अच्छे दिन बिचारे ते , ओछे आगिन आए ।
आपन पदक सब बाहक, मुख में बानी रेल ।
चतुराई राइ भर नहि , दियै चोट ले ठेल ।१२२।
भावार्थ : -- अपने अपने स्थान पर तो सभी वाहन चालक हैं ..... .....मुख में वाणी के रेला धारे हैं .....चतुराई तौ रत्ती भर भी नहीं धारे औउर बनना है 'बन्ने खाँ '.....अजी ऐसा ठोकते ऐसा ठोकते हैं की चोट दे जाते हैं ।।
अच्छे ओछे एक करत, सब सौं पलक बिछाएँ।१२१।
भावार्थ : -- यदि उत्कृष्ट दिनों का विचार करें तो निकृष्ट दिन आगे आते हैं । उत्कृष्ट और निकृष्ट को एक करके सभी दिनों का समान रूप से स्वागत करना चाहिए ॥
आपन पदक सब बाहक, मुख में बानी रेल ।
चतुराई राइ भर नहि , दियै चोट ले ठेल ।१२२।
भावार्थ : -- अपने अपने स्थान पर तो सभी वाहन चालक हैं ..... .....मुख में वाणी के रेला धारे हैं .....चतुराई तौ रत्ती भर भी नहीं धारे औउर बनना है 'बन्ने खाँ '.....अजी ऐसा ठोकते ऐसा ठोकते हैं की चोट दे जाते हैं ।।
ओछे कारज कारि कै, कीजिये पीठ ऊँच ।
जाके जितै जोगवना, वाके उतै पहूँच ।१२३।
भावार्थ : -- निकृष्ट कार्य कारित कर अपना पद उंचा करो ।जिसने जितने निकृष्ट कार्य एकत्र किये उसकी उतनी उंची पहुंच है ॥
आपन पदक सबहीं गुरु, किये मान मद मेल ।
माया के तौ दास भए, काया के भए चेल ।१२४ |
भावार्थ : -- अपने अपने स्थान अभिमान और दंभ से भरे हुवे सभी गुरु हैं । काली माया के तो सेवक हो गए और काया के शिष्य हो गए ॥
साँचा अंतस हीर है, मिलै मोल बहुताए ।
परख ले सोइ पारखी, मोलत बोल बिहाए ।१२५ /
भावार्थ : -- सच्चरित अंत:करण हीरे के सदृश्य होता है जो बहुंत ही अधिक मूल्य में मिलता है अर्थात सदजन हीरे के समान होते हैं जिनकी शिष्यता कठिनता से प्राप्त होती है । जो ऐसे हीरे को परख लिया वो पारखी फिर उस हीरे का मूल्य लगा कर मुल्यातीत हो गया ॥
पाँव चले जित चालिये , हाथ चले चल द्रौंन ।
काया संग छाड़ै तौ , तेरो संगी कौन ।१२६ /
भावार्थ :-- यदि पाँव चले तो चाहे जहां चले चलो और हाँथ चले तो रथ की ही सवारी कर लो अर्थात स्वस्थ रहते हुवे प्रत्येक यात्रा सुगम है किन्तु स्वस्थ न रहने पर सभी साथ छोड़ देते हैं ॥
कारूक अस काया गढ़ी जैसे काचा कुंभ ।
रुधिर के तौ तरल भरे, छन में होए निशुंभ | 127 |
भावार्थ : -- विधाता ने काया को ऐसे रचा है जैसे यह कोई मिट्टी की मटकी हो । जिसमें जल स्वरूप रुधीर भर दिया, और मटकी के जैसे ही यह पलभर में ही विषम हो जाती है ॥
खन खन खोदा कोइरा, दिया समंदर डूब ।
रपट लिखी यह चोर है, कहत मुहावरि खूब |128|
भावार्थ : -- खंड खंड में खनखनाता हवा कोयला खोद लिया फिर उन खण्डों को समुद्र से डूबो दिया (अर्थात प्राकृतिक आपदा की स्थिति उत्पन्न कर दी) सुन्दर कहावत कहते हुवे प्रथम सूचना लिखी गई : --"यह तो केवल कोयला चोर है"
अर्थात : -- हमारे देश में ऐसे कई आपराधिक कृत्य है जिन्हें कारितकरने से उनका अंतिम परिणाम अत्यंत ही भयावह होता है किन्तु फिर भी उन्हें दंड सहिताओं में लघु अपराध की श्रेणी में रखा गया है ॥
धन का तो पूरा भरा, मन का भरा न पूर ।
मन का भर तबहि पूरे, तन से रह जब दूर |129|
