, धन के साधन करते है, विद्या की रक्षा, अभ्यास करता है । राजन की रक्षा, उसकी कोमलता करती है, घर की रक्षा सद्चरित्र  नारी/सेना करती है । 

कवन कुल में दोष नहीं, कौन नहीं गह रोग । 
कौन उर नहीं दुखार्ति कौन सके लखि रोक |303| 
    ----- ॥ नीति सार ॥ -----

भावार्थ :-- किसके कुल में दोष नहीं, कौन व्याधि से पीड़ित  नहीं,  कौन  कष्ट  में  नहीं  पड़ता, लक्ष्मी को 
निरंतर कौन रोक सका है ॥ 

मुख मंडूक कलरव भला बसाह हल मैं जुताए । 
बसह के बल चाक चले टिल ते तेल निकसाए ।304। 
      ----- । खलील जिब्रान ।। -----
भावार्थ : -- मेंढक केवल शोर ही करता रहता है, और हल में बैल ही जोता जाता है । बैल के ही बल से तिल का तेल  निकलता है मेढक के टरटराने से नहीं ।। 

प्रभुता  में  लघुता  बसे, लघुता  में प्रभु  धाम /
तिन बिनायक सीस लगे , ताड़ धरे बड़ नाम /३०५ /
 ------ || दयाराम सतसई || ------

भावार्थ : --लघुता में प्रभुत्व निवास करता है, और प्रभुता लघुता का भवन है / लघु तृण (दूब ) सिद्धि विनायक के मस्तक पर चढ़ता है , ताड़ वृक्ष का केवल बड़ा नाम है //

सत असत न साधु असाधु, मनोज्ञ ना अमनोज्ञ । 
बानि बिनु न धर्म अधर्म बानिहि के सब जोग /306/ 

भावार्थ : -- वाणी के बिना न धर्म का ज्ञान होता न अधर्म का और न  सत्य न असत्य न साधु न असाधु न मनोज्ञ न अमनोज्ञ का ही ज्ञान होता । वाणी ही वह साधन है जो इन सबका बोध कराती है ॥ 
----- ॥ छान्दोग्योपनिषद ॥ ----- 

आचरण के कौसलता , ऐसो कारूक कार /
निज अति सुधी सिद्ध करे,  जे दूजन अनुहार /३०७ /
भावार्थ : -- व्यवहार कुशलता ऐसी कलाकार है , जो दूसरों की तुलना में स्वयं को अधिक बुद्धिमान सिद्ध कर देती है //
 ----- ॥ रेमंड मार्टीमर ॥ -----

धन लोलुप धन बस होए बिनयन बस अभिमान । 
मूढ़ अभिलखित पूरोए साँच भास बिद्वान /308/ 

भावार्थ : - धन के लोभी को धन से, अभिमानी को विनय पूर्वक, मुर्ख की अभिलाषा को पूर्ण कर एवं विद्वान को 
सत्यभाषण से वश में किया जाता है ॥ 
 -----  ॥ हितोपदेश ॥ ----- 

पुरनियाँ ना तितौ भाए, जितौ नउ नन्द भाए । 
ससि तितै प्रात न लवने, जितौ साँझि लौनाए । ३०९ । 
----- ॥ महर्षि वाल्मीकि ॥ -----

भावार्थ : -- बिता हुवा उत्सव उतना आनंद नहीं देता, जितना की आने वाला देता है । चंद्रमा जितना सांयकाल में सुशोभित होता है उतना प्रात: काल में नहीं । 

नाना धर्मन जग लहे, नाना अर्थ बिचार /
कुंचित मन अंतर गहे, केवालात्मन सार /३१० /
----- || एक चीनी कहावत  || -----

भावार्थ : -- संसार में विभिन्न प्रकार के धर्म हैं, जिनमें अर्थ-विचार भी विभिन्न स्वरूप में प्राप्त हैं । "संकीर्ण मन वाले व्यक्ति उन धर्मों में केवल अंतर देखते हैं, और शुद्ध स्वभाव वाले अर्थात उदार वादी उनमें सार-सत्य ही देखते हैं" ॥ 
  


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