सोमवार, 29 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 27॥ -----

सात सुरों की बाँसुरी, कर धरे घन स्याम /
दोधारी सरूप धरी, एक दाहिन एक बाम /२७१ -क /

एक लय लगन लीन  करी , माँगे हियरा दान /
दुजी  हरिनन दीन करी , माँग करे दे प्रान /२७१-ख /
भावार्थ : --घन श्याम ने के हाथों में सप्त स्वर की बाँसुरी है / जिसने दोधारी स्वरूप वरन किया हवा है जिसमें एक में हीत है तो दूसरी विपरीत है //

एक लय अनुराग में मग्न करती हुई ह्रदय की मांग करती है तो दूसरी हिरन की दुर्दशा करती हुई प्राण दान की मांग करती है ( हिरण का यह प्राकृतिक गुण धर्म है कि वह संगीत में मग्न हो जाता है,फिर मृगया चारी उसका सरलता पूर्वक वध कर देते हैं ) //

चार कोन चौसठ खंड , आठ आठ पड़काल /
चाल गहि हाथ आपनै , जाने को कर काल /२72-क/

चार कोन चौसठ खंड , आठ आठ पड़काल /

 काल न जान घेरे कँह, हाथ आपनै चाल /२७२-ख / 

पड़काल= सीड़ियाँ
भावार्थ : -- आठ पहर और चौसठ घड़ियों घिरे इस जीवन की चार दिशाएं हैं जिसपर चाल चलना तो अपने हाथ है किन्तु काल करना/मृत्यु कारित करना, न जाने किसके हाथ में हैं और जाने कहाँ घेर ले //

जबतै  रस की बादरी फेर गई है पीठ । 
ऊपर धरी कर ऊँगरी जोग रही है दीठ । 273-क। 

बिना भगति भगवन नहीं सुर बिना नहीं गान । 
बिनु सान के बान नहीं जल बिन नहीं किसान । 273-ख। 

भावार्थ : -- जबसे जल की बदली ने मुख फेर लिया ।  तबसे हाथों की उंगलियाँ की धारण की हुई आँखें उसकी
प्रतीक्षा में हैं । 1 । 

भक्ति बिना भगवान नहीं, सुर के बिना गान नहीं । बिना  शाण-पाषाण  के  बाण  नहीं, बिना जल के किसान नहीं ॥ 

बैसे मारे पालथी पोथी पीठ सजाए । 
बंचन प्रबन जोग करें ज्ञानी ढोंग रचाए । 274-क।  

बढ़नी धूरि बुहारि कै तहँ संदुकची खोल । 
पाति पाति परचन कर आखर आखर बोल । 274-ख। 

 भावार्थ : -- विचित्र आसन जमाए हुवे जिन सज्जनों की पीठ के पीछे पुस्तकालय सुसज्जित है । ठगी का अभ्यास करते हुवे उनका चित ठगी की ओर प्रवृत्त है, और ज्ञानी का रूप धारण किये हुवे वे पहुंचे हुवे पाखंडी है । 1 । 

 पहले झाडू से धूल झाड फिर अपनी पुस्तकों की संदुकची खोल  । उच्चार कर पुस्तकों के पृष्ठों से पहले परिचय कर फिर ज्ञानी बन । 2 । 

अर्थात : -- "पुस्त- प्रदर्शन भर से कोई ज्ञानी नहीं होता"  

ताके उदयन होत दिन अस्त गमनु तब रैन ।
बहोर काहु चन्द्र बदन चाहत चक के नैन । 275-क।

ताके उदयन होत दिवस धरे दिवाकर नाम ।
अस्त गत हो रयनि रजस साज संजोउ सुधाम ।275-।    

भावार्थ : - जिसके उदित होने पर दिन होता है, और अस्त होने पर रात होती है । तो फिर चकोर के लोचन चन्द्रमा को क्यूँ चाहते है| 1| 

उसका नाम सूर्य है, जिसके उदित होने पर दिवस और अस्त होने पर रैन विराजित होती है, चन्द्रमा तो केवल सजावट सामग्री है 