भावार्थ : -- धन से तू भरपूर है फिर भी तेरा मन रिक्त है,यह रिक्तता अब तभी पूर्ण होगी जब तू तन से रिक्त हो जाएगा ॥
जिता कापर मरता जी, माटी दिये मिलाए ।
गरुबर मही गही लिये, थोथा पवन उड़ाए |130|
भावार्थ : -- जन्म हुवा तो तन रूपी वस्त्र प्राप्त हुवे , मरनी पर वही तन मिटटी में मिला दिया । भारी अर्थात श्रेष्ठ कर्म आत्म तत्व को धरती ने ग्रहण कर लिया थोथा अर्थात निकृष्ट कर्म आत्म तत्व को हवा जाने कहाँ उड़ा कर ले गई ॥
जाके जितै जोगवना, वाके उतै पहूँच ।१२३।
भावार्थ : -- निकृष्ट कार्य कारित कर अपना पद उंचा करो ।जिसने जितने निकृष्ट कार्य एकत्र किये उसकी उतनी उंची पहुंच है ॥
आपन पदक सबहीं गुरु, किये मान मद मेल ।
माया के तौ दास भए, काया के भए चेल ।१२४ |
भावार्थ : -- अपने अपने स्थान अभिमान और दंभ से भरे हुवे सभी गुरु हैं । काली माया के तो सेवक हो गए और काया के शिष्य हो गए ॥
साँचा अंतस हीर है, मिलै मोल बहुताए ।
परख ले सोइ पारखी, मोलत बोल बिहाए ।१२५ /
भावार्थ : -- सच्चरित अंत:करण हीरे के सदृश्य होता है जो बहुंत ही अधिक मूल्य में मिलता है अर्थात सदजन हीरे के समान होते हैं जिनकी शिष्यता कठिनता से प्राप्त होती है । जो ऐसे हीरे को परख लिया वो पारखी फिर उस हीरे का मूल्य लगा कर मुल्यातीत हो गया ॥
पाँव चले जित चालिये , हाथ चले चल द्रौंन ।
काया संग छाड़ै तौ , तेरो संगी कौन ।१२६ /
भावार्थ :-- यदि पाँव चले तो चाहे जहां चले चलो और हाँथ चले तो रथ की ही सवारी कर लो अर्थात स्वस्थ रहते हुवे प्रत्येक यात्रा सुगम है किन्तु स्वस्थ न रहने पर सभी साथ छोड़ देते हैं ॥
कारूक अस काया गढ़ी जैसे काचा कुंभ ।
रुधिर के तौ तरल भरे, छन में होए निशुंभ | 127 |
भावार्थ : -- विधाता ने काया को ऐसे रचा है जैसे यह कोई मिट्टी की मटकी हो । जिसमें जल स्वरूप रुधीर भर दिया, और मटकी के जैसे ही यह पलभर में ही विषम हो जाती है ॥
खन खन खोदा कोइरा, दिया समंदर डूब ।
रपट लिखी यह चोर है, कहत मुहावरि खूब |128|
भावार्थ : -- खंड खंड में खनखनाता हवा कोयला खोद लिया फिर उन खण्डों को समुद्र से डूबो दिया (अर्थात प्राकृतिक आपदा की स्थिति उत्पन्न कर दी) सुन्दर कहावत कहते हुवे प्रथम सूचना लिखी गई : --"यह तो केवल कोयला चोर है"
अर्थात : -- हमारे देश में ऐसे कई आपराधिक कृत्य है जिन्हें कारितकरने से उनका अंतिम परिणाम अत्यंत ही भयावह होता है किन्तु फिर भी उन्हें दंड सहिताओं में लघु अपराध की श्रेणी में रखा गया है ॥
धन का तो पूरा भरा, मन का भरा न पूर ।
मन का भर तबहि पूरे, तन से रह जब दूर |129|
भावार्थ : -- धन से तू भरपूर है फिर भी तेरा मन रिक्त है,यह रिक्तता अब तभी पूर्ण होगी जब तू तन से रिक्त हो जाएगा ॥
जिता कापर मरता जी, माटी दिये मिलाए ।
गरुबर मही गही लिये, थोथा पवन उड़ाए |130|
भावार्थ : -- जन्म हुवा तो तन रूपी वस्त्र प्राप्त हुवे , मरनी पर वही तन मिटटी में मिला दिया । भारी अर्थात श्रेष्ठ कर्म आत्म तत्व को धरती ने ग्रहण कर लिया थोथा अर्थात निकृष्ट कर्म आत्म तत्व को हवा जाने कहाँ उड़ा कर ले गई ॥
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