रविवार, 14 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 11।। -----

रसनी कसनी कास कै, कौंधन घाघरि घेर  । 
गहे बदरिया चुनरिआ  नाचै रे चहुँ फेर  । १११। 
रसनी कसनी कास कटि, घेर घघरिया राँच । 
चँवर चुनरिया चंचला, नाच बदरिया नाच ।११२। 
भावार्थ : -- कसनी की रस्सी कस के और करधनी में घेर वाला घाघरा पहन के , बदरी झालर लगी चुनरिया धारण किए चारों ओर घूम घूम कर नृत्य कर  रही है ॥

भावार्थ : -- कसनी की कसी हुई रस्सी, रंगचढ़ी घेर वाली घाघरी, उस पर झालर लगी हुई बिजली सी चुनरिया,
अरे बदरिया तू नाच, नाच-नाच ॥

सीस चुनरिया चाँचरी , कटि घघरिया घाल । 
दरसे दुलहिन बादरी, कर मैं जल जयमाल ।११३। 

हेर रहि बरीता उतर , बरनन बर बरियान । 
सरित सागर सैल सिखर, कतहुँ न को श्रीमान ।११४। 
भावार्थ : -- सिरोपर बिजली सी चुनरी ले और करधनीमें सुन्दर घघरा पहन, बदरिया दुल्हन के स्वरूप  दर्शित हो रही है क्यों कि उसके हाथ में जल रूपी जयमाल है ॥

विवाहाकांक्षी बदली, श्रेष्ठ नवयुवक को दुल्हा स्वरूप में वरण करने हेतु धरती पर उतर कर उसे ढूंड रही है,
सरिता सागर पर्वत शिखर आदि सभी स्थानों पर ढूंढा किन्तु कोई विवेकशील, तेजस्वी नहीं मिला  ॥

कामन काया कामिता, तिनते प्रीति न होए । 
काम स्वाती बूँद कै , साँचा प्रीतम सोए ।११५। 

प्रेम सूत गठियाए कै , लहि प्रीतम के संग । 

सूता गहन गाहे जूँ , चाढ़े घन घन रंग ।११६। 
भावार्थ : -- लंपट,और केवल काया की लालसा करने वाला , ऐसे व्यक्तियों से प्रीती नहीं होती । जिसकी अभिलाषा समुद्र स्वरूप केवल प्रेम के स्वाति बूंद प्राप्त करने की है वही सच्चा प्रियतम होता है ॥

प्रेम सूत्र बाँध के बदली प्रियतम के साथ को प्राप्त हुई , जिस प्रकार धागा गहरे मज्जन करके ही गहरा रंग प्राप्त करता है उसी पप्रकार बदली भी प्रियतम के प्रेम में गहरे डूब कर प्रियतम के गहरे रंग को प्राप्त हुई ॥

चौखट एक बनाई के, लिए धन तनिक उधार ।
एक कुठार ढलाई के, छाप रहे अखबार । 117। 

चार तो लिए पतर कार, दस बीस चितर कार । 
पट तान कहें इ देखो, हील रहा संसार । 118। 

भावार्थ : -- "इ पोस्टरमल उर्फ़ बकुल कहीं के" एक ठो चौखट बनाए के, थोडा कहीं से माने कि ' इधर- उधर' से उधार लेइ के एक ठो  कोठरिया ढला ली और उ में जीवन-चरितर छाप रहें है.....किसका?......सरकार का औउर किसका.....

और उ 'परदाराम उर्फ़ कौआ' दुई ठो सम्पादक धर के चार पांच पत्तर कार लेइ के दस बीस फोटूकार भरती करके, घर घर में सुनहरा परदा टांग दिए और कहते हैं इ देखो दुनिया हील रही है 

'किसीने' एक चांदी का पंखा झला नहीं के इनकी कोठरिया हीलने लगती है..... 

धौले कापर पहिरिया ओट  राजसी खाल । 
बगुरा धूनि रमाए के चले मराली चाल । 119। 

मुनि गन की मति भेस धर चले राजसी चाल । 
ताके कर संभव होए समुख सैन के काल । 120 । 

भावार्थ : - धौली चमड़ी के ऊपर, धुले हुवे कपडे पहनकर,बगुला की बुद्धि धारण कर,  हंस की चाल चल रहा है ।1। 

मननशील व्यक्तियों की  बुद्धि का वेश धारण कर, जो राजा जैसी चाल चले सम्मुख सेना का काल उसी के हाथों होता है ।2।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...