लोह पंथ गामिनी कौ ढारे लोहन काल । 
लांबी पटरी चाक तै चारत बिजुरी बाल ।276-क। 

कारी कारी कोयली लोहन देइ निकाल । 
लौह पंथ गामिनी के तेहि धरनी अकाल ।276-ख / 

भावार्थ : -- लोह पथ गामिनी इस्पात से निर्मित होती है । लम्बी पटरियों पर उसके चक्के बिजली से चलते है ।1। 
जो धरती काला काला कोयला और लोहा निकालती है उसी धरती पर लौह पंथ गामिनी  का अकाल है |2|   

लौह पथ गामिनी = रेलगाडी  

जीवन पावत जी उठे मरनि ते मरी जाए । 
उदर धरे बस एक मुठे सो ही संत कहाए ।277-क।  

मोह माया और नार दोनौ एक ही रंग । 
जे मन हो एक आधार मानो दोनौ संग । 277-। 

भावार्थ : -- यदि जीवन मिला तो जी उठे, मृत्यु मिली तो मर बैठे । थोड़ा ही भोजन किया, उसको जग ने संत कहा। 1 । 
धन संपत्ति का मोह और नारी का मोह दोनों एक जैसे ही हैं । इनमें से किसी एक में भी मनुष्य की आसक्ति हो तो वह नारी से भी अछूता नहीं है । 2 । 

जीवन पावत जी उठे मरनि ते मरी जाए । 
उदर धरे बस एक मुठे सो ही संत कहाए । 278-क।  

मोह माया और नार दोनौ एक ही रंग । 
जे मन हो एक आधार मानो दोनौ संग ।278-ख /

भावार्थ : -- यदि जीवन मिला तो जी उठे, मृत्यु मिली तो मर बैठे । थोड़ा ही भोजन किया, उसको जग ने संत कहा। 1 । 
धन संपत्ति का मोह और नारी का मोह दोनों एक जैसे ही हैं । इनमें से किसी एक में भी मनुष्य की आसक्ति हो तो वह नारी से भी अछूता नहीं है । 2 ।  

जे निर्धन निचाई कै  मान करे धनवान । 
जान  गुण  गुनाई कै ते पाथर के मान । 229-क। 

ज्ञानी ऊँच बिठाई कै करे ज्ञान का मान । 
जाने गुन गुनाई कै तेहि पारखी जान ।229-ख।

भावार्थ : -- जो निर्धन को नीचा दिखाकर केवल धनवान का सम्मान करते हैं । वे गुण की गिनती भी नहीं जानते, वे मुर्ख होते हैं । 1। ( गुण तीन होते है : -- सत्य, रजस और तामस )  

जो ज्ञानी को उच्च स्थान देते हैं और ज्ञान का सम्मान करते है । वह गुणों की गिनती जानते हैं और पारखी होते हैं ।2।  

साँची प्रीत हरिनी सी टुटे टाक टंकाए । 
झूठी माटी मटुक की ढेस लगे बिसमाए । 230-क। 

साँचे मीत सुनार से टुटे प्रीत टंकाए । 
झूठे कुम्भी कार से करकट मैं फेकाएँ ।230-ख । 

भावार्थ : -- सच्ची प्रीत स्वर्ण जैसी होती है, टूटने पर टांका लगाने से जुड़ जाती है।झूठी प्रीत मिटटी के घड़े के जैसे होती है, थोड़ी सी समस्या होने पर टूट जाती है । 1 । 

सच्चे मित्र स्वर्णकार के जैसे होते है जो अपने  मित्र की टूटी प्रीत को, टूटे स्वर्ण आभूषण स्वरूप में ग्रहण कर उसे पुन: जोड़ देते हैं । झूठे मित्र,कुम्भी कार के जैसे होते हैं जो अपने मित्र की टूटी हुई प्रीत को टूटा कुम्भ के रूप में ग्रहण कर उसे कचरे में फेंक देते हैं । 2 ।   

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